भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 423

सर्गः ४ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४०९

चतुर्थः सर्गः

( रामका कौवियोंको वरदान एवं मृतकासुरोपाख्यान )

श्रीरामदास उवाच

एकदा राघवः शिष्यै समाजस्थो जनैर्वृतः । ददर्श द्राक्षावल्लीनां मंडपे काकमुत्तमम् ॥ १ ॥
उभयोर्नेत्रयोरेकनेत्रवृत्तिममन्वितम् । अतिदीर्घं कृशं व्यग्रदृष्टिं दीर्घस्वरं चलन् ॥ २ ॥
मुहुर्मुहुः पश्यन्तमात्मानं शब्दपूर्वकम् । तं दृष्ट्वा बन्धुपार्थिवः स्मृत्वा कोपं पुरा कृतम् ॥ ३ ॥
उवाच काकं श्रीरामः सुखमागच्छ मेऽन्तिकम् । तद्रामवचनं श्रुत्वा द्राक्षावल्ल्यथ मंडपात् ॥ ४ ॥
शीघ्रमुड्डीय काकस्तु रामाग्रे सदसि स्थितः । रामं पश्यन्द्वीक्ष्यतं स चकार मुहुर्मुहुः ॥ ५ ॥
तदा तं राघवः प्राह दग्ध्वाऽपिक्षीयमानसः । नेत्रं विना चगस्त्यान्मु काक पाथश्च मां प्रति ॥ ६ ॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा काकः प्राहान्नृपतिम् कृपालोकन राम नद्यास्तु मव सर्वदा । ७
किं वरैरन्यैर्व्यर्थैरित्थ मुहुर्मुहुः । तच्छुत्वावचनं श्रुत्वा गमस्तं वाक्यमब्रवीत् ॥ ८ ॥
दीपांतरेषु यद्वृत्तं भविष्यं चोत्तरं च यत् । संजातं च भवेत्तन्तेऽक्षिपथेऽस्तु तत् ॥ ९ ॥
भाविकार्याणि सर्वाणि काक त्वं बोधयन्तः । जनाः पश्यंतु ते शष्पा शकुनाथं विनिर्णयम् ॥ १० ॥
स्थिरत्वे स्थिरकार्याणि गते गन्तव्यसिद्धिदम् । भविष्यन्ति हि कार्याणि नृणां शकुन निर्णयैः ॥ ११ ॥
पश्यंतु सकला भूमौ जनाः कार्यविदो । ग्रामे गृहप्रवेशे ते वामभागे न चेद्बहिः ॥ १२ ॥
गमनं दक्षिणं भागं पांथे गमनं तदा । लोकानामस्तु शकुनं महामंगलकारकम् ॥ १३ ॥
अतद्दशाहपिंडाय यदि स्पर्शो भवन्न ते माऽस्तु तद्दिनिर्लेपां प्रेतानां मम वाक्यतः ॥ १४ ॥
अन्तकाले मानरस्य वाञ्छितं नैव पूरितम् । प्रेतदशाहपिंडस्याप्यसंज्ञान्नरतु सन्नराः ॥ १५ ॥
प्रेतस्य वंशजः कश्चिद्यतोऽताथ वाञ्छाए । तन्ने स्पर्शाद्विनिर्दिश्य तु स पदा दूरपिष्यति ॥ १६ ॥


श्रीरामदास कहन...-हे शिष्य ! एक दिन बहुत मनुष्योंस घिरे हुए रामचन्द्रजी सभामे बैठे थे। तभी अंगूरका लताके मंडपपर कौवा देखा कि वह एक ही नेत्रसे दोनों नेत्रोंका काम ले रहा है। कौआ अपनी आकृतिसे अतिदीर्घ, शब्दपूर्वक मुहुर्मुहु देखता और चञ्चल दीखता है ॥ १ ॥ २ ॥ रामचन्द्रजीने देखा कि मुह बार बार मुड़ा और भाग रहा है और कौंव-कौंव करके बोलता भी जाता है। उसकी यह दशा देखकर रामके हृदयमें दया आयी और अपने पूर्व किये हुए कोपका स्मरण करके कौएसे बोले-हे काक ! तू हमारे पास आ जा। यह सुनकर कौवा उस लताके मंडपसे उड़ा और रामके आगे आकर बैठ गया। सभा में वह रामको देखता हुआ बार बार शब्द करने लगा ॥ ३-५ ॥ रामने कौएसे कहा-तू अपने नेत्रोंके सिवाय जो कुछ भी वर मांगना चाहे, मांग ले ॥ ६ ॥ इस प्रकारकी बातें सुनकर पूर्वोक्त रामसे कौआ कहने लगा-हे राम ! मेरे ऊपर इस तरह सदा आपकी कृपादृष्टि बनी रहे ॥ ७॥ केवल इस लोकमें सुख देनेवाले अन्य वरदानोंको लेकर मै क्या करूंगा ॥ ८ ॥ कौएका बात सुनकर रामचन्द्रजीने कहा-किसी द्वीपान्तरमें भी होनेवाला भूत, भविष्य और वर्तमानकी सब बातें तुम्हारे आँखोंके सामने रहेंगी ॥ ९ ॥ होनेवाले अच्छे। भविष्यके सब कार्योंका तुम मर वरदानसे जान लोगे। मनुष्य कहीं जाते समय सदा तुम्हारा शकुन देखा करेंगे ॥ १० ॥ जब तुम बैठ रहोगे, तब देखनेवाले पथिकका काम रुक जायगा और जब चलोगे,दोगे तो उसका कार्य सद्यः पूर्ण हो जायगा। इस प्रकार लोग तुम्हारा शकुन देखेंगे ॥ ११ ॥ ग्रामप्रवेश या गृहप्रवेशके समय तुम जिसकी दाहिनी ओरसे निकल जाओगे, वह परम मङ्गलकारक शकुन होगा ॥ १२ ॥ १३ ॥ प्रेतके दशाहपिण्डको जब तक तुम नहीं छू लोगे, तब तक उस प्रेतकी सद्गति कदापि नहीं होगी ॥ १४॥ यदि प्रेतके दशाहपिण्डको नहीं छुओगे तो उसके घरवाले लोग समझेंगे कि अभी प्रेतकी इच्छा पूरी नहीं हुई है। प्रेतका कोई वंशज, तुम जिन-जिन चीजोंको नहीं छुवोगे,