भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 425, कुल 811 में से

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पृष्ठ 425

सर्गः ४ ] गन्धर्वकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४०९


ताः सर्वा राघवः प्राह किमर्थमिह कृत्स्नके । सर्वाभरणसन्नाद्धा मत्समीपं मां कथ्यतां स्त्रियः ॥ ३४॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा विलज्जन्यः पुरस्त्रियः । अवाङ्मुखाः सस्मिताश्च तूष्णीमेव समन्ततः ॥ ३५॥
तासु दाक्षिण्यदा रामं लज्जायाऽवाङ्मुदोऽवदत् । वयं प्रजासि प्रभभो यदर्थमागता वयम् ॥ ३६॥
उपेक्षणीया नो राम वयं सर्वाः स्त्रियस्त्वया । इति तद्भावविज्ञाता ज्ञात्वा स रघुनन्दनः ॥ ३७॥
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं शृणुध्वं प्रमदोत्तमाः । एकपत्नीव्रतं चेदस्ति मातृवन्त्याः स्त्रियो मम ॥ ३८॥
इतराः सकलाः सीताविरहिताश्चेह जन्मनि । गच्छध्वं निजगेहानि मां माऽभ्यर्थयन्तु मयि नृपे ॥ ३९॥
राज्यं क्षमसि नो नार्यः क्षमितं वोऽपराधितम् । इति ता रामवाक्येभ्यः कामबाणप्रपीडिताः ॥ ४०॥
ताडिताश्च त्रिदोषेव निपेतुर्मूच्छिता भुवि । पतितास्ता निरीक्ष्याथ स्री रामोऽतिविह्वलः ॥ ४१॥
ता उवाच पुनः शीघ्रं मधुरारुष्यैः कृपान्वितः । शृणुध्वं मे वचो नार्यः शृङ्गारस्त्वां मया सह । ४२।
युष्माकं न भवेत्तद्विद्रतभङ्गोऽपि मे भवेत् । अतः शृणुत मे वाक्यं यागे पूर्वं मयाऽर्पिताः । ४३।
गुरवे रुक्मजाश्चैव सीतायाः शतपूर्तयः । तासां फलेन युष्माभिर्विहारे ऽहं जनं द्विम् ॥ ४४॥
करिष्यामि न संदेहः कृष्णरूपेण वै सुतम् । वाणनृपाणां युष्माभिर्जनितव्यं राजिवंशजा ॥४५॥
भौमासुरश्च युष्माकं संहरिष्यति वै यदा । तदा ममो मोच्यामि हत्वा तं अवनीसुतम् ॥४६॥
करिष्यामि विवाहांच रुक्मवर्णाङ्ककाञ्चिभिः । सापाडशसहस्राण्यार्द्धमेतोभ्याः शतं महत् ॥४७॥
इति रामवचः श्रुत्वा दृष्टास्ता वृत्तयोषितः । नम्र्वा रामं ययुः सर्वास्तूर्णी स्वं स्वं गृहं प्रति ॥४८॥
तः श्रोस्ता विसर्ज्ज्यायीरामो दानीः समाहयतान् । दृष्ट्वा कामपि नो दत्त्वांगमो दामास्तदाह्वयत् ॥४९॥
तेषामेकं न दृष्ट्वास दूतपालात्समाह्वयत् । तानप्यदृष्ट्वा रामस्तु रक्षकांश्च समाह्वयत् ॥५०॥


देखा कि वे सब पुरवासिनी स्त्रियाँ सुवर्णके अलङ्कार पहिने हैं। भगवान् रामको उठा हुआ देखकर उन्होंने प्रणाम किया और अपना मस्तक पृथ्वीपर रखकर विविध प्रकारसे भगवान्की स्तुति करने लगीं ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ उनसे रामने पूछा कि तुम सब यहाँ इतना रुचिर किस लिए आयी हो ? मुझ सब-सब बतला दो ॥ ३४ ॥ रामको बात सुनकर वे पुरवासिनी स्त्रियाँ लज्जित हुई हुई माथा नाव करके चुपचाप खड़ी रह गयीं ॥ ३५ ॥ किन्तु उनमेंसे एक लज्जित होकर कहा—हे प्रभो ! आप सब जानते हुए भी हमसे आनेका कारण पूछ रहे हैं ? हम जिस लिए आयी हैं, आप वह सब जानन ही हैं ॥ ३६ ॥ हे राम ! अब आप हमारी उपेक्षा न कीजिये । इस प्रकारकी बातींस राम उनका अभिप्राय समझ गये और मीठी वाणीमें समझाते हुए कहने लगे- हे मन्दिरोंगी ! मैं एकपत्नीव्रतधारी हूँ। मेरे लिए इस जन्ममें सीताके सिवाय संसारकी सब नारियाँ माताके समान हैं ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ तुम सब अपने-अपने घरोंको चली जाओ । मैं राजा हूँ। भरे ऊपर तुम सब याचना मतदो ॥ ३९ ॥ जब तक में प्रजाका शासक हूँ तबतक ऐसा अनर्थ नहीं हो सकता । जाओ, मैंने तुम्हारा अपराध क्षम किया। यह सुना तो कामवाणसे पीडित वे स्त्रियाँ राघवं वाक्यरूपी बाणमें विड और मूच्छित होकर पृथ्वोपर गिर पड़ीं। उनका इस प्रकार गिरी देखकर रामचन्द्रजी बहुत विह्वल हो गये ॥ ४० ॥ ४१ ॥ वे कृपापूर्वक उनसे कहने लगे—हे राष्ट्रियो ! मैं तुम्हारा मनोभाव जानता हूँ, किन्तु केवल एक बारकी पतित तुम लोगोंकी इच्छा रही भगेगी और मेरा व्रत का भंग हो जावेगा। इसलिए मेरी बात सुनो--अभ यत् नहुत किया पग्ले यज्ञमें मैंने सीताको सौ सुवर्णकी मूर्तियाँ दान दी हैं। उन्हींके फलसे द्वापरमें में कृष्ण होकर बहुत विलासक तुम सब के साथ क्रीडा करूँगा ॥ ४२-४३ ॥ तुम सब उस समय अनेक राजाओंकी पुत्नी होकर जन्म लोगी । जब भौमासुर तुम सबको चुरा ले जायगा तब मैं वहाँ पहुंचकर उस मारूँगा और तुम्हें उससे छुड़ाऊँगा। तुम सबका विवाह द्वारका-पुरीमें होगा । उस समय तुम्हारी संख्या सोलह हजारसे भी ऊपर रहेगी और में भी दो रहूँगा ॥ ४४-४७ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने भगवान्‌को प्रणाम किया और चुपचाप अपने-अपने घरोंको लौट गयी उस स्त्रियोंको विदा करके रामचन्द्रजीने दासियोंको बुलाया, किन्तु

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