श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 512, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४९६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १७ |
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दृष्ट्वा किञ्चिन्महर्घं तु स्वीयराष्ट्रे हि भूपुता । न्यूनः कार्यः करभारः किंचिद्देशसुखाय च ॥९०॥
नातिशाठ्यं कदा कार्यमौदार्यं दर्शयेज्जनान् । द्रव्यं गृहीत्वा राजा हि मोचनीया न तस्कराः ॥९१॥
मुखं दृष्ट्वा न वै कार्यो राज्ञा न्यायः कदापि हि । न न्यायश्च परैः कार्यः स्वयमेव प्रकारयेत् ॥९२॥
अर्तानां सकलं वृत्तं श्रोतव्यं सादरं नृपैः । आर्त आकारणीयो हि निकटे कृपया नृपैः ॥९३॥
आत्मानं मानयेन्नैव वैद्यं च गणकं नटम् । पण्डितं वैदिकं वीरं गायकं कृतधर्मिणम् ॥९४॥
यज्ञो दानं जपो होमः सन्ध्या ध्यानं शिवार्चनम् । स्नानं पुराणश्रवणं भक्त्या कार्यं नृपोत्तमैः ॥९५॥
न मादकं वस्तु सेव्यं न कूटद्यूतादिकमाचरेत् । न यात्रा स्वपदा कार्या सप्तद्वीपाधिपेन हि ॥९६॥
फलाहारश्च कर्तव्यो राज्ञा ह्येकादशीदिने । निर्जलश्चोपवासश्च न कार्यः पृथिवीभृता ॥९७॥
येन यद्याचितं राज्ञे भूसुरेणार्पयेच्च तत् । तस्मै विप्राय राजा हि नृपा भूसुरदेवता ॥९८॥
उत्साहे बन्धनान्मोच्या ये ये क्रोधात्पुराद्विजाः । निजाज्ञाभंगतां दृष्ट्वा ज्ञेयं स्वीयं हृतं शिरः ॥९९॥
स्वीयदूतस्यापमानो यः स स्वीयश्चिन्तयेन्नृपः । स्वीयदूतस्य सम्मानो राज्ञा ज्ञेयः स आत्मनः ॥१००॥
एवं कुश मया प्रोक्ता राजनीतिः सविस्तरा । दिनचर्या मया यद्वत्क्रियते त्वं तथा कुरु ॥१०१॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे राज्यकांडे राजनीतिशिक्षणं
नाम षोडश सर्गः ॥ १६ ॥
सप्तदशः सर्गः
( कुशकी पुत्री हेमाका स्वयंवर )
श्रीरामदास उवाच
एकदा कुशकन्याया हेमायाश्च स्वयंवरम् । अयोध्यायां चकारार्थ रामश्चातिमहोत्सवैः ॥ १ ॥
समाहूता नृपाः सर्वे नानाद्वीपद्विपान्तरस्थिताः । समाजग्मुः सुवेषाश्च सभायां तच्छुशासने ॥ २ ॥
बिकानेके लिए बनियोंको दण्ड देता रहे। यदि अपने राष्ट्रमें महँगी बढ़ जाय तो राजाको चाहिये कि देशको सुखी रखनेके लिए करभार कुछ हल्का करदे ॥ ८६-९० ॥ कभी अतिशठता न करे और रुपये लेकर चोरोंको न छोड़े। राजाको यह उचित है कि मुँहदेखा न्याय न करे न्याय करनेका भार दूसरोंके ऊपर न डाल-कर स्वयं करे। यदि कोई दुःखी राजाके पास अपना दुःख सुनाने पहुँचे तो राजाको चाहिये कि दुखियोंके सारे दुःख आदरपूर्वक सुने । दुखिया मनुष्यसे किसी प्रकारकी घृणा न करके उसे अपने पास बुलावे और उसकी दुःखमयी कहानी सुने । किसी तरहका घमण्ड न करे वैद्य, ज्योतिषी, नट, पण्डित, वैदिक, वीर, गायक और धर्मात्मा इनका आदर करे। यज्ञ, दान, जप, होम, सन्ध्या, शिवार्चन, स्नान और पुराणश्रवण आदि शुभ कार्य भक्तिपूर्वक करता रहे ॥ ९१-६५ ॥ राजाको चाहिये कि प्रत्येक एकादशीको केवल फलाहार करके रहे और कभी भी निर्जल उपवासन करे । राजाके समीप पहुँचकर ब्राह्मण जो माँगे, सो दे। क्योंकि ब्राह्मण देवताके समान होता है। क्रोधवश जिन-जिन लोगोंको जेलमे डाल दिया गया हो, कोई उत्साहका समय आनेवर उन्हें छोड़ दे। यदि किसीके द्वारा आज्ञा भंग हो रहा हो तो अपना सिर कट गया समझे । अपने दूतका अपमान अपना अपमान और अपने दूतका सम्मान अपना सम्मान जाने। हे कुश इस प्रकार मैंने तुम्हें सारी राजनीति बतला दी। रह गयी दिनचर्याकी बात, सो मैं जैसा करता हूँ वैसे ही तुम भी करते चलो ॥ ९६-१०१ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित ज्योत्स्ना-भाषाटीकासमन्विते राज्यकांडे उत्तरार्द्धे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥।
श्रीरामदास कहने लगे रामने एक समय कुशकी पुत्री हेमाका स्वयंवर बड़े धूमधामके साथ ठाना। इसमें द्वीप-द्वीपान्तरके अनेक राजे अच्छे-अच्छे वस्त्राभूषणसे सुसज्जित होकर आये और सुन्दर-सुन्दर