श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 418, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४०२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः २ |
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यानारूढा कृता पात्रा वेश्याः स्पृष्टास्तथा रहः । पतिव्रतायां सीतायां दोषारोपः कृतोऽपि च ॥५९॥
पुत्रं हंतुं कृता ज्ञाज्ञा शूद्रसिंह्यौ हतौ, पत्नीसक्ताऽऽश्रिता येन पश्यता पालिता नृपैः ॥६०॥
रामोपासक उवाच
अंते कृष्णस्य ते शापादंशच्छेदो ऽभूद्विज । अब्धिना लोपिता यस्य नगरी द्वारका शुभा ॥६१॥
स्वगोत्रस्य वधस्त्वंते मद्यपानादि यत्कुले । दर्शनं चार्ज्युनायान्ते येन मित्राय नार्पितम् ॥६२॥
स्वस्थानं गमनं येन कृतमेकाकिना तथा । स खतोऽपि कृतस्वान्ते व्याधेनाल्पेन पत्रिणा ॥६३॥
कृष्णोपासक उवाच
तव रामेण समरः पुत्रेणापि कृतो महान् । तथा सीता मया त्यक्ता चेति लोकं प्रतार्य च ॥६४॥
वाल्मीकेराश्रमं गत्वा दृष्टौ सीतासुतौ रहः पिण्याकेन तथेङ्गुद्या पिंडदानदिकं कृतम् ॥६५॥
दंडके तव रामेण स्वपित्रे अमताऽर्पितम् । तयैरावणमुक्तायाः स्पृष्टः स नभस्तः स्थले ॥६६॥
तथाऽश्वत्थच्छेदनाथं महान् यत्नः कृतो मुहुः । स्वमन्त्रिणश्च शेषायुःपूत्यर्थं सङ्गरोऽपि च ॥६७॥
कारितो यमराजेन पूर्वजेन लवादिभिः । पुष्पास्वादनमात्रादिपत्न्यः शिक्षा तथा कृता ॥६८॥
मम कृष्णेन बालत्वे लीलया पूतना हता । हतास्तृणासुराद्याश्च धृतोऽङ्गुल्या गिरिस्तथा ॥६९॥
रामोपासक उवाच
मम रामेण बालत्वे लीलया ताटिका हता । मारीचाद्या हताश्चारि पर्वतास्तारिता जले ॥७०॥
कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णस्वरूपेण गोपिका मोहिता व्रजे । मोहिता राधिका श्रेष्ठा मदनस्यापि मोहिनी ॥७१॥
रामोपासक उवाच
मम रामेण देवानां मोहिताः स्त्रीस्वरूपतः । देवपत्न्यो रहो रात्रौ मातृतुल्या विचिन्तिताः ॥७२॥
बनाया ॥ ५७॥ दूसरेके घरम रही हुई स्त्रीको लाकर घरम रख लिया । फिर उसी स्त्रीके साथ निठुराई की । बहुत सी स्त्रियां कामवाञ्छाके लिये पहुंचीं, किन्तु उनकी कामना उन्होंने पूर्ण नहीं की ॥५८॥ सवारीपर चलकर तीर्थयात्रा की । एकान्तमें वेश्यागमन करके पतिव्रता सोतापर झूठमूठका दोषारोप किया ॥ ५९ ॥ उन्होंने अपने पुत्र लव तकको मारनेकी आज्ञा दे दी और शम्बुक शूद्र तथा सिंहिका वध किया । ६० । रामोपासकने कहा-हे द्विज ! अन्तमे तुम्हारे कृष्णका ब्राह्मणके शापसे वंश नष्ट हुआ था । उनकी द्वारिकापुरीको समुद्रने लय कर लिया ॥ ६१ ॥ उन्होंने मद्यपान करवाकर अपने कुटुम्बियोंका वध किया । अन्तिम समयमे अपन अतिप्रिय मित्र अर्जुनको भी दर्शन नहीं दिया ॥ ६२ ॥ उन्होंने अकेले ही यहसि गोलोककी यात्रा की । एक बहेलियेके साधारण बाण द्वारा उन्होंने अपना अन्त किया । ६३ ॥ कृष्णोपासक बोला-तुम्हारे रामने अपने पुत्रके साथ महान् संग्राम किया था। "मैने सीताका परित्याग कर दिया है" ऐसा संसारको दिखलाते हुए भी वाल्मीकिके आश्रमपर जाकर चुपकेसे सीताको और अपने बेटेको देख आये । पिण्याक और इंगुदीके फलसे अपने पिताको पिण्डदान दिया ॥ ६४ ॥ ६५ । सब दण्डकारण्यमें इधर-उधर घूम रहे थे, तब भी इन्हीं फलोंसे पिताका श्राद्ध किया था। ऐरावत द्वारा भोगे हुए मंचको उठाकर पृथ्वीतलमें ले आये ॥ ६६ ॥ अश्वत्थ काटनेके अपराधपर रामने एक महायज्ञ किया। मन्त्रियोंकी शेष आयुकी पूर्तिके निमित्त अपने बड़े बेटेको यमराजसे लड़ा दिया और केवल फूल सूंघ लेनेसे स्त्रियोंको भी उन्होंने दण्ड दिया ॥ ६७ । ६८ । हमारे कृष्णने बाल्यकालमें खेल-खेलमें ही पूतनाको मार डाला। तृणासुर आदि दैत्योंको मारकर गोवर्धन गिरिको अँगुलियोंपर उठा लिया ॥ ६९ ॥ रामोपासकने कहा हमारे रामने बाल्यकालके समय खेल-खेलमे ताटका तथा मारीचादि कितने ही राक्षसोंको मार डाला और पानीमें पत्थर तैराया ॥ ७० ॥ कृष्णोपासक बोला-हमारे प्रभु कृष्णने अपने सुन्दर रूपसे