भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 536, कुल 811 में से

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पृष्ठ 536

५७० आनन्दरामायणे [ सर्गः २०

किं सुखं ह्यवतारोऽयं हि तिर्यग्योनावपि मयि । अतश्चास्मिन्नवतारे न स्थितं हि चिरं मया ।२६। ततः समुद्रमथने मज्जन्तं मन्दराचलम् । दृष्ट्वा धृत्वा कूर्मरूपं स्वपृष्ठे पर्वतो धृतः ॥२७॥ तत्रापि गर्हितं रूपं मया ैव विचार्य तत् । किं चाग्निरजस्त्वां हि सुखं तत्र भवेज्जले ॥२८। ततो दृष्ट्वा सागरे हि मज्जन्तीं पृथिवीं मया । क्रोडरूपं महत्कृत्वा दंष्ट्रायामवनिर्धृता ॥२९॥ मम पृथ्वीति मन्यधी हिरण्याक्षो मया हतः किं सुखं पशुयोन्यौ हि गदितायां भवेज्जले ॥३०। अतश्चास्मिंश्चावतारे न लब्धं ह सुखं मया । प्रह्लादवचनात्स्तम्भाच्चाऽनिसिंहस्वरूपधृक् ॥३१। अवतीर्णस्त्वहं भूम्यां हिरण्यकशिपुः क्षणात् मया तदा हतः क्रोधात्तद्वयमतिभास्वरम् ।३२। यद्द्रष्टुन्निकटे कोऽपि प्रह्लादाच्च विनाऽपरः । न मानवः स्थितो भूम्यां तत्र वार्ता सुखस्य का ।३३। तदाऽतिक्रोधरूपेण सिंहयोन्या तु किं सुखम् । मयाऽनुभूतं विपुलं सुखेच्छामुपिमाप न ।३४। ततो बलेर्मोहनार्थं खर्वरूपं तु वामनम् । धृत्वा कृत्वा त्रिपद्याञ्च भूमेः पातालतः कृतः ।३५। तत्र किं मुनिदेहेन वने मौर्य्य भरेन्मम । न यत्रास्ति यथायोग्यं देहमप्यतिसुन्दरम् । ३६ । तत्र का सुखवार्ताऽस्ति भूम्यां मे ब्रह्मचारिणः । अश्वमेधैः सहमा नाकलोकं गतं मया ॥३७॥ पुनर्विप्रोद्भवेनैव जामदग्न्यस्वरूपिणा । एकविंशतिवारं हि निःक्षत्रा पृथिवी कृता ॥३८॥ सहस्रार्जुननामा च महावीरो हतस्तदा । तत्रापि क्रोधसंयुक्तं मुनिरूपं मया धृतम् ॥३९॥ सुखवार्ता मुनीनां हि का तत्र वनचारिणाम् । ज्ञात्वैवं जन्मना तेन तपश्चर्या मया कृता ॥४०॥ किं सुखं तपसस्तत्र वने मे जनमुत्तमम् । एवं षड् वै धृताः पूर्वमवतारा मया भुवि ।४१। न ज्ञाता सुखवार्ताऽपि तत्र क्वापि मुनैःसखाः । द्वपरेऽद्य कृष्णरूपं गोकुलेऽत्र करोम्यहम् । ४२॥


इसलिये उस अवतारमें उस रूपमें मैं ज्यादा दिनोंतक नहीं रहा ॥ २६ ॥ इसके बाद समुद्रमन्थनके समय जब मैने मन्दराचल पर्वतको डूबते देखा, तब कूर्म (कछुआ) का रूप धारण करके उस पर्वतको अपनी पीठपर धारण किया ॥ २७ ॥ उस स्वरूपको भी अच्छा न समझकर मैं अधिक दिनोंतक उस रूपमें नहीं रहा । भला जलचर जाति तथा जलमें रहकर मैं सुखी कैसे हो सकता था ? ॥ २८ ॥ तदनन्तर पृथ्वोको समुद्रम डूबती देखकर मैने क्रोड (शूकर) रूप धारण करके पृथ्वोको अपने दाँतोंपर रखकर उठाया । २९ । इस पृथ्वीपर मेरा राज्य है। अतएव यह पृथ्वी मेरी है। इस प्रकार दुर्बुद्धि मानवाले हिरण्याक्ष नामक असुरका मैंने संहार किया। पशुयोनिमें रहकर भी मुझे कोई विशेष सुख नहीं मिला। इसलिए उस रूपको भी जल्दी ही त्याग दिया, फिर प्रह्लादके वचनानुसार नृसिंहम्प धारण करके खम्भेसे निकलना पड़ा ॥ ३० । ३१ उस समय अवतार लेकर मैंने क्षणमात्रमें हिरण्यकशिपुको समाप्त कर दिया। मेरा वह रूप बड़ा तेजस्वी था ॥ ३२ ॥ उनके डरसे प्रह्लादके सिवाय मेरे पास जानेकी सामर्थ्य किसीमें नहीं थी तो बताओ, ऐसी योनिमें मैं सुखो कैसे रह सकता था । उस समय मेरा वह क्रोधपूर्ण रूप था, दूसरे सिंहकी योनि थी। इस योनिको मैने अनुभव कर लिया। इच्छा थी कि इस रूपमे मैं कुछ आनन्द पाऊँ, लेकिन नहीं पा सका ॥ ३३ । ३४ ॥ तत्पश्चात् बलिको नीचा दिखानेके लिए मैने बहुत ही छोटा वामनका रूप धारण किया और तीन पैरोमें सारी त्रिलोकी नापकर बलिको पाताल लोकमे भेज दिया। ३५ ॥ उस समय भी एक तो मुनिका भेष, दूसरे वनोमे रहना, तीसरे शरीर भी जितना चाहिए उतना सुन्दर नहीं था । ३६ । ब्रह्मचारी बनकर पृथ्वोपर रहकर सुख कहाँ था ? इसी लिए उस रूपको भी शीघ्र त्यागकर मैं स्वर्गलोकको लौट गया ॥ ३७॥ फिर मैंने ब्राह्मणरूपसे परशुरामका अवतार लेकर इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियशून्य कर डाला। उसी समय महावीर सहस्रार्जुनका वध किया। उस समय भी एक क्रोधी मुनिका रूप धारण करना पड़ा था ॥ ३८। ३९ ॥ वनमें रहनेवाले मुनियोंको भला कब सुख मिल सकता था। यह समझकर मैंने उस जन्मम भी तपस्या ही की ॥ ४० ॥ उस तपस्वी जीवनमें वनोंमें रहकर मुझे क्या सुख मिला होगा इसका आप लोग भी अनुमान कर सकते हैं। इस तरह मैने छः

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