श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 482, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें७६६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १३
तदा तदा पूर्ववृत्तं स्मृत्वा पार्श्वं व्यलोकयत् । ततो रामः श्रुतं किञ्चि द्विनयामास सादरम् ॥९॥ यदा यदा श्रूयतेऽत्र हास्यं केनापि यत्कृतम् सदा तदा दन्तपङ्क्त्या दिष्टं हास्यं स्मराम्यहम् ॥१०॥ मायाविनो राक्षसास्ते मां विप्रतार्य पुनश्चित्रात् । माममुत्र यास्यन्ति त्विति मत्वा सचेतसि ॥११॥ अन्यच्च निंदितं हास्यं नीतिशास्त्रेषु सर्वदा । अतो हास्यं वर्जयामि सर्वेषां भूनिवासिनाम् ॥१२॥ इति निश्चित्य हृदये लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् । दुन्दुभिं घोषयस्वाद्य पुर्यां राष्ट्रेऽवनीतले ॥१३॥ स्मिताननो नरः कश्चिन्नारी वाप्यथ सुहृच्च यः । सीता वा तनयो बंधुः स मे दृश्या भवेदिति ॥१४॥ तथेति रामवाक्येन घोषयामास दुन्दुभिम् । पौरा जानपदाः सर्वे श्रुत्वा शिक्षाध्वनिं प्रभोः ॥१५॥ रामदण्डभयात् सर्वे न चक्रुस्ते स्मिताननम् । वारांगनानृत्यगीते नटगीतप्रवर्तने ॥१६॥ स्त्रीभिः सुहृद्भिर्मित्रैश्च विनोदानुत्सवोत्सवान् वरान् । मांगल्यानि च कर्माणि हास्यकारीणि नाचरात् । १७॥ वस्त्रसंग्रहकाभिश्च कौतुकानि हि यानि च । तूर्यघोषादिमाङ्गल्यकर्माणि विविधाः कथाः ॥१८॥ मात्रव्यंग्योत्सवान् सर्वान् यात्रायज्ञोत्सवान् शुभान् । कौतुकानुत्सवांश्चैव विवाहादिषु कर्मसु ॥१९॥ कांश्चित्कथञ्चापि न चक्रुश्च कदा जनाः । ययौ नावश्यककार्याद्विना सदसि कः प्रभुम् ॥२०॥ पुराणानीतिहासांश्च न पठन्ति स्म केचन । गर्भाधाने पुंसवनेनामकर्मादिषूत्सवान् ॥२१॥ पौरा जानपदाः सर्व मप्रष्टांगनिवासिनः । एतानि हास्यकारीणि नानाकर्माणि भूतले ॥२२॥ रहस्यपि न चक्रुस्ते रामदण्डभयात् कदा । एवमासीद्वर्षमेकं तदा भूम्यां कदापि हि ॥२३॥ स्मिताननं कस्य नारीन्न वक्त्रमंडनादिकम् । तदोग्यहृद्देवताश्च नानाकर्मोद्भवेववाः ॥२४॥ इन्द्राय कथयामासुस्तद्वृत्तं जगतीभवम् । इंद्रादीनां सुराणां च कर्माद्यरुचनादि हि । २५॥ नासीद्यदा जगत्त्यां हि तदेंद्रोऽकथयद्विधौ । तदा सुरु विविः प्राह न समाश्चेवरू हि नः ॥२६॥
तो उनका ध्यान उसी ओर आकृष्ट हो जाया करता था और अपने अगल-बगल निहारने लगते थे। इस समय रामने उस हास्यको सुनकर क्षणभर विचार किया और लक्ष्मण कहने लगे—॥८॥ ९ ॥ जब कभी मैं किसीका हास्य सुनता हूँ तो मुझे रावणकी हंसी स्मरण आ जाया करती है और यह ख्याल होता है कि वे मायावी राक्षस जिनको कि मैंने मार डाला है, धोखा देकर मुझे लानेके लिए फिर तो नहीं आ गये हैं ॥ १० ॥ ॥ ११ ॥ दूसरे नीतिशास्त्रम भी हास्यकी निन्दा की गयी है । इसीलिए आजसे मैं भूतलपर रहनेवालोंको हंसनेकी मनाही करता हूं । इसके बाद लक्ष्मणसे बोले कि मेरे राष्ट्र तथा पृथ्वीतल भरम डुगी पिटवाकर कहला दो कि कोई स्त्री पुरुष, मेरा मित्र, स्वयं सीता तथा मेरे बेटा या भाई भी न हँसे । जो इस आज्ञाके विपरीत चलेगा, उसे दण्ड भुगतना पडेगा ॥ १२-१४ ॥ लक्ष्मणने रामके वाक्यनुसार सारे और दुंदुभी बजवा-कर रामकी यह आज्ञा घोषित करा दी। जितने पुरवासी अथवा देशवासी थे, उन्होंने प्रभुकी इस शिक्षाध्वनि को सुनकर दण्डक भयसे हमेशाके लिये हँसना छोड़ दिया । वेश्याओके नृत्य, गान, नाटक, स्त्रियों या मित्रोंके साथ हंसी-दिल्लगी आदि ऐसे सब काय बन्द कर दिये गये, जिनमें हँसा आनेका अन्देशा रहता था ॥ १५-१७ ॥ उस समय बाँसपर चढ़कर नाचने आदिकी कथा, दुन्दुही-नगाड़े आदिके बाज, गाना, गान सावत्सरिक उत्सव, विवाह आदि मङ्गल कार्योंम भी हंसी आनेवाले खेल-कूद और गप शप आदि बातोंको बन्द कर दिया और बिना किसी विशेष कामके काई रामकी सभा में भी नहीं जाता था । १८-२० । लोगोंस पुराण-इतिहास आदिका भी पढ़ना छोड़ दिया । गर्भाधान, पुंसवन, नामकर्म आदि उत्सवोंमें हंसी न आने देनेका पूरा पूरा ध्यान रक्खा जाता था। मतलब यह कि सारे पुरवासी एवं देशवासी हास्योत्पादक कामोंको नहीं करते थे। रामके दण्डभयसे कोई एकान्तमे भी नही हँसता था। यह अवस्था एक वर्ष तक चलतीरही। इस बीचमे भूतलनिवा सियोंमेसे किसीका भी मुखमण्डल मुसकराता हुआ नहीं दीखा और किसीने भी अपना शृङ्गार आदि नहीं किया। ऐसी अवस्था में जितने ही कर्माङ्गदेवता और बहुतसे उत्साहोद्भवता एकत्रित होकर इन्द्रके पास गये ॥ २१-२४ ॥ उन्होंने पृथ्वीतलके उस समाचारको कह सुनाया । जब इन्द्रने सुना कि हम देवताओं-