श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 383, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ६ ] विवाहकाण्डम् १६७
कुशात्पुत्रः कुमुद्वत्यामतिथिस्तु भविष्यति । राज्यकर्ता वंशकर्ता स एवार्थं भविष्यति ॥ ७ ॥
अतस्त्वमधुना राम नागकन्याः कुशं विना । सप्त स्वस्वसुपुत्रेभ्यः प्रयच्छ विधिना द्विजैः ॥ ८ ॥
पञ्चगन्धर्वकन्याश्च यूपकेतुं कुशं लवम् । विना स्वस्वसुपुत्रेभ्यः प्रयच्छ रघुनन्दन । ९ ॥
राक्षसेन विवाहेन यूपकेतुः शिशुस्ततः । अग्रे पत्नीं मदानेप कश्चित्पन्नगं शुभाम् ॥ १० ॥
एवं रामसुताः सर्वे स्वस्वस्त्रीभ्यां यथासुखम् । क्रीडयिष्यन्ति पौत्रांश्चान भवितान्ति प्रपौत्रकाः ॥ ११ ॥
प्रपौत्रस्य प्रपौत्रं स्वं दृष्ट्वा सीतासमन्वितः । सुखं यास्यसि वैकुण्ठं बन्धुभिर्नगरीजनैः ॥ १२ ॥
एवं श्रुत्वा मुनेर्वाक्यमङ्गीकृत्य रघूद्वहः । तासां नामानि पप्रच्छ गन्धर्वान्पन्नगानपि ॥ १३ ॥
तदाऽब्रवीत्स गन्धर्वः स्वपुत्रीणां च तन्मनान् । तासां नामानि रामाग्रे पञ्चानां सम्प्रहृष्टधीः ॥ १४ ॥
चन्द्रिका चन्द्रवदना चञ्चला चपला चला । एवं नामानि पञ्चानां क्रमेण रघुनन्दनः ॥ १५ ॥
श्रुत्वाऽवलोकयामास पन्नगांस्तेऽपि चाब्रुवन् । कजानना कजनेत्रा कजांघी च कजावती ॥ १६ ॥
कळिका कमला चैव मालती मम कीर्त्तिताः । एवं नामानि पञ्चानां क्रमेण रघुनन्दनः ॥ १७ ॥
श्रुत्वा ताः पुष्पके स्थाप्य नैर्ऋत्यां गर्तुमैच्छिभिः । अथ प्रभाते श्रीरामः हृष्ट्वा स्नात्वा यथाविधि ॥ १८ ॥
गन्धर्वपन्नगांश्चापि तदा वचनमब्रवीत् । यमर्त्येनैव म साकं विवाहार्यं रमान्तराम् ॥ १९ ॥
नैव योग्यं समागन्तुं नगलोकान्निवासिना । तस्माच्छृणुध्व मद्वाक्यं सुहृदः सकलाः शुभम् ॥ २० ॥
यूयं गत्वा निजस्थानं स्वस्त्रीभिश्च बहुप्रजाः । आगतय्य विवाहार्यमयोध्यां मे यथासुखम् ॥ २१ ॥
अधुनाऽहं तु गच्छामि पुरीमग्र शयेन कि । विहायसा विमानेन पताकाध्वजमालिना ॥ २२ ।
तथेति रामवचनात्त गताः कक्षकूल नि हि । सोऽपि मुनिना ताभिर्बालिकाभिः सुतैः श्रिया ॥ २३ ॥
विहायसा पुष्पकस्थो ययौ पश्चवदान्ति मः । अयोध्यां प्रहरेणैव मुदा प्राप रघूद्वहः ॥ २४ ॥
कोई पुत्र नहीं होगा ॥ ५ ॥ ६ । हाँ, कुमुद्वतीमें कुशके अतिथि नामका पुत्र उत्पन्न होगा और वही पुत्र राज्यकर्ता एवं वंशका बढ़ानेवाला होगा। इससे हे राम ! कुशको छोड़कर बाकी सब कुमारोंका विवाह इन कन्याओंके साथ कर दीजिए। इनमें पाँच गन्धर्व-कन्याओंको यूपकेतु तथा कुश-लवके अतिरिक्त शेष पुत्रोंको दे दीजिए । ९ ॥ आगे चलकर यूपकेतु राक्षसविवाहके क्रमसे एक अच्छी स्त्रीके साथ विवाह करेगा ॥ १० ॥ हे राम ! ऐसा करनेसे सब पुत्र अपन-अपनी स्त्रियोंके साथ सुखपूर्वक विहार करेंगे। उनके पौत्र-प्रपौत्र आदि भी होवेंगे ११ । पश्चात् आप भी प्रपौत्रके प्रपौत्रोंको देखकर सीता अपने बन्धुओं और पुरवासियोंके साथ वैकुण्ठधामको जाओगे। इस प्रकार अगस्त्यजीकी बात सुनी तो उन्होंने अङ्गीकार कर लिया और उन गन्धर्व-पन्नगोंसे उन कन्याओंके नाम पूछने लगे ॥ १२ ॥ १३ ॥ गन्धर्वराज अपनी पाँच कन्याओंका नाम बतलाने लगे कि वे—चन्द्रिका, चन्द्रवदना, चञ्चला, चपला और चला ये इनके नाम हैं ॥ १४ ॥ कन्याओंका नाम सुनकर राम उनके ओर देखने लगे फिर पन्नग इस प्रकार अपनी सात कन्याओंके नाम बतलाने लगे—कजानना, कजनेत्रा, कजांघ्री, कजावती, कलिका, कमला और मालती ये सात नाम हैं। इस रीतिसे सबका नाम सुनकर रामने उन कन्याओंको पुष्पक विमानपर चढ़ा लिया और सब सर्षियोंके साथ सो गये। इसके अनन्तर प्रातःकालके समय राम उठे और विधिवत स्नान-हवन आदि किया ॥ १५-१८॥ फिर वे उन गन्धर्वों तथा पन्नगोंको बुलाकर कहने लगे हे गन्धर्व तथा पन्नगगण ! मैं मर्त्यलोकका निवासी मनुष्य हूँ। इस कारण मैं अपने बन्धुओंके भवनपर वा पन्नगलोकमें नहीं जा सकूँगा और न गन्धर्वोक्त यहाँ स्वर्गलोकको ही अपने बच्चोंका विवाह करने जा सकूँगा। इसपर आप लोग सब मेरी बात सुनिए ॥ १९ ॥ २० ॥ आपलोग अपने-अपने घर जायें और इनका विवाह करनेके लिए वहाँसे स्त्रियों तथा बन्धु-बान्धवोंके साथ आनन्दपूर्वक अयोध्या पधारें ॥ २१ ॥ कुछ देर बाद मैं अपने विमान द्वारा आकाशमार्गसे अपनी नगरीका रास्ता पकड़ूँगा ॥ २२ ॥ "बहुत अच्छा" कहकर वे गन्धर्व तथा पन्नग अपने-अपने स्थानको चले गये। इधर रामचन्द्रजी भी