श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
तान्दृष्ट्वा नृपतींश्चापि किमेतदिति विह्वलः । मन्त्रिभिर्मन्त्रयामास जनकः स्वजनैरपि ॥२२॥ ततश्चान्तः रामः श्रुत्वा चिन्ताऽर्णवे निजम् । निमग्नं पितरं शीघ्रं ययौ लक्ष्मणसंयुतः ॥२३॥ नत्वा दशरथं रामः आश्वासयन्निदं जगौ । तात राजन्न कर्त्तव्या चिन्ता मयि स्थिते त्वया ॥२४॥ क्षणादेव बाधयिष्यामि पश्य त्वं कौतुकं मम । ततो रामवचः श्रुत्वा राजाऽऽलिङ्ग्य रघूत्तमम् । २५। प्राह षड्वार्षिको बालस्त्वं कथं योद्धुमिच्छसि । अरण्ये मद्कुटुम्बोऽहं वेष्टितोऽस्मि नृपाधमैः ॥ २६॥ अहमेव गमिष्यामि योद्धुं त्यक्त्वा वाहिनीम् । तत्तांतवचनं श्रुत्वा रामस्तं पुनरब्रवीत् ॥२७॥ यदा मे कुण्ठितां शक्ति पश्यांमन्त्र रणांगणे । तदा मे कुरु साहाय्यं तावदत्र स्थिरो भव । २८ । स्थां वाहिनीं सकुडुंबां तत-त्वं रक्ष मद्विरा । इत्युक्त्वा पितरं नत्वा सज्जीकृत्य शरासनम् । २९ जगाम रथमारूढो लक्ष्मणोऽपि तमन्वगात् । ता दृष्ट्वा भरतश्चापि शत्रुघ्नोऽपि जगाम सः । ३० । तान्दृष्ट्वा दशसाहस्रीं राजसेना मचोदयत् । ततस्ते पार्थिवाः सर्वे रथस्थं तं रघूत्तमम् । ३१ । निरीक्ष्य दर्शयामासुः स्वसेनायां परस्परम् । समागतोऽयं श्रीरामः स्वपितुःस्यन्दनस्थितः ॥३२॥ एष वै सुमहच्छ्रीमान् विटपी सम्प्रकाशते । विशालजम्बुज्वलस्कन्धः कोविदारध्वजो रथे ॥३३॥ दशश्याङ्या तस्य रथे वस्त्राद्यैरुपशोभिते ध्वजबद्धपताकोच्चकोविदारे स्थितस्त्वयम् । ३४ । एवं वदन्तस्ते सर्व रथेर्योद्धुं समाययुः । ततोऽभवन्महद्युद्धं घोरं तच्च परस्परम् । ३५ । अस्त्रः शस्त्रास्त्रगन्दिपालै शतघ्नीभिः परस्परैः । रामस्य सैनिकांस्त्यक्त्वा राजानो राममन्वयुः ॥३६ । ते ववर्षुर्महाऽस्त्रास्त्राण्याव्य विहायसम् । तान्दृष्ट्वा नृपतीन् सर्वान् राममेवाभिसम्मुखान् ३७॥ लक्ष्मणः प्राद्रवच्छीघ्रं भरतोऽपि च शत्रुहा । स्वामितारकयोरिवासीद्युद्धं सुदारुणम् ।३८॥ ततो नृपतयः सर्वे शस्त्रावर्षमगतं तदा । ते विव्वा मूच्छितं चक्रुः स्यन्दनात्पतितो भुवि ॥३९।
वार्ता सुनकर राजा दशरथ मन्त्रियों तथा स्वजनोंको पास बुलाकर विचार करने लगे कि यह क्या बात है ? ॥ २१-२२ ॥ अपने पिताको चिन्तासमुद्रमें डूबा सुनकर राम लक्ष्मणके साथ उनके पास गये ॥ २३ ॥ पिता दशरथको नमस्कार करके राम सान्त्वनापूर्वक कहने लगे— हे राजन् ! मेरे रहते हुए आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये ॥ २४ ॥ मैं क्षणभरमें इन सबोंको मार डालूँगा। आप मेरा कौतुक देखिये । रामके वचनको सुनकर राजाने उनका आलिंगन करके कहा हे राम, छ वर्षका बालक तू क्या युद्ध करेगा ? इस अरण्यमें सकुटुम्ब मुझको इन नीच राजाओंने घेर लिया है। इसलिये मैं ही इनको मारूँगा और तू सेनाकी रक्षा कर । पिताके इस वचनको सुनकर राम उनसे फिर कहने लगे —॥ २५-२७ ॥ जब आप मेरी शक्तिको रणाङ्गणमें कुण्ठित होते देखें, तब मेरी सहायता कीजियेगा। तबतक आप मेरे कहनेसे यहीं रहकर सकुटुम्ब अपनी सेनाकी रक्षा करें । ऐसा कहकर रामने पिताको नमस्कार किया और धनुषको ठीक करके रथपर सवार होकर चल दिये । उनके पीछे लक्ष्मण भी गये । उन दोनोंको जाता देख भरत और शत्रुघ्न भी उनके साथ चल दिये ॥ २८-३० ॥ उन सबको जाते देखकर राजा दशरथने दस हज़ार सैनिकोंकी सेना उनके साथ भेजी । उधर सब राज रथस्थित रामको आते देख अपनी सेनामें एक दूसरेको दिखाने लगे कि यह राम अपने पिताके रथपर सवार होकर आ रहा है। यह बड़ा तेजस्वी है। विशाल शालावाले पेड़के समान ऊँचे तथा शोभित कन्धोंवाला राम स्वयं कोविदार ( कचनार या रक्तकाञ्चन ) की ध्वजा लगाये हुए अपने पिताकी आज्ञासे उनके ही रथपर सवार होकर आ रहा है। ऐसा कहकर वे सब राज युद्ध करनेके लिए रथ लेकर चले। पश्चात् परस्पर बड़ा भारी युद्ध होने लगा ॥ ३१-३५ ॥ वे सब एक दूसरेपर अस्त्र, शस्त्र, तीर, तोप तथा फरसे चलाने लगे । वे राजे रामके सैनिकोंको छोड़कर रामपर झपटे ॥ ३६ । ये लोग आकाशको व्याप्त करके बड़े-बड़े शस्त्रों तथा बाणोंकी वर्षा करने लगे । उन सब राजाओंको अकेले रामके साथ युद्ध करते देख लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न भी दौड़ पड़े और उनमें तारकासुर तथा कार्तिकेयकी तरह भयानक युद्ध होने लगा। तब उन