भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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३०६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३


चित्रकूटोपत्यकायां वाल्मीकेराश्रमांतिके । पिप्पलाधो मैथिलीं तां सख्या सास्त्या वरासने ॥७६॥
निवेश्य नत्वा स प्राह साश्रुनेत्रः सगद्गदः । लोकापवादभीत्या त्वां त्यक्तवान् राघवो वने ॥७७॥
दोषो न कश्चिन्मे मातर्गच्छाश्रमपदं मुनेः ।
इत्युक्त्वा तां परिक्रम्य सख्या दास्याऽपि वीजिताम् ॥७८॥
ययौ रथेन सौमित्रिः पूर्वमार्गेण जाह्नवीम् । शिष्यैः श्रुत्वाऽथ वाल्मीकिर्जनकेन सुमेधसा ॥७९॥
ययौ स्त्रीभिर्द्विजैर्युक्तः पूजयामास जानकीम् । शिविकायां संनिवेश्य वीजितां चामरादिभिः ॥८०॥
नानावाद्यनिनादैश्च वेश्यानां नर्तनैर्वरैः । स्तवनैर्मागवादीनां नटादीनां सुगायनैः ॥८१॥
निनाय अन्तः सीतां वाल्मीकेराश्रमे मुदा । मुनिपत्न्यो वन्यपुष्पैर्ववर्षुर्जांनकीं मुदा ॥८२॥
जानकीशिविकाग्रे ते ददृशुर्वज्रपाणयः । एवं विवेश सा सीता वाल्मीकेराश्रमं मुनेः ॥८३॥
चक्रुर्नीराजनं दीपैर्मुनिपत्न्यश्च जानकीम् । जानकीं हेमपर्यङ्के घृताधौकोपबर्हणा ॥८४॥
सुखमापाश्रमे तस्य वाल्मीकेश्च तपस्विनः । जानकीं पूजयमासुर्मुनिपत्न्यः पृथक् पृथक् ॥८५॥
दिव्यान्नैर्वनजैर्वस्त्रैर्मुनिपत्न्योर्निरन्तरम् । ज्ञात्वा परात्मनो लक्ष्मीं मुनिवाक्येन भक्तितः ॥८६॥
दोहदान् पूरयामासुः सीतपत्या मुनिस्त्रियः । शिविकासंस्थिता सीता ददर्श वनकौतुकम् । ८७॥
यथापूर्वं तु साकेते सुखमाप विदेहजा ।
तथा मुनेराश्रमेऽपि सुखमाप पतिव्रता ।८८॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये
जन्मकाण्डे सीताया वाल्मीक्याश्रमगमनं नाम तृतीयः सर्गः । ३ ॥


जब वे परम पवित्र यमुना, मन्दाकिनी तथा तमसा नदीको पार करके चित्रकूटकी तलेटीमें वाल्मीकिआश्रमके समीप पहुंचे, तब लक्ष्मणने रथको रोका और एक पीपल वृक्षकी छायामे आसन बिछा दिया। उस सखियोंके साथ सीताजी उसपर जा बैठी ॥७५ । ७६ । तब आँखोंमें आंसू भरकर गद्गद कण्ठसे लक्ष्मणजी कहने लगे-माता ! लोकापवादके भयसे रामचन्द्रजीने आपको इस वनमें छोड़नेके लिए मुझे आज्ञा दी है। इसमें मेरा कोई दोष नहीं है। अब आप यहाँसे ऋषि वाल्मीकिके आश्रमपर चली जायं। इतना कहकर लक्ष्मणने सीताकी परिक्रमा की और प्रणाम किया, उस समय दासी और सखियां सीतापर पङ्खा झल रही थी ॥७७।७८॥ फिर वे अपने रथपर बैठकर उसी मार्गसे अयोध्याके लिए लौट पड़े, जिधरसे गये थे। उधर वाल्मीकिने कुछ शिष्योंसे यह वृत्तांत सुना तो जनकजी, सुमेधा तथा कितनी ही स्त्रियों और ब्राह्मणोंके साथ वहाँ पहुँचे, जहाँ सीता बैठी थीं। वहाँ पहुँचकर उन्होंने सीताकी पूजा की। फिर उन्हें सुन्दर पालकीमें बिठाया और अपने आश्रमकी ओर चले। रास्तेमे अनेक प्रकारके बाजे बज रहे थे। वेश्यायें नाच रही थीं और भाट विरुदावली बखान रहे थे। नट-गायक आदि सुन्दर गायन गा रहे थे । ७९-८१॥ जब सीताजी आश्रमपर पहुंच गयीं, उस समय मुनिपत्नियोंने सहर्ष उनपर विविध प्रकारके वनफूल बरसाये ॥८२॥ उन्होंने आरती उतारी और एक सुवर्णनिर्मित पलंगपर बिठाया ॥८३॥ वहाँ पहुँचकर सीताको बड़ा आनन्द मिला। आश्रमकी ऋषिपत्नियोंने अलग-अलग सीताकी पूजा की ॥८४॥ उस दिनसे कितने ही तरहके दिव्य अन्न, वनके सुस्वाद फल तथा फूल आदि दे-देकर सीताको सब स्त्रियें प्रसन्न किये रहती थीं। क्योंकि उन लोगोंने वाल्मीकिसे सुन रक्खा था कि सीता कोई साधारण स्त्री नहीं साक्षात् विष्णुभगवानकी भार्या लक्ष्मी हैं। जब इच्छा होती तब सीता पालकीपर सवार होकर वनको देखनेके लिये जाया करती थीं। सीताको जो सुख अयोध्यामे मिलता था, वही यहाँपर भी सुलभ था ॥८५-८८॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये जन्मकाण्डे पं० रामतेजपाण्डेयविरचितभाषाटीकायां तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥