श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 308, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| २९२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ९ |
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स ज्ञेयो राघवः साक्षाद् भुवि मानवरूपधृक् । विलासकाण्डपठनाद्धनार्थी धनमाप्नुयात् ॥४४॥
भोगान्याप्नोति भोगार्थी पुत्रार्थी पुत्रमाप्नुयात् । विलासकाण्डमेतद्वै रामभक्त्येह मानवः ॥
यः शृणोति नरः कश्चित्स सुखं प्राप्नुयाद्भुवि ।४५।
विलासकाण्डश्रवणात्पापैः पापात्प्रमुच्यते । विलासकाण्डं परमं रम्यं जनमनोहरम् ॥४६॥
आनन्ददायकं चित्रं श्रुतिसौख्यप्रदं महत् । ये पठन्त्यथ शृण्वन्ति सर्वान्कामान् लभन्ति ते ॥४७॥
धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी प्राप्नुयान्निधिम् । कामानाप्नोति कामार्थी मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात् ॥
निशार्धे मंचके स्थित्वा निजपत्न्या पठेत्तु यः । विलासकांडं षण्मासं तस्य पुत्रो भविष्यति ॥४९॥
अथवा मंचके श्यामं सन्निवेश्याथ तत्पुरः । द्वितीये मंचके स्थित्वा स्वयं दयितया सह ।५०॥
यः शृणोति निशार्धा हि विलासाख्यं मनोहरम् । एतत्कांडं पवित्रं च नवमासान् पुनः पुनः ॥५१॥
तस्यापुत्रस्य पुत्रः स्यान्नात्र कार्या विचारणा । पुत्रार्थमेव भोक्तव्यं मञ्चके ह्युपरिष्ट्य च । ५२।
भोक्तव्यं नान्यकामेषु मञ्चकस्थैर्नरैः कदा । विलासकाण्डमेतद्वै स्त्रीकामी यः पठेन्नरः ॥५३॥
स भार्यां प्राप्नुयाद्रूपां नवमासैर्न संशयः । कुमारी शृणुयादेतत्पत्यर्थं काण्डमुत्तमम् ॥५४॥
पुनः पुनस्तु षण्मासं लभिष्यति वरं पतिम् । विलासकांडमेतद्वै यः शृण्वन्ति वराः स्त्रियः ।५५॥
सौभाग्यलक्ष्म्या न कदा हा विहीना भवन्ति हि । भर्तुरायुरभिवृद्ध्यर्थं स्त्रीभिश्च स्नानपूर्वकम् ॥
श्रवणीय विलासाख्यमेतत्काण्ड मनोहरम् ॥५६॥
रंभाविचित्रं मधुरं पवित्र विलासकांडं हि यथैक्षुदण्डम् । पाठादिना पापचयप्रदण्डं धर्मैककुण्डं भवरोगदण्डम् ॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे विलासकाण्डे कुरंगोपाख्यानवर्णनं नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
जो मनुष्य इस विलासकाण्डका प्रातःकाल मध्याह्न अथवा रात्रिके समय रामचन्द्रके समीप पाठ करता है, उसे मनुष्यरूप धारण किये हुए साक्षात् राम ही समझना चाहिये । धनका इच्छा रखनेवाला मनुष्य विलास-काण्डका पाठ करनेसे धन पाता है, भोगार्थी भोग पाता है पुत्रार्थी पुत्र पाता है और जो प्राणी इसकी सुनता है, वह संसारमें सुखी रहता है ॥ ४३ ४५। विलासकाण्डका श्रवण करनेसे पापी पापसे छूट जाता है। यह विलासकाण्ड बड़ा सुन्दर और जनोंके मनको चुरानेवाला काण्ड है ॥ ४६ ॥ यह आनन्ददायक एवं विचित्र कथाओंसे भरा हुआ है। इसको सुननेसे कानोंको आनन्द मिलता है, जो लोग इसे सुनते अथवा पाठ करते हैं, उनकी सब कामनाएँ पूर्ण होती हैं । ४७॥ इससे धमार्थी धर्म पाता, धनार्थी धन पाता, कामार्थी काम पाता तथा मोक्षार्थी मोक्ष पाता है ॥ ४८ ॥ रात्रिके समय जो मनुष्य छः महीनेतक अपनी स्त्रीके साथ बैठकर इस विलासकाण्डका पाठ करेगा, उसको पुत्र मिलेगा ॥ ४६ ॥ एक मञ्चपर श्यामको बैठाकर उसके आगे स्वयं अपनी पत्नीके साथ एक दूसरे मंचपर बैठकर रात्रिके समय जो इस मनोहर विलासकाण्डको नौ महीनेतक बार-बार सुनता है, उस अपुत्रके भी पुत्र होता है। इसमें किसी तरहका सन्देह करनेकी आवश्यकता नहीं है। पुत्रकी कामनावालेको मञ्चपर बैठकर इसे सुनना चाहिए । ५०-५२ । किसी दूसरी कामनावालेको मंचपर बैठकर यह कथा न सुनना चाहिए । जो स्त्रीकी इच्छासे इसका पाठ करता है, उसको नौ महीनेमें स्त्री अवश्य मिल जाती है । यदि कुमारी कन्या पतिकी कामनासे इस काण्डको सुने तो उसे सुन्दर पति मिलता है। जो सुवशा स्त्रियाँ इसको सुनेंगी वे कभी भी अपनी सौभाग्यलक्ष्मी से विहीन न होंगी अर्थात् उनका सौभाग्य अटल रहेगा। समस्त नारियोंको अपने पतिकी आयुष्य बढ़ानेके लिए स्नान करके यह विलासकाण्ड सुनना चाहिये ॥ ५३- ५६ ॥ क्योंकि यह विलासकाण्ड ईखके दण्डकी तरह मीठा विचित्र, मधुर तथा पवित्र है। यह पाठादि करनेवालोंके पापोंको मार भगानेवाला और धर्मका एकमात्र कुण्ड तथा भवरोगके लिये दंडके समान है। इस काण्डमें भी सर्वतया १७८ श्लोक हैं ॥ ५७॥ इति शतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतनुज पण्डित ज्वालाप्रसाद टीकायां विलासकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
* इति श्रीमदानन्दरामायणे विलासकाण्डं समाप्तम् *