श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 330, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३१४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ५ |
|---|
जगज्जैत्रैकमंत्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् । यः कंठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥१९॥
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं पठेत् । अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥२०॥
आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः । तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥ २१॥
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली । काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्यानंदवर्धनः ॥२२॥
वेदांतवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः । जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥२३॥
इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः । अश्वमेधायुतं पुण्यं संप्राप्नोति न संशयः ॥२४॥
सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा । गच्छन् मनोरथोऽस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः ॥२५॥
तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ । पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनांबरौ ॥२६॥
फलमूलाशनौ दांतौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ । पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥२७॥
धन्विनौ दंडनिखिंशौ काकपक्षकधरो श्रुतौ । वीरौ मां पथि रक्षेतां तावुभौ रामलक्ष्मणौ ॥२८॥
शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् । रक्षःकुलनिहंतारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥ २९॥
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषंगसंगिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम् ॥३०॥
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् । अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान्स नः प्रभुः ॥३१॥
रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥३२॥
श्रीराम राम रघुनंदन राम राम श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥३३॥
लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् । कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा । पुरतो मारुतिर्यस्य तं वंदे रघुनंदनम् ॥३५॥
विमुक्त होकर मुक्ति और भुक्तिका भागी होता है ॥ १७ ॥ १८ ॥ समस्त जगतको जीतनेवाले इस रामरक्षा-मन्त्रको जो मनुष्य कण्ठस्थ कर लेता है तो संसारकी सारी सिद्धियां उसके हाथमें आ जाती हैं ॥ १९ ॥ जो प्राणी इस वज्रपंजर रामकवचका पाठ करता है, उसकी आज्ञा कहीं भी नहीं टलती और सर्वत्र उसकी विजय होती है ॥ २० ॥ स्वप्नमें यह रामरक्षामंत्र शिवजीने जैसा बतलाया था, सवेरे सोकर उठते ही विश्वामित्रने उसी तरह लिख दिया ॥ २१ ॥ राम, दाशरथि शूर, लक्ष्मणानुचर, बली काकुत्स्थ, पुरुष, कौसल्यानन्दवर्धन, वेदान्तवेद्य यज्ञेश, पुराणपुरुषोत्तम जानकीवल्लभ, श्रीमान् तथा अप्रमेय पराक्रम इन नामोंका श्रद्धापूर्वक जप करनेवाला भक्त दस हजार अश्वमेध यज्ञ करनेका फल पाता है। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ २२-२४ ॥ सन्नद्धकवची, खड्गी, चापबाणधर, युवा और लक्ष्मणके साथ जाते हुए श्रीरामचंद्र हमारे मनोरथोंकी रक्षा करें ॥२५॥ तरुण, रूपसंपन्न, सुकुमार महाबली, कमलकी नाईं बड़ी-बड़ी आँखोंवाले, पीतांबरधारी, फल-मूल खानेवाले, उदारप्रवृत्ति तपस्वी, ब्रह्मचारी, धन्वी, निस्त्रिंशधारी तथा काकपक्षकौ धारण किये दशरथके दोनों पुत्र राम और लक्ष्मण रास्तेमें जाते समय हमारी रक्षा करें । संसारी जीवोंके आधार, धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ, राक्षसकुलके विनाशक राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करें ॥ २६-२९ ॥ विल्कुल तैयार धनुष जिसपर बाण चढ़ा है, उसे लिये और अक्षय बाणवाले तूर्णीरको कसे राम-लक्ष्मण सदा रास्तेमें हमारे आगे-आगे चलें ॥ ३० ॥ जो कल्पवृक्षके आराम (बगीचा) समस्त विपत्तियोंके विराम (समाप्ति) और तीनों लोकोंमें अभिराम (सुन्दर) हैं, वे श्रीमान् रामचन्द्रजी हमारे प्रभु हैं ॥३१॥ राम, रामभद्र, सर्वस्रष्टा, रामचन्द्र, रघुनाथ, तथा सीताके पति रामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३२ । हे श्रीराम, हे रघुनन्दन राम, हे भरताग्रज राम, हे रणकर्कश श्रीराम, हे राम, हमको शरण हूजिए ॥ ३३ ॥ संसार भरमें अतिशय सुंदर, संग्राममें निपुण, कमल सरीखे नेत्रोंवाले, रघुवंशके स्वामी करुणाकी मूर्ति और दयाके भण्डार श्रीरामचन्द्रकी मैं शरणमें हूँ ॥३४॥ जिनकी दाहिनी ओर लक्ष्मण, बाईं ओर सीता और सामने हनुमान्जी उपस्थित हैं, ऐसे रघुनन्दव रामको मैं