भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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४७४आनन्दरामायणे[ सर्गः १४

समागती देववैद्यौ तौ दृष्ट्वा द्वारगतौ । जयविजयात्मानौ तयोरग्रे बभूवतुः ॥ ६ ॥
ताभ्यां वैदौ तदा प्रोक्तौ विष्णुस्तिष्ठति वै रहः । नायं कालो दर्शनस्य तच्छ्रुत्वा प्रोचतुः सुरौ ॥ ६ ॥
अधुना द्रष्टुमिच्छामो विष्णुं कथयतां नरौ । तयोर्द्वियोगमनं युवां शृणुतं चेरितम् ॥ ७ ॥
इत्योर्वचनं श्रुत्वा तौ पुनः प्रोचतुर्गणौ । नगच्छावो महाविष्णुमस्मल्लक्ष्म्या रहःस्थितम् ॥ ८ ॥
एवं त्रिवारं ताभ्यां तौ प्रोक्तौ नैच्छतुर्गणौ । तदाऽश्विनीकुमारौ तौ प्रोचतुः क्रोधमूर्च्छितौ ॥ ९ ॥
आव्योर्वारणनं नैव युवाभ्यां हि श्रुतं गणौ । यतस्त्रिवारं तस्मात्तु युवां जन्मत्रयं भुवि ॥ १० ॥
कथयद्य न संदेहस्तच्छ्रुत्वा ह्यवरं तयोः । अथावति तयोः शापं ददतुर्देववैद्ययोः ॥ ११ ॥
विनापराधतः शापो यस्माद्दत्तस्तु चारयोः । एकवारं युवां क्वापि जन्मप्राप्स्यथु वै भुवि ॥ १२ ॥
एवं परस्परं शापं रुद्ध्वा हाहेति चक्रतुः । सदा कोलाहलश्चासीद्वाह्वायाम तान् हरिः ॥ १३ ॥
तद्वृत्तगसकलं श्रुतं प्रोचुस्ते जगदीश्वरम् । पश्चात्ते महताविष्णुं प्रार्थयामशुरादरात् ॥ १४ ॥
येन शीघ्रं विमुक्तिः स्यात्तन्नो वद महेश्वर ! ततः प्रोवाच तान् विष्णुर्मुक्तिः शीघ्रं शुभाऽत्र हि ॥ १५ ॥
मयि भक्त्या विरोधिन्या जायते नात्र संशयः । समञ्जस्यादरेणैव मद्भक्त्या जायते गतिः ॥ १६ ॥
युष्माकं रोचते या सा भक्तिः कार्याऽवनीतले । तद्विष्णोर्वचनं श्रुत्वा ते प्रोचुर्जगदीश्वरम् । १७ ॥
नोऽस्तु भक्त्या विरोघिन्या शीघ्रं नो दर्शनं पुनः । तथेत्युक्त्वा रमानाधस्तान् सर्वान् म व्यसर्जयत् १८ ॥
ते जन्मानि ततः प्रापुर्ब्रह्मर्ष्या सुनिनन्दनः । जयो जातो हिरण्याक्षो हिरण्यकशिपुस्तथा ॥ १९ ॥
बातोऽत्र विजयः पूर्वं तौ हतौ विष्णुना भुग । वाराहरूपिणाऽनेन हिरण्याक्षो विदारितः ॥ २० ॥
नरसिंहरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः । ततः पुनर्जन्म तौ हि द्वितीयं प्रत्यतुर्भुवि ॥ २१ ॥


लक्ष्मीके साथ बैठे थे। उसी समय उनके दर्शनार्थ अश्विनीकुमार वहाँ जा पहुँचे ॥ १-४ ॥ तब देववैद्योंको देखकर जय-विजय नामक दोनों द्वारपाल उनके सामने पहुँच और कहने लगे-इस समय भगवान् एकान्तमें हैं। अतएव आप लोग दर्शन नहीं कर सकेंगे। यह सुनकर वे दोनों देवता बोले-विष्णुभगवान्‌से जाकर कह दो कि हम अभी इसी समय आपका दर्शन करना चाहते हैं। देवताओ की बात सुनकर जय-विजयने कहा कि हम अभी उनके पास नहीं जायेंगे। वे लक्ष्मीके साथ एकान्तमें बैठे हैं ॥ ५-८ ॥ इस तरह तीन बार अश्विनीकुमारोंके कहनेपर भी जब जय-विजयने उनकी बात नहीं मानी तब क्रुद्ध होकर उन्होंने शाप देते हुए कहा कि तीन बार तुम लोगोंने मेरी बातका उल्लंघन किया है, इसलिए तुम्हें तीन बार पृथ्वीलोकमें जन्म लेना पड़ेगा । उनके इस शापको सुनकर जय विजयने भी अश्विनीकुमारोंको शाप देते हुए कहा कि बिना अपराध तुमने हमको शाप दिया है। इसलिए तुम दोनोंको एक बार पृथ्वीतलपर जन्म लेना पड़ेगा ॥ ९-१२॥ इस प्रकार आपसमें शाप पाकर वे चारों हाहाकार करके पछताने लगे और वैकुण्ठधाममें कोलाहल मच गया तब विष्णुभगवान्‌ने उनको अपने पास बुलाया ॥ १३ ॥ भगवान्‌ने उनका वृत्तान्त सुना। इसके अनन्तर आदरपूर्वक उन चारोंने भगवान्‌से प्रार्थना की - ॥ १४ ॥ हे महेश्वर ! जिससे हमलोग शीघ्र इस शापसे मुक्त हो जायें, इस बात वहीं उपाय बतलाइये । विष्णुभगवान्‌ने उन्हें समझाते हुए कहा कि घबड़ाओ नहीं, शीघ्र ही तुम लोग शापसे मुक्त हो जाओगे, किन्तु उपाय दो हैं। एक यह कि तुमलोग हमारी भक्तिसे विरोधभाव रक्खो। दूसरे उपायमें हमारी भक्ति करके मुक्ति पानेका विचार करो। यदि मेरी भक्तिमें विरुद्ध रहोगे तो शीघ्र मुक्ति मिल जायगी और भक्ति के साथ चाहोगे तो बहुत बार जन्म लेना पड़ेगा। इन दोनोंमेंसे जो उपाय अच्छा जंचे उसे चुन लो। इस प्रकार विष्णुकी बात सुनकर उन लागोंने उत्तर दिया कि हम आपकी भक्तिमें विरुद्ध भाव रक्खेंगे, जिससे शीघ्र मुक्ति हो जाय। भगवान्‌ने भी "अच्छा वैसा ही हो" यह कहकर उन लोगोंको विदा कर दिया ॥ १५-१८ ॥ तदनन्तर वे लोग मृत्युलोकमें आकर जन्मे। उनमें जय हिरण्याक्ष नामका तथा विजय हिरण्यकशिपु राक्षस होकर जन्मा। इसके अनन्तर वाराहरूप धारण करके विष्णुभगवान्‌ने हिरण्याक्षको मारा और नरसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुका संहार किया ॥ १९ ॥ २० ॥ दूसरे जन्ममें