भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 505

सर्गः १६ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८९

अन्येऽनुलोमजन्मानः प्रतिलोमभवा अपि। स्वशास्त्रोक्तव्रतो दृष्टुं नातान्धर्म्यं न तत्त्यजुः ॥५९॥ अनपत्यो न तद्राष्ट्रे धनहीनस्तु कोऽपि न । विरुद्धसेवी ना कश्चिदकालमृतिभाङ् न कः॥६०॥ न शठा नैव वाचाटा वञ्चका नो न हिंस्रकाः। न पाखण्डा नैव षंण्डा न रण्डा नैव शौण्डिकाः ॥ ६१॥ श्रुतिघोषा द्विजैर्यत्र शास्त्रवादः पदे परे । सर्वत्र शुभगानानि मुदा मङ्गलगीतयः ॥६२॥ वीणावेणुप्रवादाश्च मृदङ्गगुरुस्वनाः। सोमपानं विनाऽन्यत्र पानगोष्ठी न कर्णगा ॥६३॥ मांसाशिनः पुरोडाशं नैवान्यत्र कथञ्चन । न दुरादर्शणो यत्राधर्म्मिणो न च तस्कराः ॥६४॥ पुत्रस्य पित्रोः पदयोः पूजनं देवपूजनम् । उपवासो व्रतं तीर्थं देवताराधनं परम् ॥६५॥ नारीणां भर्तृपदयोः स्मरणं तद्वचःश्रुतिः । समर्चयति सततं निजमग्रजमादरात् ॥६६॥ समर्चयंति मुदिता भृत्याः स्वामिदाभ्भृत्वम् । हीनवर्ग्योऽग्रवर्ग्यो वर्णने गुणगौरवं ॥६७॥ यतिष्यन्ति भूयोऽपि त्रिकाल भूमिसदेशः । सर्वत्र सर्वे विद्वांसः समर्चन्ते मनोरथैः ॥६८॥ विद्वद्भिय तपस्विभ्यस्तपोनिष्ठैर्जितेन्द्रियाः । जितेन्द्रियेभ्यंस्तान्निष्ठा ज्ञानिभ्यः खिन्नलिङ्गिनः ॥६९॥ मंत्रपूतं महार्हं च विधियुक्तं सुसंस्कृतम् । ब्राह्मणानां मुखाग्नौ च हूयतेऽहर्निशं हविः ॥७०॥ वापीकूपतडागानामागमणां पदे पदे । सुधिविद्वेन्प्रसंमार्गः कर्त्तारो यत्र भूरिशः ॥७१॥ तद्राष्ट्रे हृष्टपुष्टाश्च दृश्यन्ते सर्वजातयः । अनिन्द्येनेषामंपन्ना दिना मृगयुमैनिकान् ॥७२॥ यस्य राज्ये पताकासु चञ्चला श्रौर्न राष्टके । ऐरावतस्त्वेक एव शुभ्रः स्वर्गे गजो महान् ॥७३॥ चतुर्दन्तो रामराज्ये तद्रत्नागाः सहस्रशः । इन्दू सूर्योश्चमात्रेव शोभंते गगनांगणे ॥७४॥ रामराज्येऽथ नारीणां सीमंतस्था मनेकशः । वृपोऽप्यनेकः स कैलासे भीयते यस्यः मित्रः ॥७५॥

गुरुकुलमें रहकर वेदाध्ययन करते थे ॥ ५४-५८ ॥ अनुलोम जातिमें उत्पन्न लोगोने यह कभी नहीं कहा कि मैं अपने दर्जेसे ऊँच पद रहूँ । रामके राजमें कोई सन्तानविहीन तथा निधन नहीं था और कोई ऐसा भी नहीं था, जो अपनी मर्यादाके विरुद्ध आचरण करनेवाला हो । उनके राजमें कोई अकाल मृत्युका पात्र नहीं बन सका । उस समय न कोई शठ, न बकवादी, न वंचक, न हिंसक, न पाखण्डी, न षांड़, न व्यभिचारिणी और न धूर्त ही था ॥ ५९-६१ ॥ पद पदपर वेदध्वनि तथा शास्त्रसम्बन्धी वाद-विवाद सुनायी देता था । चारो ओर अच्छी-अच्छी बातें हंसी-खुशीके मांगलगौत, वीणा वेणी तथा मृदंगका मीठा स्वर सुनायी पड़ता था । सोमपानके सिवाय और किसी मादक वस्तुके खाने-पीनेकी बात नहीं सुनायी देती थी । यज्ञके अतिरिक्त दूसरे समयपर मांस न नेवाने मनुष्य, दुष्ट दृर्ष, अधर्मी और चोर कहीं भी नहीं थे ॥ ६२-६४ ॥ पुत्रक लिए माता-पिताके पदपूजन ही देवपूजन, उपवास व्रत, देवताराधन और तीर्थ था । नारीके लिए अपने पतिके चरण पूजन और उनकी बातें वेदवाक्य सदृश मानना ही सबसे श्रेष्ठ धर्म माना जाता था । सदा छोटा भाई बड़े भाईकी पूजा करता था। सेवक प्रसन्न मनसे अपने मालिककी सेवा करता था । नीच जातिका मनुष्य अपनेसे ऊँच वर्णवालिका गुण-गौरव बखानता था ॥ ६५-६७ ॥ सब लोग ब्राह्मणोंकी पूजा करते और विद्वानोंके मनोरथ पूर्णकरनेको उद्यत रहते थे । विद्वान्से तपस्वी, तपस्वीसे जितेन्द्रिय तथा जितेन्द्रियसे भी ज्ञानी मनुष्य श्रेष्ठ माना जाता था और ज्ञानीये भी संन्यासी उच्च पदपर माने जाते थे ॥ ६८ ॥ ६९ । सदा मंत्रसे पवित्र किया हुआ हवि विप्रोंके मुखाग्निमें पड़ता रहता था ॥ ७० ॥ बावली, कूप तड़ाग तथा वृक्षलगाकर बगीचा करानेवाले और पवित्र द्रव्योंको एकत्र करके यज्ञादि शुभ कर्म करनेवाले कितने ही धर्मात्मा रहा करते थे ॥ ७१ ॥ रामके राज्यमें सब जातिके मनुष्य हृष्ट-पुष्ट दिखायी पड़ते थे । शिकारी तथा सैनिकोक सिवाय सब लोग श्लाघनीय कार्योंमें लगे हुए थे । उनके राज्यम लक्ष्मीकी चंचलता केवल पताकामें रहनी थी, राष्ट्रमें नहीं। स्वर्गमे केवल एक ऐरावत हाथी बड़ा, चतुर्दन्त और श्वेत वर्णका है। किन्तु रामके राज्यमें हजारों हाथी चार दाँतवाले तथा श्वेत वर्णके थे । स्वर्गमें केवल सूर्य और चन्द्रमा प्रकाश करते हैं, किन्तु रामराज्य-की स्त्रियोंके केशाम ( माँगके ) वैसे-वैसे अनेक चन्द्रमा-सूर्य चमकते दिखाई देते थे ॥ ७२-७४ । मूना