भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 811 में से

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२६आनन्दरामायणे[ सर्गः ३

शूद्रेण कर्षयामास भूमिं कृष्यर्थमादरात् । तदा हलमुखाग्रेण निर्गता सा करंडिका ॥२५७॥ तां गृहीत्वा स शूद्रोऽपि ययौ भूमिपतिं द्विजम् । स मत्वा तन्निधानं तु ह्युत्प्रेक्षाप्राप्तद्विजोत्तमम् ॥२५८॥ श्रेष्ठस्त्वं मुहूर्तोऽय महाभाग्यं तव द्विज । इमं हलाग्रसंभूतां गृहाण त्वं करंडिकाम् । २५९॥ निधानपूरितां गुर्वी मया यत्नेन बाहिताम् । ततः स द्विजवर्यस्तु तां जगाद करंडिकाम् । २६० । तामानीय विदेहाय सभामध्ये ददौ मुदा नृशंसं प्राह वृतं तद्विप्रः श्रुत्वा नृपोऽपि सः ॥२६१। उवाच ब्राह्मण भक्त्या मया भूमिः समर्पिता तस्यां लब्धा त्वया चेयं त्वमेवास्तु करंडिका ।२६२। विदेहवृपतेर्वाक्यं श्रुत्वोवाच द्विजः पुनः । मद्यं समर्पिता पूर्वं भूमिरंव मया नृप । २६३॥ नैषा करंडिका रम्या वसुपूर्णा समर्पिता । यद्भूभौ वर्तते वित्तं तन्नृपस्य न संशयः ॥२६४ मा मामधर्मः युङ्क्त गृहाणेषां करंडिकाम् एवं नृपस्य विप्रेण कलहोऽभूत्सुदारुणः ॥२६५ । तदा सभासदाः सर्वे नृपतिं वाक्यमब्रुवन् । मा काशः करंडो राजन् पश्यास्यां किं नु वर्तते । २६६॥ ता तदोद्घाटयामास दूतैर्नृपतिसत्तमः । तस्यां दृष्ट्वा बालिकां तु विस्मयं प्राप पार्थिवः । २६७॥ द्विजस्त्यक्त्वा ययौ गेह पालयामास तां नृपः । तदा खेचव्यचांगानि नेदुः कुसुमवृष्टिभि ॥२६८ ववृषुः सुरसंघाश्च तां कन्या जनकं नृपम् । गंधर्वा गायनं चक्रुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः । २६९ । तदा मेने निजा कन्यां जनकोऽतोषमाप सः । जातकं कारयामास विप्रैस्तस्याः सविस्तरम् ॥ २७० । ददौ दानानि विप्रेभ्यो ननृतुर्वारयोषितः । मातुलुङ्गाभिर्गता या मातुलुङ्गीति सा स्मृता ॥२७१ । अग्निशालाद्विनिर्गतां तथा रत्नावलीति च । स्वर्नान्तर्गतत्वाच्च प्रोच्यते जगतीतले ॥२७२॥ धरण्या निर्गता यस्मान्नाम्नाद्धरणितीति च । जनकेनापिता यस्माज्जानकीति प्रकीर्त्यते । २७३॥

उसका सब काम सदयको बतलाया प्रसन्न होकर ॥ २५६ ॥ उस ब्राह्मण आदरपूर्वक शूद्रस उस उपायमय मकार लिए हल चलवाया । उसी समय इसके फलसे यह सबब विचित्र आयो । २५७ ।। उसको देखकर वह शूद्र जमीनके मालिकके पास गया और उसको दृढ खजाना समझकर महर्षि ब्राह्मणके कहने लगा हे द्विज ! आप बड़े भाग्यशाली है आपने अच्छा मुहूर्तमें काम आरम्भ करवाया। यह हलके अग्रभागसे (अर्थात् फारका जिसका मन्त्रतन्त्र खींचा करते है) बहुत (प्रान्त) सन्तुष्टको लिये । मै लगनसे भरी हुई बड़ा भारी इस पिटारीको बड़ी कठिनता उठाके लाया हूँ। उस द्विजने उसको ले लिया । २५८-२६० । उसक ले जाकर ब्राह्मणने सभाके सामने राजा विदेहको दिया और सब समाचार कह सुनाया। राजा भी यह सुनकर ब्राह्मण कहने लगे कि मैने तो भक्तिस भूमि आपकी समर्पण कर दी है। तवं उसमन मिली हुई यह पिटारी भी आप ही की है ॥ २६१ ॥ २६२ ॥ राजा विदेहके वचनको सुनकर ब्राह्मण उनसे कहने लगा- हे नृप आपने मुझे भूमि ही दी है॥ २६३ यह धनपूर्ण सुन्दर संदूक नही दी थी। इसलिए जो भूमिमें धन है वह निर्विवाद राजाका ही होता है। २६४ ! मुझे अधर्ममें न डाल और इस पिटारीको आप ही बहण कर। इस प्रकार राज' तथा ब्राह्मणमे बडा झगड़ा होने लगा। तब सब सभासदोन राजासे कहा-हे राजन् ! बक्सूको छोड़ें और देख कि इसमे क्या है ? ॥ २६५ । २६६ । तव नृपतिश्रेष्ठ श्रेष्ठ नृपति विदेहने दूतोंप संदूक खुलवायी । उसमें बालिकाको देखकर राजा बडे विस्मित हुए। ब्राह्मण उसे देवी छोड़कर घर चला गया। तब राजाने हो उस कन्याको पाल लिया। तब देवताओंक बाजे बजे और उन्होने उस कन्या तथा राजाके ऊपर पुष्पवृष्टि की । गन्धर्व गाने लगे । अप्सराये नृत्य करन लगीं ॥ २६७-२६९ ॥ तब राजा जनकने प्रसन्न होकर उसको अपनी पुत्री माना। ब्राह्मणोके द्वारा विस्तारपूर्वक उसका जातकर्मसंस्कार ( सन्तानके उत्पन्न होनेपर करनेका संस्कार ) करवाया ॥ २७० ॥ विप्रोको बहुतसे दान दिये और वेश्याओंका गायन करवाया गया । बगीचेमें वह कन्या मातुलुङ्कफलसे निकलनेके कारण मातुलुङ्गी, अग्निमे वास करनेसे अग्निगर्भा तथा रत्नोंमें निवास करनेसे रत्नावली कही जाने लगी ॥ २७१ ॥ २७२, धरणीसे निकलने-

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