श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 327, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ४ ] जन्मकाण्डम् ३२१
तिर्यग्योनी जन्मवत्या वानर्या बालकानहो । स्नेहात्सहैव नीयन्ते धिङ्मां मानवदेहजाम् ॥ ६५ ॥ एकं चापि निजं बालन्त्यक्त्वा गेहेऽथ गम्यते मया विमूढया स्नातुं शुभ्यत्र क्षणिकं सुखम् ॥ ६६ ॥ इति धिकृत्य चात्मानं परितृत्त्याश्रमं ययौ । एतस्मिन्नन्तरे गेहे वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवः ॥ ६७ ॥ गतः स ह्युद्यत्काष्ठं ह्यर्थार्थे बटवो गताः गृहीत्वा सा कुशं प्रेम्णापयौ सीता बहिः पुनः ॥ ६८ ॥ हारत्वा सह नदीं गत्वोपसि स्नानं चकार वै । महदाश्चर्यं मुनिपाल दार्षे निःशम्य वै मुहुः ॥ ६९ ॥ मात्राशापभयाच्चक्रे लवंवालं स पूर्ववत् तपोबलेन तं प्रोक्ष्य जीवयामास योगतः ॥ ७० ॥ ज्ञानदृष्ट्या तीव्रेण मुनिना नावलोकितम् । ततः सीताऽपि मुस्नाता दाभ्या गेहं शनैर्ययौ ॥ ७१ ॥ कटौ गृहीत्वा तं बाल रुदन्तं पुननिःस्वना । प्रेक्षेऽन्यं बालकं दृष्ट्वा मुनिं पप्रच्छ जानकी ॥ ७२ ॥ प्रेवे कस्याः शिशुश्चाय मोऽपिरुष्टामहाकुशम् । कटिप्रदेशे जानक्या विस्मयं परमं यतः ॥ ७३ ॥ नमस्कृत्य ततः सीतां सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् । अंके निधाय तं बाल सीताया द्रवरीन्मुनिः ॥ ७४ ॥ प्रसादान्मम वैदेहि द्वितीयोऽप्यं सुतस्तव । भवत्वद्य लवो नाम्ना सर्वयस्माद्विनिर्मितः ॥ ७५ ॥ वान्यांकैर्वचनन्साऽपि शिशुं जग्राह जानकी । मुनिस्तयोनाम चक्रे कुश्रो ज्येष्ठोऽनुजो लवः ॥ ७६ ॥ जातकर्मादिसंस्कारान् लवस्यापि चकार सः । तदा निनेदुर्वाद्वानि भुव्यां मेर्षविद्दिरीरुमाम् ॥ ७७ ॥ वर्षपुर्जानकीं क्त्वा वाल्मीकि कुसुमैः सुराः । चकार जनकश्चापि सुमेधा परमोत्सवान् ॥ ७८ ॥ क्रमेण विद्यामपन्नो श्रोत्रपुत्रौ विरेचतुः । धनुर्विद्यामस्त्रविद्यां शिक्षयामास तौ मुनिः ॥ ७९ ॥ कृत्स्नं रामायणं स्वीयं कृतं तौ शिक्षयन्मुदा यस्मिन्नानन्दगम्यं च चरित्रं राघवस्य हि ॥ ८० ॥ कुमारौ स्वरसम्पन्नौ सुन्दरश्चश्विनाविब । तन्त्रीलयममायुक्तौ गायन्तौ चेतुर्तने ॥ ८१ ॥ तत्र तत्र मुनीनां तु समानेषु महर्षिणौ । गायन्तावपि तौ दृष्ट्वा विस्मिता मुनयोऽभवन् ॥ ८२ ॥
देखकर उन्होंने अपने मनमे साचा कि तिर्यग्योनीका स्त्री होकर भी यह बानरी कितन प्रेमसे बच्चोको अपने साथ रखती है। मुझ मानवजातिकी भामिनीको धिक्कार है जो अपने एक लडकेको बाश्रमपर छोडकर तमसा स्नान करने जा रही हूँ ॥ ६५-६५ ॥ इस तरह अपनेको धिक्कारकर सीता वहाँसे फिर आश्रमकी ओर पवीं । इसी बीच बाल्मीकिजी समिदाहरणके लिये बाहर चले गये थे। विद्यार्थी भी अपने अपने कामत पहले ही बले जा चुके थे। इतनमे सीता पहुंची। उसोम कुशको उठा लिया और दानीके साथ तमसाकी और चन गयी ॥ ६६ । ६७ उधर वाल्मीकि लौटकर आये तो उनकी निगाह पालनेपर पडी । उसपर बच्चे-को नही देखा तोही अकस्मात मुनिराजने एक लच्छी घास ली और सीताके शापके भयसे अपने तपोबल द्वारा पहिले कुशके समान ही एक बालक और बना दिया । ६८-७०॥ पररभूटके कारण उन्होंने अपनी ज्ञानदृष्टिसे यह नही देखा कि सीता इसको अपने साथ ले गयी है। कुछ देर बाद स्नान करके साता भी दासके साथ धीरे धीरेसे कुटियाम आयी ॥ ७१ ॥ वहाँ उन्होंने देखा कि कुशके समान ही अलकारादिके विभूषित एक बालक पालनेपर पड़ा सो रहा है। यह देखकर सीताने ऋपिम पूछा कि यह किसका बच्चा है ? उधर ऋषिने देखा कि कुश तो सीताकी कमरपर है, तब उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ ॥७२॥७३॥ फिर उन्हें नमस्कार करके वाल्मीकिने वह वृत्तात बतलाया, जिसके कारण दूसरा बच्चा बनाना पडा था। उसके पश्चात मुनिन पुचकारकर लवको सीताकी गोदमे दे दिया और कहा- ॥ ७४ ॥ देवि ! इसे भी सम्हालो । तब सीताने उस बच्चेको भी अगीकार किया । मुनिने कहा-इन दोनोमें उष्ठकुश होगा और कनिष्ठ (छोटा) लव ॥७५॥ इसके अनन्तर उन्होंने लवका भी जातकर्म आदि संस्कार किया । उस समय विविध प्रकारके बाज वज। स्वर्गम देवताओने भी मगलवाद्य बजाकर बालका, शिशु तथा वाल्मीकिके ऊपर फूलोकी वर्षा की। सुमेधा तथा जनकने विविध उत्सव किये। क्रमशः दोनो पुत्र बड़े हुए उन्होंने अनेक विद्याओका अध्ययन किया और महपि वाल्मोकिने उनको धनुविद्या तथा अस्नविद्या भो सिखायी ॥ ७६-७९ ॥ फिर अपनी बनायो सम्पूर्ण रामायणको भी उन्ह शिक्षा दी । जिसमें रामचन्द्रजीका आनन्ददायक चरित्र वणित था ॥ ८० । अश्विनीकुमारकी भांति सुन्दर वे दोनों बालक मधुर स्वरसे