भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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२८६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

आयुःशेषं समाप्यैाथ गंगायां कृत्वर निजम् । मज्जन् स्नानसमये न्यञ्चन्त्या नाकं चिरं गता ॥४६॥ ततः कालान्तरेषामीत्सत्राजितनया भुवि । बभूव पत्नी कृष्णस्य द्वापरे द्वारकापुरि ॥४७॥ एकदा पिङ्गलानाम्नी वेश्या रात्रौ विनिद्रितम् । सीतया दिव्यपर्यङ्के ययौ सा राघवं रहः ॥४८॥ विहाय नूपुरादीनि स्वनवंति पदैः शनैः । इतस्ततो निरीक्षन्ती दिव्यवस्त्रैर्विभूषिता ॥४९॥ सीताभयात्प्रकंपन्ती कामबाणप्रपीडिता । मण्डिता पुष्पमालाद्यैर्भूषितातिशोभिता ॥५०॥ अज्ञाता द्वारपालैः सा निद्रितैर्मञ्चकं ययौ । स्वकरेण पदस्पर्शं कृत्वा रामं प्रबोधयत् ॥५१॥ तदा प्रबुद्धः श्रीरामस्तां ददर्श पुरःस्थिताम् । सा धृत्वा तत्पदे गाढं प्रार्थयामास राघवम् ॥५२॥ राम राजीवपत्राक्ष मया तेऽद्यापराधिनम् । त्वं क्षमस्व कृपां कृत्वा मयि चानुग्रहं कुरु ॥५३॥ तस्याश्च वचनं श्रुत्वा ज्ञात्वा तां कामपीडिताम् । तां समाश्वासितुं प्राह राघवः कञ्जलोचनाम् ॥५४॥ एकपत्नीव्रतं मेऽस्मिन्भवे त्वं वेत्सि पिंगले । अतस्त्वत्कामपूर्त्यर्थे वदामि तच्छृणुष्व हि ॥५५॥ यदाऽहं मधुरामध्ये व्रजाच्छ्रीकृष्णरूपधृक् । यास्याम मातुलं कंसं हन्ता स्थास्यामि तत्पुरेम् ॥५६॥ तदा भजिष्यसि त्वं मां कुब्जारूपेण पिंगले । गच्छ दास स्वरूपेण निजायुः क्षपयिष्यसि ॥५७॥ आयुःशेषे स्थिरं देहं विमृज्य बहुसुकरम् । इत्युक्त्वा पिंगलां गेहे ददावाज्ञां भयान्विताम् ॥५८॥ शिक्षयामास द्वारस्थान्दासीन्दासींर्विनिद्रिताः । ततः सीतां प्रबोध्यैाथ वेश्यावृत्तं न्यवेदयत् ॥५९॥ तच्छ्रुत्वा जानकी रुष्टा त्यक्त्वा पर्यङ्कमुत्तमम् । राघव प्राह सक्रोधा कथं नाहं प्रबोधिता ॥६०॥ सर्वदाऽत्र मया ज्ञातमेकपत्नीव्रतं सुधा । भृकुटीं पिंगलां नूनंमीर्ष्याच्छ्रोधिता त्वतः ॥६१॥

॥ ४१-४३। उस समय जैसी तुम्हारी इच्छा होगी वैसा मेरा सेवा कर लेना इस प्रकार रामकी बात सुनकर शूर्पणखा बहुत प्रसन्न हुई। ४४॥ यह रामचन्द्र तथा सीताको प्रणाम करके अपने डेरेपर लौट गयी इस प्रकार वह आठों आश्रम चरितार्थ करके अन्तमें शिवलोक साथ हरिद्वार चली गयी। वहाँपर उसकी जितनी आयु शेष थी, उस समाप्त करके एक दिन स्नान करनेको गङ्गा गयी और वहीं शरीर त्यागकर स्वर्गात्तारोहण चली गयी । ४५ । ४६ ।। जन्मान्तरम गुणवती सत्राजितकी पुत्री होकर जन्मी और कृष्णकी पत्नी बनकर द्वारकामे निवास करन लगी ॥ ४७॥ एक दिन पिङ्गला नामकी एक वेश्या रात्रिके समय रामचन्द्रके पास पहुंची। उस समय राम सीताके साथ एक दिव्य पलंगपर सो रहे थे। वह वहां गयी ॥ ४८ । नूपुरादि बालनेवाले आभूषणोंको पैरोंस उतारकर बहुसुन्दर कपडे पहने भयवश इधर उधर देखती जा रही थी। सीताके भयसे उसके अङ्ग अङ्ग काँप रहे थे और वह कामके बाणसे पीडित थी। उसने सुगन्धित फूलोंका माल्य तथा अनेक आभूषण पहिन रक्खा था जिससे वह बडा सुन्दरी मालूम पडती थी । ४९ ॥ ५० ॥ जिस समय द्वारपालगण निद्रित थे तब चुपकेसे भीतर चली आयी और रामचन्द्रके मंचके पास जा पहुँची। उसने हयत्न रामके पैर छूकर उन्ह जगाया ॥ ५१ । राम जाग गये और सामने उस पिंगला वेश्याको देखा, तब वह जागस रामके पैरोंको पकडकर प्रार्थना करने और कहने लगी—हे राम ! हे राजीवपत्र क्ष ! आज मैंने बडा भारी अपराध किया है। मेर ऊपर कृपा करके आप उसे क्षमा कर दें और मरेपर दया कर ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ उसकी यह बात सुनकर रामन समझ लिया कि यह कामपीडित है। तब उस आश्वासन दनके लिए कहने लगे—। ५४ । हे पिंगले ! तुम जानती होगी कि इस जन्ममें मैं एकपत्नीव्रतधारी हूँ। अतएव तुम्हारी कामवासनाको शान्तिका जा उपाय बतलाता हूँ, उसे सावधान होकर सुनो । ५५ ।। जिस समय कृष्णअवतार में ब्रजस मधुरा जाऊँगा और कंसको म रकर उस पुरीमें ठहरूँगा तब हे पिंगले ! तुम कुब्जा के रूपमें मेरा सेवा करोगी। जाओ, मेरे आशीर्वादसे तुम इस शरीरको शेष आयु बिताकर कंसके यहीं दासी हाओगी क्या सीता के भयसे रामने केवल इतना कहकर उसे विदा कर दिया । ५६-५८ । तब उन्होंने द्वारपाला तथा दास दासी आदिकोंको जगाकर डाँटा-फटकारा और सीताको जगाकर उस वेश्याका समस्त वत्तान्त कह सुनाया । ५६ ॥ सो सुना तो काधित होकर जानकी शय्या छोडकर उठ खडी हुई और रामसे कहने लगी कि वह आयी थी, तब तुमने मुझे