भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 811 में से

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पृष्ठ 46

३० आनन्दरामायणे [ सर्गः ३

नटा मङ्गलगीतानि तुष्टुवुस्ते महारथैः। तदा दानान्यनेकानि चक्रतुस्तौ नृपोत्तमौ ॥३२१॥ अथ ते बालकाः सर्वे वधूः स्थाप्य करीन्द्रषु । राघवेण दिवानिद्राभिषेकेऽभून्मे भोजनमुत्सवात् ॥३२२॥ भद्रास्त्रांसिंचनं चक्रुः संपूज्य शर्व स स्मर । ते रामादिकाः सर्वे स्वस्वपत्न्या पृथक्सुखाः ॥३२३॥ चक्रुस्ते भोजनं हृष्टाः स्त्रीभिः सर्वत्र वांञ्छिता । गजा दत्त्वाभ्रश्वांश्च सुहृद्भिश्च नृपोत्तमैः ॥३२४॥ पौरैर्जानपदैस्तृष्टैर्मुनिभिः परिवेष्टितैः। जनकस्य गृहं गत्वा चकार भोजनं मुदा ॥३२५॥ कौसल्य द्य, स्त्रियः प्रीतिश्चक्रुर्भोजनमुत्तमम् सुमेधया प्रार्थितास्ता वदित्यथ मुहुर्मुहुः ॥३२६॥ एव मुत्सवेऽभून्मासत्रयं जनको मुदा। अथ ते बालकाः सर्वं स्वैर्वाक्यान्यामन्त्रयद्विधौ ॥३२७॥ स्वस्वपत्न्याः पादयोः स्वारोग्यभिनन्दन मुहुः। चक्रुःप्रष्ट्वेदमस्ते तस्मा नेमुः पृथक् पृथक् । कुङ्कुमालिम्पदाथ तैरुमकेषु ता ददुः । ३२८॥ श्रीरामः समवाप्य भूमिसन तन्मात्रा जगज्जानकी महाभागा वराङ्गेन्दुवदनः कारुण्यपूर्णेक्षणः ॥ विद्युद्वर्णरजोमनोहरतरश्चामीकराङ्गोत्तरो जामाताऽभवदावेड्यतनुपेमा मुक्ताविराजद्रलः ॥३२९॥ चतुर्थे दिवसे रात्री वस्त्रपात्रादिराजितेः । दीपैर्नैर्गजिनाः सर्वे विरेजू राघवादयः ॥३३०॥ रामादीनां परिवर्हान् ददौ स जनकस्तदा । नियुतान् वारणेंद्रांश्च शिविकाश्चापि तन्मिताः । ३३१। तुरगान् दशलक्षांश्च नियुतान् स्यन्दनान ददौ नानालंकारवासांसि गोदासीसेवकदिकान् ॥३३२। ददौ स राघवादिभ्यो येषां संख्या न विद्यते । एवं सम्मानितास्तेन ते बाला जनकेन हि ॥३३३। पूर्वेवद्रुमथ श्रेष्ठ स्वस्वपत्न्या समन्विताः । गजारूढ़ा सुसङ्गीतैर्नात्वायैः स्वमंडप ययुः । ३३४ ततो राजा मासमेकं निनाय नृपनायकतः । ततः सैन्येन स्वपुरीं गन्तुं पुराद्वहिर्ययौ ॥३३५॥ साताद्या निर्ययुर्मुग्धाः साश्रुनेत्राः सुविह्वलाः । सुमेधाभ्या समाश्लिप्य सांत्वयित्वा न्यसर्जयत् ॥३३६।

नट आदि ने अनेक मङ्गलगीतोंका गान किया और दोनों भूपने अनेक दान दिये । ३२१ ॥ तदनन्तर वे सब बालक अपनी अपनी बहुओं को हाथीपर चढ़ाकर चले । वे दिनमें जाके साथ भोजनालयमें गये । ३२२ ॥ हे पार्वती ! वहाँ आचमन करके सुहृद्गण तथा गौरीशंकर (शिव-पार्वतीकी) पूजा करनेके बाद सब अपने अपने परिजनोंके साथ आदरपूर्वक भोजन किया और सब स्त्रियाँ उन्हें देखकर संतुष्ट हो गयीं। राजा दशरथ भी अपने राजाओंके, बन्धुओंके, नगर तथा देशके लोगोंकी और मुनियोंकी साथ में तथा जनकके घरपर जाकर महोत्सव में भोजन किया ॥ ३२३-३२५॥ सुमेधासे बार-बार प्रार्थित तथा वन्दित कौशल्या आदि स्त्रियोंने भी जाकर प्रेमपूर्वक भोजन किया तथा राजा जनकको बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ । फिर उन बालकोने प्रसन्न होके स्त्रियोंके कहनेसे माताओंके सम्मुख अपने अपनी स्त्रियोंके पैरोंपर अपना अपना सिर रखकर नमस्कार किया। पश्चात् उन स्त्रियोंने भी उनको अलग-अलग नमस्कार करके उनका गालोंपर कुङ्कुमसे तिलक किया ॥ ३२६॥ ३२७॥ ३२८॥ समस्त संसारके जनक सुन्दर चन्द्रके समान मुखवाले तथा करुणापूर्ण नेत्रोंवाले, विद्युत्के समान वर्णवाले, पीत वस्त्रोंको धारण किये हुए, विलक्षण वेशवाले, अनुपमेय कान्तिवाले, अनुपम शोभाको प्राप्त हुए जानकी आदि आदि स्त्रियॉं, और भूमिसतया शोभाको प्राप्त कर लिया ऐसा जान पड़ता था ॥ ३२९॥ चौथे दिन रात्रिमें वस्त्रोंसे सुसज्जित होकर दीपकोंसे शोभित तथा पूजित राम आदि चारों भाई बड़े ही शोभायमान होने लगे ॥ ३३० ॥ राजा जनकने राम आदिको जो दहेज़ दिया दस लाख हाथी, दस लाख पालकियाँ दस लाख घोड़े तथा दस लाख रथ अगणित अलंकार, पोशाक, गौएँ तथा दास-दासिएँ दीं। इस प्रकार राजा जनकके द्वारा सम्मानित वे बालक ॥ ३३१-३३३॥ अपनी अपनी स्त्रियोंको साथ लेके तथा हाथियोंपर सवार होकर नृत्यगान तथा बाजेके साथ अपने मण्डपको लौट आये । ३३४॥ पश्चात् राजा दशरथ राजा जनकके साथ एक महीना वहाँ व्यतीत करके अपने पुरको जानेके लिये सेनाके साथ उस पुरोस बाहर आये । ३३५ । सीता आदि अश्रुपूर्ण नेत्रोंमें बहुत विह्वल होकर चलीं। सुमेधाने उनको

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