श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 493, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १९ ] स्कन्दपुराणम् (उत्तरार्द्धम्) ४७७
इति निश्चित्य मनसि तूर्णं गत्वा ददौ च तौ । घर्मेण तप्तं तं दृष्ट्वा व्रजन्तं पथि संकटे ॥ ५३ ॥
उपानहौ गृहीत्वासौ निर्वृतिं च परां ययौ । मुदा प्रहर्षितो भूत्वा विप्रः शम्भुः पुनरब्रवीत् ॥ ५४ ॥
पूर्वपुण्येन ते जाता शुभा बुद्धिरनन्तर, यया दत्ते त्वया वैशाखे पादत्राणे दुरत्यये ॥ ५५ ॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा विप्रं व्याधोऽथ सोऽब्रवीत् । किं मयाऽऽचरितं पूर्वं पुण्यं तन्मे वद प्रभो ॥ ५६ ॥
आतपो बाधते घोरो नात्र छाया न वै जलम् । तस्मात्स्थान्तरं गत्वा यत्र छायाम्बु वर्तते ॥ ५७ ॥
तत्र गत्वा जलं पीत्वा सुखछायामाश्रित्य च । ततो मे सुकृतं पूर्वं सविस्तारं वदाम्यहम् ॥ ५८ ॥
इत्युक्तो मुनिना तेन व्याधः प्राह कृताञ्जलिः । इतोऽविदूरे सलिलं वर्तते च सरोवरे ॥ ५९ ॥
कपित्थास्तत्र वै सन्ति फलभारैश्च पीडिताः । गच्छामस्तत्र संतुष्टिर्भविता नात्र संशयः ॥ ६० ॥
व्याधेनैव समादिष्टस्तेन साकं ययौ मुनिः । कियद्दूरं ततो गत्वा ददर्शाश्चर्यं सरोवरम् ॥ ६१ ॥
स्नात्वा मध्याह्नवेलायां तस्मिन्सरसि निर्मले । आचम्योपस्पृश्याथ कृत्वा माध्याह्निकीः क्रियाः ॥ ६२ ॥
देवपूजां तथा कृत्वा फलमूलमनोरमैः । व्याधेनोपनीतं सुस्वादु कपित्थं भक्षयारि च ॥ ६३ ॥
भुक्त्वोः सुखं जलं पीत्वा सुच्छायां च समाश्रितः । सुखोपविष्टस्तं प्राह पूर्वपुण्यं वदामि ते ॥ ६४ ॥
शाकले नगरे पूर्वं द्विजन्मा वेदपारगः । स्तम्भो नाम महापापी तथा श्रावस्तगोत्रजः ॥ ६५ ॥
तवेष्टा गणिका काचिन्नाम्ना नीचगणेशिका । त्यक्तनित्यक्रियो नित्यं शूद्रवन्मूर्त्तितोऽप्यभूत् ॥ ६६ ॥
शून्याचारस्य मूढस्य पाखण्डस्याप्रियस्य च । ब्राह्मणी ते तदाऽऽचार्याऽऽया शोभनमयी तथा ॥ ६७ ॥
सा त्वां पर्यचरत्सुभ्रूः समेवञ्च प्रातजाधवम् । अन्योन्यं क्षालयन्ती च पादौ स्वांप्रयकाङ्क्षया ॥ ६८ ॥
उभयोरप्यधः शौचे उभयोर्वचने रता । ईक्षया बाधमाणाऽपि दिनकार्ये द्वयोः स्थिता ॥ ६९ ॥
पापीके पासमें अच्छा ही होगा ॥४८-५२॥ जूतोंकी पद्धत और छोटी है। इसलिए मेरे पैरमें न आयेंगे। सब इसे दे ही डालूँ। इस प्रकार निश्चय करके दौड़ता हुआ उस धूप तथा कण्ठियोंके झमेले दुःखी ब्राह्मणके पास पहुंचा और उसने वह जूता दे दिया ॥५३-५५॥ जूता मिलनेपर उसे बड़ा आनन्द मिला और ब्राह्मणने कहा-तुम सुखी होओ। हे वनचर ! तुम्हारे किस पुण्यसे तुम्हारी ऐसी बुद्धि हुई है। जिससे तुमने वैशाख महीनेमें इस जूतेका दान दिया है ॥५४॥ ५५ । इस प्रकार ब्राह्मणकी बात सुनकर व्याधने कहा कि पूर्वजन्ममें मैंने कौनसा पुण्य किया था। महाराज विस्तारपूर्वक मुझे बतलाइये ॥५६॥ ब्राह्मणने कहा कि इस समय मुझे घाम ज्यादा लग रहा है। इस जंगलमें न तो पानी है न छाया ही है। इसलिए किसी एक स्थान-पर चलो, जहाँ कि छाया और पानी मिल सके। सुखी होनेपर तुम्हें तुम्हारे पूर्वजन्मका वृत्तांत सुनाऊँगा ॥५७॥५८॥ इस प्रकार ब्राह्मणकी बात सुनी तो हाथ जोड़कर व्याधने कहा कि पास ही सरोवरमें पानी है और उसके आस-पास बहुतसे कैथके वृक्ष फलसे लदे हुए विद्यमान हैं। वहाँपर चलनेसे आप सन्तुष्ट हो जायेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ ५९ । ६० ॥ व्याधके उसी कहनानुसार ब्राह्मण उसके साथ चलकर उस सरो-वरके पास पहुंचा। दोपहरके समय उसने स्नान किया, बदन पोंछने और मध्याह्नकालकी क्रियायें पूरी कीं। फिर देवताका पूजन करके व्याधके लाये हुए कैथके फल खाये, सरोवरका ठंडा पानी पिया और छायामें सुखसे बैठकर विप्र बोला-अब मैं तुम्हारे पूर्वजन्मके पुण्य बतलाता हूँ ॥६१-६४॥ पूर्वजन्ममें शाकल नामकी नगरीमें तुम वेदपारगा स्तम्भ नामके ब्राह्मण थे। श्रावस्त गोत्रमें तुम्हारा जन्म हुआथा, किन्तु तुम बड़े भारी पापी थे। दुःसङ्गके दण्डवश तुम एक वेश्यापर मुग्ध हो गये। तुमने अपनी सारी नित्य क्रियायें छोड़ दीं और शूद्रके समान मूर्त्तिमें सर्वेश्वर बनने लगे। तुम जैसे मूर्ख तथा आचार विहीन ब्राह्मण-के घरमें एक अति रूपवती ब्राह्मणी पत्नी भार्या थी। वह उस वेश्याकी तथा तुम्हारी खूब सेवा करती थी तुम्हें प्रसन्न रखनेकी इच्छासे वह तुम दोनोंके पैर धोती थी । ६५-६८। तुम दोनोंका अपेक्षा नीची शय्यापर