भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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२४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३


इत्युक्त्वा जलकुम्भेऽथ विषेणाग्निं दशाननः । यावत्प्रक्षिप्यति कस्यायां तावत्तत्र ददर्श ह ॥२२२॥
पञ्च रत्नानि दिव्यानि गृहान्त्रा तानि रावणः । करण्डिकायां संस्थाप्य विमानेन ययौ पुरीम् ॥२२३॥
करण्डिकां देवगेहे संस्थाप्य रावणस्तदा । रात्रौ मंदोदरीं प्राह मंचकस्थां रहःस्थितः । २२४॥
हे मंदोदरि रत्नानि मया स्वल्पोपदानि हि । समानीतानि यत्नेन त्वदर्थं सुसमानि ॥२२५॥
करण्डिकायां वर्तन्ते गच्छ गृहाण तानि हि । तद्रहस्यवचः श्रुत्वा सा ययौ देवमन्दिरम् ॥२२६॥
करण्डिकां तत्र दृष्ट्वा तां नेतुं यत्नमन्वितं । यावदुच्चालयामास न चचाल तदा भुवः ॥२२७॥
तदा सा लज्जिता गत्वा रावणाय न्यवेदयत् । तच्छ्रुत्वा स प्रहस्याथ स्वयं नेतुं ययौ तदा ॥२२८॥
तां माऽप्युच्चालयामास न चचाल करण्डिका । यदा त्रिंशद्भुजैर्भूभ्यां न चचाल करण्डिका ॥२२९॥
तदा स विस्मयाविष्टो भयं मेने दशाननः । तत्रैवोद्घाटयामास रावणस्तां करण्डिकाम् ॥२३०॥
तावद्ददर्श तस्यां स कन्यां सूर्यप्रभोपमाम् । तत्तेजोहतनेत्रस्त्वन्यामश्वत्पि रखायाम् ॥२३१॥
तां द्रष्टुं बालिकामस्या ययुः सुहृद्गणादयः । तदा मंदोदरीं प्राह तस्या वृत्तं रणोद्भवम् ॥२३२॥
पद्मवाक्कुञ्जतात्यादि सर्वं वृत्तं दशाननः । क्रोधान्मन्दोदरी प्राह भयभीता दशाननम् ॥२३३॥
इयं कुन्था प्रविष्टा च कुलविध्वंसकारिणी । लंकां किमर्थमानीता दृष्ट्वा ज्ञात्वाऽपि चेष्टितम् ॥२३४॥
दृष्टा स्ववशपाताय श्मशाने मन्दरे वने बाल्येऽपीदृशी गुर्वी तारुण्ये किं करिष्यति । २३५॥
वधोऽस्यास्तव जानेऽहं मृत्युश्चैव भविष्यति । स्थापनीया न लङ्कायामियमग्रेऽथ रावण । २३६॥
इति तस्या वचः श्रुत्वा सत्यं मेने दशाननः । मन्त्रिभिश्चाथ सम्मन्त्र्य दूतानाज्ञापयत्तदा । २३७
करण्डिकेयं नीत्वाऽद्य विमाने स्थाप्य यत्नतः । त्यक्तव्या मय वाक्यात्तु वने गच्छत वेगतः ॥२३८॥
ततस्ते राक्षसाः सर्वे सम्भूय पुष्पकेऽथ ताम् । करण्डिकां तु संस्थाप्य निर्ययुराकाशवर्त्मना । २३९


॥ २२२-२२३ ॥ ऐसा कहकर दशानन ने उस घटमें अग्निको बुझा दिया और ज्यों ही उसमें देखने लगा, त्यों ही उसमें उस दिव्य पाँच रत्न दिखाया दिया। २२२॥ रावणने उन पाँचों रत्नोंको उठा लिया और उस मन्थन रस तथा विमानपर चढ़कर अपनी नगरीको चला गया ॥२२३॥ वहाँ जाकर रावणने उस सन्दूकको देवगृहमें रखकर रात्रिके समय एकान्तमें पलंगपर बैठी हुई मन्दोदरी से कहा - ॥ २२४॥ हे मन्दोदरि ! जिन्हें देखकर तुम सन्तुष्ट हो जाओगी, ऐसे कुछ रत्न मैं बड़े परिश्रमसे तुम्हारे लिये ले आया हूँ। वे देवालयमें सन्दूकके भीतर रक्खे हैं, जाकर ले आओ। रावणका वचन सुनकर वह देवालयमें गयी ॥ २२५॥ २२६॥ सन्दूकको देख उसे पतिगृहके पास ले जानेके लिये उठाया तो वह जमीनसे तनिक भी नहीं उठी, तब उसने लज्जित होकर रावणसे सब हाल कहा। यह सुनता हुआ हँसकर रावण स्वयं उसे लानेके लिये गया और उसे उठाया, किन्तु वह टससे मस नहीं हुआ ॥ २२८॥ २२९॥ इससे रावण बड़ा विस्मित हुआ और डर गया। फिर उसने वहीं उस सन्दूकको खोला ॥२३० तब उस समय सूर्यके समान कान्तिवाली एक कन्या दिखायी दी। उसके तेजसे अन्धा होकर सहसा आँख बंद करने लगा । २३१॥ उस मनोहर बालिकाको देखनेके लिये उसके मित्र तथा गुरु आदि आने लगे। उस समय रावणने मन्दोदरीको युद्धका तथा जैसे वह राजा पद्माक्षके कुञ्जमें उत्पन्न हुई थी, वह सब वृत्तान्त कह सुनाया। मन्दोदरी भयभीत होकर क्रोधपूर्वक दशाननसे कहने लगी- ॥२३२ । २३३ । इस कुमथना, कुलविध्वंसकारिणी तथा प्रचण्डाके कर्मोंको जानते हुए भी तुम इसको लंकामें क्यों ले आय ? ॥ २३४॥ यह दुष्टा तुम्हारे कुलका नाश करनेवाली है। इसको शीघ्र वनमें छुड़वा दो । बचपनमें ही यह इतनी भारी है तो जवानीमें न जाने क्या करेगी ॥ २३५॥ इससे तुम्हारी मृत्यु होगी। ऐसा मुझे जान पड़ता है। इसको लंकामें घड़ी भर भी नहीं रखना चाहिये । २३६ । रावणने मन्दोदरीकी बात सत्य समझा तथा मन्त्रियोंसे मन्त्रणा करके दूतोंको आज्ञा दी—॥२३७॥ इस सन्दूकको यत्नपूर्वक शीघ्र विमानमें रखकर आज ही मेरे कथनानुसार वनमें छोड़ आओ। २३८॥ पश्चात् वे सब राक्षस इकट्ठे हो तथा उस संन्दूकको विमानमें रखकर आकाशमार्गसे चले ॥ २३९॥ उस समय