भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः १८ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ७०५


ययुस्ते राघवं द्रष्टुमयोध्यायां मुदान्विताः । २३ । गन्धर्वराजगेहे स भोजनं कर्तुमुद्यतः । स्नात्वा तत्र सुहृद्गेहे सीतया बन्धुभिः सुखम् ॥२४॥ पुत्राभ्यां भोजनं कर्तुमशने संस्थितोऽभवत् । गन्धर्वराजः श्रीरामं पूजयामास सादरम् ॥ २५॥ परिवेषितानि पात्राणि सुहृत्स्त्रीभिस्तदा ऽभवत् । दिव्यान्र्नैर्मधुरैः श्रेष्ठैः पक्वान्नैर्विविधैरपि ॥२६॥ एतस्मिन्नन्तरे विप्रा रामनाथपुरस्थिताः, सुहृद्गेहे गतं रामं श्रुत्वा तत्र बभूवुस्ते ॥२७॥ गन्धर्वराजद्वारस्थैर्दूतैः श्रीरामवाय हि । भूसुराणामागमनं तदा शीघ्रं निवेदितम् ॥२८॥ तद्दूतवचनं श्रुत्वा राघवश्चातिसम्भ्रमात् । प्रत्युद्गम्य स्वयं विप्रान्ननाम शिरसा प्रभुः । २९॥ गन्धर्वराजगेहे तांश्चात्वा ऽऽसनेष्वपि हि । स्नातुमाज्ञापयन्सर्वाञ् भोजनार्थं रघूत्तमः ॥३०॥ तदा ते मन्त्रयामासुर्विप्राः सर्वे परस्परम् । भोजन-पूर्वमेवैतं याचनीयं स्ववांछितम् ॥३१॥ केचिदूचुस्तदा विप्रा निर्वत्रं च शृण्वते नोपेक्षाऽस्ति सर्वदायं ददाति द्विजवांछितम् ॥३२॥ व्रतमेवास्य रामस्य द्विजवांछितपूरणम् । एवं तान्मन्त्रयमाणांश्च रामो दृष्ट्वाऽब्रवीद्वचः ॥३३॥ ज्ञातं मयाऽभिलषितं युष्माकं मुनिपुङ्गवाः । राज्येच्छया समायाताः किमर्थं श्रमिता द्विजाः ॥३४॥ कथं न प्रेषितः शिष्यस्तदाज्ञयैव च मया । वांछाऽभविष्यद्युष्माकं पूरिता क्षणमात्रतः ॥३५॥ एवं तान्ब्राह्मणानुक्त्वा लक्ष्मणं प्राह राघवः । मया ब्रह्मपुरस्याद्य विप्रेभ्यो राज्यमर्पितम् ॥३६॥ शिलायां लिख मन्नाम दानं दत्तमिति । तथेति रामवाक्येन लक्ष्मणश्चातिसम्भ्रमात् । ३७। रङ्ककारान्समाहूय शिलामानयेतानिति । शीघ्रमाज्ञापयामास ते जग्मुर्नृपवचसा ॥३८। एतस्मिन्नन्तरे विप्राः प्रोचुस्ते राघवं मुदा । कृत्वाऽशनं लेखनीया शिला पश्चाद्रघूत्तम ॥३९॥ किमर्थं क्रियते राम त्वरा लेखनकर्मणि परिवेषितानि पात्राणि वयं चापि क्षुधार्दिताः ॥४०॥


प्रशंसा सुनकर कि वे ब्राह्मणोंकी कामना पूर्ण करते हैं। दक्षिण देशके रहनेवाले बहुतसे ब्राह्मण हजारोंकी संख्यामें एकत्रित होकर रामसे मिलने गये। उधर राम प्रसन्न मनसे गन्धर्वराजके भवनमें भोजन करने गये हुए थे। सीता तथा भ्राताओंके साथ उन्होंने वहीं ही स्नान किया था और अपने दोनों बेटोंके साथ धोकर भोजन करने बैठे थे। गन्धर्वराजने सादर रामका पूजन किया ॥ २०-२५ ॥ गन्धर्वराजके घरकी स्त्रियों तथा मित्रोने शीतान्नादि दिव्यान्न तथा विविध प्रकारके पक्वान्न आदि परसना प्रारम्भ किया ॥ २६ ॥ इसी समय रामनाथपुरके निवासी विप्रगण रामके द्वारपर आये तो उन्हें ज्ञात हुआ कि राम अपने सम्बन्धीके घर गये हैं। बस, वे लोग भी गन्धर्वराजके यहाँ जा पहुंचे और द्वारवालोंने रामको यह खबर दी कि रामनाथपुरके ब्राह्मण आये है। दूतकी बात सुनकर स्वयं राम तुरन्त उठे और उन लोगोंके पास जाकर प्रणाम किया और उन्हें गन्धर्वराजके घरमें ले गये। आसनपर बिठाकर उनसे स्नान भोजन करनेके लिये कहा ॥ २७-३० ॥ उस समय उन सबोंने मंत्रणा करके निश्चय किया कि भोजन करनेके पहले ही हम लोग अपनी माँग उपस्थित कर दें। उनमेंसे कुछने कहा कि इतनी जल्दी क्या है, राम कभी याचकोंकी उपेक्षा नहीं करते। बल्कि वे सदा ब्राह्मणोंकी याचना पूरी करनेको तैयार रहते हैं। इन रामका यही व्रत है कि ब्राह्मणोंकी माँगें पूर्ण किया करें। इस प्रकार परस्पर सलाह करते हुए ब्राह्मणोंको देखकर रामने कहा कि हम आप लोगोंकी इच्छाको जान गये हैं। आप लोग राज्यकी इच्छासे मेरे पास आये हैं। सो इसके लिए आपने इतना परिश्रम क्यों किया ? ॥ ३१-३४ ॥ आप अपने किसी शिष्यको ही भेज दिये होते तो मैं क्षणभरमें आपकी इच्छा पूर्ण कर देता ॥ ३५ ॥ इस तरह उन ब्राह्मणोंसे कहकर रामने लक्ष्मणसे कहा कि आज मैंने ब्रह्मपुरका राज्य ब्राह्मणोंको दान दे डाला है। एक शिलापर मेरा नाम लिख दो और उसमें यह भी लिखवा दो कि मैंने ब्राह्मणोंको ब्रह्मपुरका राज्य दान दे दिया है। "बहुत अच्छा" कहकर लक्ष्मणने तुरन्त पत्थर खोदनेवाले सन्तगासोंको बुलवाया और एक बड़ी शिला मँगवायी। दूत लक्ष्मणके भ्रातानुसार तुरन्त चल पडे ॥ ३६-३८ । तब उन विप्रोंने रामसे