श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 488, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें४७२ आनन्दरामायणे [सर्गः १३
भविष्यति सुखवृद्धि र्चेतसाऽपि प्रमोदनम् । अभाने कथयन्त्येव येन ते शिक्षितं भुवि ॥११२॥ भविष्यति मृषा नैव येन दृष्टास्तु देवताः । भविष्यंति जनाश्चापि मम्यन्मत्कविता भवेत् ॥११३॥ जना हसंतु सर्वत्र दृष्टानां दशनं विना । आत्मवान्कश्चाद्य वस्त्रेण रुद्धा कौतुकदर्शनात् ॥११४॥ हास्यं लक्ष्मीसूचकं हि हसितं मंगलप्रदायकम् । धावन्यं हसितं चैतद्धस्यात्कृष्टं न किंचन ॥११५॥ नारी स्मितवदना यस्मिन्गेहे तन्मन्दिरं स्मृतम् । लक्ष्मीरूपाऽवस्थिताऽने तत्र निश्चय रघुनन्दन ॥११६॥ स एव पुरुषो धन्यो यस्य स्यान्न स्मिताननम् । स एव पुरुषो निन्द्यो यस्यास्यं क्रोधसंयुतम् । ११७॥ प्रमदा निन्दिता सापि यस्याः क्रोधयुतं मुखम् । गर्हयन्त्यत्रहास्यं हि सर्वदा ते मुनीश्वराः ॥११८॥ अतस्त्वां प्रार्थयाम्येतन्मानय त्वं वचो मम । न करोमि विधिर्गर्वं त्वां तातं वेद्मि राघव । ११९॥ जानयिष्यामि शरणं त्वाहं चतुराननम् । एवं वाल्मीकिरचनमंगीकृत्य रघूत्तमः ॥१२०॥ एवमस्त्विति तं प्राह मुनिं तष्ठ हसन्निव । तद्रामवचनं श्रुत्वा वाल्मीकिस्तुष्टमानसः ॥१२१॥ शिष्यं संप्रेष्य ब्रह्माद्यमानायामास पिप्पलात् । अश्वाः सर्वे समुत्तस्थुर्ययुस्ते नगरीं प्रति ॥१२२.। ययौ सैन्येन शत्रुघ्नो रामपार्श्वे स्थितोऽभवत् । रामपुत्रौ ययायातौ पितुरग्रे निषेद्तुः ॥१२३॥ रामाज्ञया मारवाहन्तो दन्त्यैर्मज्जनः । कुवेरेण सुधावृष्टिः सुमन्त्राद्याः सुजीविताः ॥१२४ । सुमन्त्राद्या राज्ञाऽऽत्मरक्षणं राघव ययुः । नत्वा रामं सुमंत्रः स रामपार्श्वे स्थितोऽभवत् । १२५॥ दृष्टः सुरैर्यावदिंद्रः प्राप्तं प्रणम्य स, गर्वं गत्वाऽब्रवीद्ब्रह्मा मया त्वदपराधितम् १२६॥ तत्क्षमस्व रघुश्रेष्ठ स्वस्वाभ्याः सर्वदा वयम् । पुराऽस्माकं हितार्थे हि त्वया रामावतीर्णते ॥१२७॥
मुझे बड़ी प्रसन्नता है, अर्थात् आज आप से प्रार्थना करता हूँ कि इस मेरे करवाएने आनन्दरामायणकी शोभा न बिगाड़िए, यदि आप इसके लिए न हँसा सजा तक तब तो बड़ा अनर्थ होगा। मेरी रामायण किसी कामकी नहीं रह जायगी इसीलिए मैं आपस कहता हूँ कि कोई ऐसा उपाय कीजिए, जिससे आपके आदेशकी विगा प्रज्ञाका कन्तर न घट और हनता तथा मनुषा की प्रसन्न रहे और मेरी कवित्व भी सन्द हो जाय १०७-११३ । लोग हँस सहा किन्तु उनके दाँतन दिखायी द। किसी कौतुकको देखकर यदि लोगोंको हँसा आ जाय तो कपडस मुंह रोक्कर हंसें ॥ ११४ ॥ क्योंकि हंसी लक्ष्मीमूलक है, हँसी सबको मुख देनेवाली वस्तु है और हंसी मंगलमयी मानी गयी है। कहनेका भाव यह कि हँसीसे बढ़कर कोई बात ही हीं नहीं ।। ११५ ।। जिस घरमे मुस्काती हुई नारी रहना है, वह घर देवालयके समान पवित्र होता है और लक्ष्मी वहाँपर ही निवास करती है। हे रघुनन्दन ! इसमें किसी प्रकारका संशय नहीं है ॥ ११६ ॥ वही पुरुष धन्य है, जिसका मुखमण्डल सदा हसता हुआ दीखे और बही पुरुष अधम है, जिसका मुख सदा कोषमे युत्त रहे ॥ ११७॥ वह स्त्री भी निन्द्य है, जो सदा क्रोधयुक्त मुँह बनाये रहती है। बडे-बड़े मुनिगण आदि हास्यको सदासे निन्दा करते आय हैं ११८ ॥ बसअत मैं बापस प्रार्थना करता हूँ कि मेरी यह बात मान लीजिए बह्म किसी तरह अभिमान न करके आपको अपने पिताके समान मानते हैं । ११९ ॥ मैं स्वय जाकर ब्रह्माको आपका लज्जाब करूंगा वे आपसे क्षमा मांगेंगे । रामने वाल्मीकिके वाक्यगौरवको समझकर उनकी बात मान ली और कहा कि जैसा आप कहते हैं, वैसा ही होगा। रामकी स्वीकृति सुनकर वाल्मीकि परम प्रसन्न हुए और अपना एक शिष्य भेजकर उस पीपलपरसे ब्रह्माजीको बुलवाया । यह हो जानेपर शत्रुघ्न तथा लव-कुशके जो घोडे अबतक रास्तेमें बँधे थे, वे उठ खड़े हुए और अयोध्याको वापस चल दिये । शत्रुघ्न और लव-कुश भी अपनी सेना लिये हुए आये और रामके पास आकर बैठ गये ॥ १२०-१२३॥ रामकी आज्ञासे उन्होंने अस्त्रहारोंको छोड़ दिया । इन्द्रने आकर अमृतकी वर्षा की, जिससे सुमन्त्रादि जो योद्धा मूर्च्छित पड़े थे, वे सचेत हो गये ।। १२४ ।। इसके अनन्तर युद्धको छांटनेके लिए गद्दे हुए लोग रामके पास आये। सुमन्त्र रायके पास आकर बैठ गये। थोडी देर बाद देवताओंके साथ-साथ इन्द्र और ब्रह्मा भी रामकी सभामें आये और बैठ गये । रामको प्रणाम