भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 297

सर्गः ७] विलासकाण्डम् २८१


द्वारिकायां यदाऽहं हि द्वापरे मुनिसत्तम । येन व्रतेन दानेन नियमेनाथवा मुने ॥१९॥
बहुनारीर्निभयेन प्राप्स्यामीति वदस्व तत् । इति रामवचः श्रुत्वा व्यासो राघवमब्रवीत् ॥२०॥
सम्यक्पृष्टं त्वया राम दानं ते वच्म्यहं परम् । एकपत्नीव्रतादेव यथाऽत्र च सर्वदा ॥२१॥
लभिष्यसि तथाऽयद्य दानं तव वदाम्यहम् । सानाश्चामरणेन मुनिमेकां रघूत्तम ॥२२॥
एवं षोडशमूर्तीश्च कारय त्वं पृथक् पृथक् । देहि त्वं मर्यूनद्यास्तीरे विप्रेभ्य आदरात् ॥२३॥
वस्त्राद्यलङ्कारभूषाद्यैर्दिग्भाभिश्च ताः शुभाः । अनेन बहुनारीश्च लभिष्यस्येव जन्मनि ॥२४॥
तथेति राघवश्चापि मूर्तीः कृत्वा मनोरमाः । ददौ ताः सम्प्रयत्नेन ब्राह्मणेभ्यस्तु षोडश ॥२५॥
ततस्ते ब्राह्मणास्तुष्टा रामायाशीर्वदुर्मदाः । दत्तमंशगुणं राजन् सहस्त्रगुणितं पुरा ॥२६॥
अस्माकं वचनाद्दानफलं तव भविष्यति । षोडशसहस्राणि त्वं लभिष्यसि निर्भयम् ॥२७॥
तथास्त्वित्याह रामोऽपि ततो विप्रान्व्यसर्जयत् । प्रणम्य पूजितं व्यास ददावाज्ञां रघूद्वहः । २८ ।
अथैकदा रामचन्द्रः सीतया सरयूतटे । मधुमासे वस्त्रगेहे स्थितः क्रीडां चकार सः ॥२९॥
एतस्मिन्नंतरेऽयोध्यां नानादेशनिवासिनः । रामतीर्थे मधौ स्नातुं समागम्युः सहस्रशः । ३० ।
सुरा यक्षाः किन्नराश्च गन्धर्वाः पन्नगा नगाः । बह्वयश्च सरितः सर्वास्तीर्थानि मुनयो नृपाः । ३१ ।
अप्सरसः पन्नगाश्च खगाः क्षेत्राणि वानराः । अथैका देवपत्न्यो ज्ञात्वाऽस्पृर्द्धया विदेहजाम् । ३२ ।
परस्परं ताः समाहूय दर्शायर्थे राघवं प्रति । समाजग्मुर्दिव्यवस्त्ररत्नाभरणभूषिताः । ३३ ।
रामसौंदर्यसंभ्रान्ताः कामबाणप्रपीडिताः । ता दृष्ट्वा रामदूतान्ते पप्रच्छ वस्त्रगेहस्थिताः । ३४ ।
यूयं किमर्थं संप्राप्ता निर्भयेऽत्र भयावहे । कथयध्वं हि नः सर्वं मा शङ्कां कुरुतत्र हि । ३५ ।
ता ऊचु राघवं द्रष्टुं सपायाता वयं स्त्रियः । अधुना चेत्राद्यत्रम्प दर्शनं न भविष्यति । ३६ ।


मैं द्वापर कृष्णरूपसे तो बहुत सी स्त्रियोंके साथ भोग करूँगा सही, लेकिन वह कौन-सा ऐसा व्रत अथवा दान है जिससे करनेसे अगले जन्ममें बहुत सी नायिकाओं को सकूंगा ॥१८।१९॥ यह सुनकर व्यासजी बोले— हे राम ! आपने बहुत ठीक प्रश्न किया है । मैं आपको वह दान बतलाता हूँ। यद्यपि एक नारीव्रतके पुण्यसे ही आपको कितनी ही स्त्रियाँ मिलेंगी । तथापि वह दान बतलाये देता हूँ। सोने के समान भारक सुवर्णकी एक मूर्ति बनवाइये। फिर उसी तरह सोलह मूर्तियाँ तैयार करा के और उन्हें विचित्र प्रकारके वस्त्रों-भूषणोंसे भूषित करके सरयू नदीके तटपर ब्राह्मणोंको दान दे दीजिये। २०-२४॥ ऐसा करनेसे आप अगले जन्ममें बहुत सी स्त्रियाँ पावेंगे । २४ । रामचन्द्रने इसे स्वीकार किया । तदनुसार उन्होंने सावाके सोलह मूर्तियाँ बनवायीं और सरयू नदीके तटपर ब्राह्मणोंको दान दिया। २५॥ उन ब्राह्मणोंने प्रसन्न होकर रामको यह आशीर्वाद दिया कि आप इस समय जो कुछ हम लोगोंको दे रहे हैं सो सहस्रगुणा होकर आपको प्राप्त हो ॥२६ । हम लोगोंके आशीर्वादसे आपको यह फल अवश्य प्राप्त होगा । इसमें कोई सन्देह नहीं है कि आपको भविष्यमें सोलह हजार स्त्रियाँ मिलेंगी ॥२७॥ रामजीने भी कहा कि 'तथास्तु' 'एवमस्तु' और उन विप्रोंको तथा व्यासजीको भली भाँति पूज करके बिदा किया । २८॥ एक बार राम चैत्रमासमें सरयू-तटपर सीताजीके साथ पटगृह (तम्बू) में विहार कर रहे थे । तभी चैत्र रामनवमीपर सरयूस्नान करनेके लिये हजारों यात्री अयोध्या आ पहुँचे ॥२९।३०॥ बहुतसे देवता, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, पन्नग, पर्वत, नदियाँ, समस्त तीर्थ, मुनि, राजे अप्सरायें, खग, क्षेत्र, वानर आदि वहाँ स्नान करनेके निमित्त आये ।

एक दिन देवताओंकी स्त्रियाँ जब कि सीता जी अधिक रूपवती थीं, तब आपसमें सलाह करके विविध प्रकारके वस्त्राभूषण पहनकर रामचन्द्रजीके पास गयीं ॥३१।३२। वे सबकी सब रामके सौन्दर्यको देखकर पागल हो गयी थीं। उन्हें देखकर रक्षकों ने पूछा—॥३३।३४॥ तुम लोग कौन हो ? आधी रातके समय यहाँ किस लिये आयी हो ? साफ-साफ बतला दो, घबड़ाओ नहीं ॥३५॥ उन्होंने कहा कि हम सब स्त्रियाँ रामचन्द्रका