श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 432, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४१६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ५ |
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प्रासादे सा कदा तस्थौ कदा प्रासादमूर्धनि । कदा द्राक्षामण्डपधः कदा स्रस्तविभूषणा ॥ २ ॥ वारांगनां कदा नृत्यं ददर्श जनकात्मजा । कदा जयार्थं रामस्य कार्त्तवीर्यमपूजयत् ॥ ३ ॥ कदाऽकरोच्च तुलसीशिवाश्वत्थान प्रदक्षिणाः । मन्युसूक्तानि विप्रैश्च पाठयामास जानकी ॥ ४ ॥ गोमयेनांजनेयं सा कुड्यां कृत्वाऽर्च्य जानकी अक्रेग्रन्थ्यहं पुच्छवृद्धिं स्वांगुलिमाग्रतः ॥ ५ ॥ शतरुद्रीयसूक्तस्य जयार्थं राघवस्य सा । दुर्गायाः पूजनं नित्यं चकार नियतव्रता ॥ ६ ॥ गणेशं मारुतिं शम्भुं स्थण्डिले स्थाप्य प्रेमतः चक्रऽरुणदृशा द्वाराणि गवाक्षं सेव्यञ्जलम् । ७ ॥ कार्त्तवीर्यस्य यंत्राणि स्थापयामास जानकी । मञ्चके राघवेंद्रस्य पूजयामास सर्वदा ॥ ८ ॥ कदा सखीमध्यगा सा त्यक्तालङ्कारमण्डना । जलशय्यांतिके निद्रां नाप सद्विरहाग्निना ॥ ९ ॥ कदा निरीक्ष्य प्रासादे काकमाह विदेहजा । यदि शीघ्रं राघवस्य दर्शनं मे भविष्यति ॥ १०॥ तर्हि त्वं गच्छ वेगेन नो चेदत्र स्थिरो भव । तन्मात वचनं श्रुत्वा काकस्तूड्डीय वेगतः ॥११॥ तेन किंचिन्ममाश्वस्ता पवनं प्राह जानकी । पृष्ट्वा त्वं राघवांगानि मां स्पृशं कर्तुमर्हसि ॥१२॥ कदा चंद्रं निशि प्राह त्व स्पृष्ट्वा शीतलैः करैः । श्रीरामं मां स्पृशस्याद्य स्वकरैः सुखकारकैः ॥१३ । शुक्लपक्षे द्वितीयायां संताऽलङ्कारमण्डिता । स्नात्वा प्रासाद मायानत्सखीभिः परिवेष्टिता ॥ १४ ॥ अपश्यच्छश्विनं दृष्ट्वेदं रामोऽय पश्यति । अन्तरैवाद्य रामस्य संयोगो मां भवेदिति ॥१५॥ रामे गते कदा सीता हरिद्राकज्जलदिकं । नात्मानं भूषयामास प्रतिपन्त्यपिनं विना ॥१६॥ चंदनं पुष्पमालाश्च पुष्पशय्यां विदेहजा । नांगीचकार श्रीरामविरहानलपीडिता ॥१७। शकुनान सा ददर्शथ श्रीरामदर्शनेच्छया । तुष्टाऽभूच्छकुनैः श्रुत्वा शीघ्र रामसमागम्ः ॥१८॥
वे कभी अटारीपर कभी छतपर और कभी अंगूरोंकी झाडीमें अपने वस्त्राभूषण उतारकर बैठी रहतीं थीं ॥ २ ॥ कभी वेश्याओंके नृत्य देखकर जी बहलाना चाहती और कभी रामचन्द्रकी विजयकामनास कार्त्तवीर्य भगवान्का पूजन करती थी । ३ । तुलसी पिप्पल आदिके वृक्षोंको प्रदक्षिणा करती थीं ब्राह्मण द्वारा मन्यु-सूक्तका पाठ करवाती थी । कभी पृथ्वीपर गोबरसे हनुमानजीकी प्रतिमा बनाकर पूजन करना और हर रोज एक अंगुल उनकी पूंछ बढ़ाया करती थी ॥ ४ ॥ ५ ॥ रामचन्द्रकी जयके लिए ब्राह्मण द्वारा ही सौ रुद्राका पाठ करवाती और दुर्गाजीकी पूजा करती थी ॥ ६ ॥ गणेश, मारुति तथा शंभु इनको अलग बिठाकर दरवाजे बन्द कर लेती । फिर खिड़कीसे उनपर जलधारा डाला करती थीं ॥ ७॥ रामचन्द्रजीके मंचपर कार्त्तवीर्य्यक यंत्र स्थापित करके सदा सर्वदा उनका पूजन करतीं थी । ८ ॥ कभी सहेलियोंम बैठी बैठी अपन अलंकारोंको फेंक देतीं और सखियों उन्हें फौहारेके पास ले जाकर सुलानेकी चेष्टा करतीं, फिर भी निद्रा नहीं आती थी । ९ ॥ कभी अटारीपर बैठे हुए कौएको देखकर सीता कहने लगतीं—'यदि मुझे शीघ्र रामचन्द्रके दर्शन होनेवाले हों तो ऐ कौए ! तू यहाँसे उड़ जा, नहीं तो बैठ' सीताकी बात सुनकर कौआ उड़ जाता। उससे सीताके हृदयको बहुत कुछ ढाढ़स बँध जाया करता था। १० । ११ ॥ इसके बाद सीता पवनसे कहतीं—'हे पवन ! तुम पहले रामचन्द्रजीका स्पर्श करके मुझे स्पर्श करो तो बड़ा उपकार हो' १२ ॥ रात्रिके समय कभी-कभी चन्द्रम से विनय करती—हे चन्द्रदेव ! तुम अपनी ठंढी किरणोंसे रामचन्द्रके शरीरका स्पर्श करके उन सुखदायिनी किरणोंको मरेपर डालो ।। १३ ।। शुक्लपक्षकी द्वितीयाको सीता विविध प्रकारके वस्त्र और आभूषणोंको पहनकर सखियोंके साथ प्रासादके ऊपर जाती और इस भावनासे चन्द्रदेवका दर्शन करती कि राम आज जहाँ कहीं भी होंगे, चन्द्रमाका दर्शन अवश्य करेंगे। ईश्वर चाहेगे तो शीघ्र ही हमारा और उनका मिलन होगा ॥ १४ ॥ १५ ॥ जबसे रामचन्द्रजी गये थे, तबसे उन्होंने अपने शरीरमें न हल्दी लगायी, न आँखम काजळ दिया और न किसी प्रकारके वस्त्राभूषण पहने ॥ १६ ॥ श्रीरामचन्द्रके विरहानलसे पीडित सीताने चन्दन, पुष्प, फूलकी मालाएँ, फूलकी शय्या आदि कुछ भी नहीं अङ्गीकार किया ॥ १७ ॥ रामके दर्शनोंकी इच्छासे वे सदा शकुन उठाया करती थीं । यदि