भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 295, कुल 811 में से

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सर्गः ७] विलासकाण्डम् १७९


साऽपि प्रत्युद्यतानाथं रत्नदीपैः सखीयुता । ततः स सीतया रामः पर्यङ्के रत्नचित्रिते ॥४१॥
चकार मांसया क्रीडां रंजयामास जानकीम् । ततस्तौ दंपती निद्रां चक्रतुर्वीजितौ मुहुः ॥४२॥
दासीभिर्व्यजनैश्चित्रैश्चामरैर्हेमभूषितैः । एवं रामेण सा सीता सुखमाप पतिव्रता ॥४३॥
सीतया राघवश्चापि सुखमाप विशेषतः । एवं नाना कौतुकानि प्रत्यहं रघुनंदनः ॥४४॥
चकार सीतया सार्द्धं परिपूर्णमनोरथः । कदा चंद्रस्य ज्योत्स्नायामङ्गणे सप्रभः प्रभुः ॥४५॥
चकार सीतया निद्रां कदा प्रासादमस्तके । कदा प्रासादान्तरे वाऽपि गवाक्षपवनैः शुभैः । ४६॥
सुखमाप कदा रामः कदा रहसि मंदिरे । कदा कनकमुक्तालावितारसुमंचके ॥४७॥
कदा द्राक्षामंडपाधो जलयंत्रसमीपतः । काचभूम्यां रुक्मभूम्यां मणिभूम्यां कदाऽपि वा ॥४८॥
स्फटिकादिसुभूम्यां हि कदा सुष्वाप राघवः । कदा स पुष्पके वाऽपि रंगशालान्तरे कदा ॥४९॥
कदा स चित्रशालायां कदोशीरमये गृहे । कदा पुष्पमये गेहे कदा रंभावने वरे ॥५०॥
कदा पुष्पवाटिकायां कदा वृक्षोर्ध्वसद्मनि । शृङ्खलाक्षौमसंबद्धदोलके रत्नचित्रिते ॥५१॥
कदा काष्ठमये दिव्ये मंचके रत्नभूषिते । कदा चकार तुलसीवाटिकायां रघूत्तमः ॥५२॥
निद्रां जनकनन्दिन्या सभायामथवा कदा । कदा द्वारोर्ध्वप्रासादे कदै कस्तम्भसद्मनि ॥५३ ।
कदा स्वगृहदेहल्यां कदा वृन्दावनेऽपि वा । एवं स सीतया रेमेऽयोध्यायां रघुनंदनः ॥५४ ।
इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे विलासकाण्डे वाल्मीकीये
सीतारामयोर्दिनचर्यावर्णनं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥


सप्तमः सर्गः

(रामके द्वारा देवांगनाओंको वरदान)

श्रीरामदास उवाच

एकदा राघवं द्रष्टुं तथा स्नातुं मथावपि । स्त्रियैः समागयौ व्योम्नो मुनिभिः परिवेष्टितः ॥ १ ॥


गायकोंके गायन सुनते-सुनते आधी रात बिताकर वे शयनागारमें शयन करनेको चले। हीरे आदि रत्नों द्वारा प्रकाशित मार्गसे चलते हुए राम सीताके पास पहुँचे ॥ ४१-४३ ॥ सीता भी रत्ननिर्मित दीपोंके प्रकाशमें अपनी अनेक सखियोंके साथ रामचन्द्रके पास गयीं और राम सीताके साथ एक रत्नजटित पलङ्गपर बैठ गये ॥ ४४ ॥ रामने कुछ देर तक सीताको प्रसन्न करनेके लिए कुछ खेल किया। फिर दोनो सो गये और दासियाँ पंखा झलने लगीं ॥ ४५ ॥ इस तरह रामके द्वारा सीता तथा सीताके द्वारा राम विविध प्रकारका आनन्द लूटते रहे। जिनकी समस्त कामनाएं पूर्ण हो चुकी थीं, ऐसे भगवान् रामचन्द्रजीकी यह नित्यकी दिनचर्या थी। उनके यहाँ नित्य ऐसे-ऐसे कौतुक हुआ करते थे। कभी विशाल भवनके आँगनमे, कभी प्रासादपर और कभी खिड़कीदार बढ़िया कमरेम राम सोते थे ॥ ४६-४९ ॥ कभी जहाँ अनेक प्रकारके मणियोंकी शृङ्खलायें लटकती थीं ऐसे चाँदनीवाले किसी एकान्त कमरेके सुन्दर मंचपर, कभी अंगूरकी झाड़ीके नीचे, कभी जलयन्त्रके समीप, कभी कांचभूमिपर और कभी स्फटिकादिसे निर्मित सुन्दर मणिभूमिपर रामचन्द्रजी शयन करते थे ॥ ५० ॥ ५१ ॥ कभी पुष्पक विमानपर कभी रङ्गशालार्मे, कभी चित्रशालामें, कभी खसकी टट्टियों-वाले घरोंमें, कभी फूलके घरमें, कभी कदलीवनमें, कभी पुष्पवाटिकावे, कभी वृक्षके ऊपर बनी हुई झोपड़ीमें, कभी वृक्षपे बँधी जंजीरोसे बने हुए झूलपर, कभी काठोंके बने हुए दिव्य मंचपर ओर कभी तुलसीकी बनी हुई वाटिकाने रामचन्द्रजी शयन करते थे ॥ ५२-५५॥ कभी रामचन्द्रजी सीताके साथ सभामण्डपमें, कभी द्वारके किसो एक ऊँचे प्रासादपर, कभी केवल एक स्तम्भपर बने हुए मकानमें, कभी अपने घरकी देहलीपर और कभी वृन्दावनमें सीताके साथ शयन करते थे ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासमन्विते विलासकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

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