भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 543

सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५२७


सीतया पूजिताः सर्वास्तां नत्वामन्त्र्य जानकीम्। पंचस्नान मथाप्याय जग्मुः स्वं स्वं स्थलं प्रति ॥१६॥ अथैकदा गुरोरास्याद्भावाग्रे संस्थितो लवः। शृण्वन्पुराणं पप्रच्छ श्रोतॄ सर्वान् ज्ञानान्गुरूम् ॥१७॥ शृण्वे ते प्रष्टुमिच्छामि तन्मे वद मुनीश्वर । पुस्तकेषु च सर्वत्र पत्रे पत्रे पृथक् पृथक् ॥१८॥ एकत्र लिख्यते श्रीति रामेत्येकत्र लिख्यते । किमर्थं धारवैन्तन्मे कथयस्व माम् ॥१९॥ इति तद्वचनं श्रुत्वा गुरुस्तं वाक्यमब्रवीत् । वसिष्ठ उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स लोकसंदेहहन्परम् । २०॥ श्रीरामचरितं पूर्वं व्यासेन मुनिना पृथक् । अष्टादश पुराणानि तथोपपुराणानि च ॥२१॥ कृतान्यन्यैश्च मुनिभिः षट्शास्त्रादीन्यनेकशः । श्रीरामचरितादेव श्लोकमात्रमपीह यत् ॥२२॥ सर्वमस्तीति दृष्ट्वैवमुभयोरेकत्र श्रीति च । विनिश्चयैकत्र रामेति तन्मध्येषु परिलिख्यते ॥२३॥ अनया संज्ञया सर्वे ज्ञास्यन्त्यग्रे जना भुवि । श्रीराम मध्ये लिखितं श्रीरामचरितादिदम् ॥२४॥ कृतमस्ति पृथक् भिन्नं पुरा व्यासादिभिस्त्विति । एतत्सन्कामनाद्वाल सूचनार्थं विलिख्यते ॥२५॥ श्रीरामेति पृथक् पत्रे सर्वत्र जगतीतले । अन्यच्च कारणं वच्मि तच्छृणुष्व प्रियो लव ॥२६॥ अशुद्धं लिखितं पश्चादज्ञानतो भ्रान्तिशोऽपि हि । पत्र तच्चाप्यतिशुद्धं हि भवत्विति मनीषिणा ॥२७॥ श्रीरामेति च सर्वत्र पत्रे पत्रे विलिख्यते । यदङ्कितं श्रीरामेति नाम्ना पत्रं तु लेखकैः ॥२८॥ ज्ञेयं तच्चाति शुद्धं हि गतदोषस्तु लेखकः । सर्वत्र्यत्र जगत्त्यां हि सत्यं लव वदाम्यहम् ॥२९॥ इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं वसिष्ठं प्रणिपत्य च । लवः स गतसन्देहस्तूष्णीमासीन्मुदान्वितः ॥३०॥ एकदा रघुनाथस्तु मंचकोपरि संस्थितः । मुखात्ताम्बूलस्य रक्तं प्रथमे दोषकारकम् ॥३१॥ त्यक्तुकामो न ददर्श पात्रं निष्ठीवनस्य सः । तस्यांतिके स्थिता दासी नाम्ना वै सुगुणेति च ॥३२॥


प्रसन्न हुईं और उन्होंने फिरस सीताका पूजन किया ॥ १५ ॥ साताने भी फिर उनका पूजन किया और वे सीताको प्रणाम करके और उनसे आज्ञा लेकर पंचस्नान समाप्त हो जानेपर अपने-अपने घर चली गयीं ॥ १६ ॥ इसके बाद एक दिन गुरु वसिष्ठ बड़े पुराणोंकी कथा सुना रहे थे। रामचन्द्रजी और लव भी बैठे हुए थे । कथा सुनते-सुनते लवने सब बातोंको ज्ञान प्राप्त करनेके लिए वसिष्ठसे कहा—॥ १७ ॥ हे गुरो ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ, सो बताइए । प्रायः ऐसा देखा जाता है कि सब पुस्तकोके पन्ने-पन्नेमें एक ओर 'श्री' और दूसरी ओर 'राम' ऐसा लिखा जाता है। लोग ऐसा क्यों करते हैं? यह कृपया हमें बता दीजिये ॥ १८ ॥ १९ ॥ इस प्रकार लवका प्रश्न सुनकर वसिष्ठने कहा—हे वत्स तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। इससे बहुतोंका सन्देह दूर हो जायगा ॥ २० ॥ पहले व्यास मुनिने श्रीरामचन्द्रके चरित्रात्मक अट्ठारह पुराण और अट्ठारह ही उपपुराण बनाये ॥ २१ ॥ उसी तरह और-और ऋषियोंने षट्शास्त्र आदि बनाकर तैयार किये । सब ग्रंथोंके सभी श्लोक श्रीरामचरित्स बने हैं। इसी बातको बतलानेके लिए प्रत्येक पन्नेमें 'श्री' लिखकर 'राम' लिखा जाता है ॥ २२ ॥ २३ ॥ इस संकेतसे संसारके मनुष्य पुस्तक देखकर यह समझेंगे कि ये सब ग्रंथ श्रीरामचरितके अन्तर्गत हैं, हे वत्स ! श्रीराम लिखनेका एक कारण यह है, जो बता चुका । दूसरा भी बतलाता हूँ—हे लव ! सो भी सुन लो ॥ २४-२६ ॥ अज्ञानतासे वा भ्रमवश ग्रन्थमें जो कोई शब्द अशुद्ध लिखा गया हो, वह पन्ना अत्यन्त शुद्ध हो जाय । इस विचारसे भी पन्नेमें लेखकगण श्रीराम लिखते हैं ॥ २७ ॥ २८ ॥ ऐसा करनेसे अशुद्ध भी शुद्ध हो जाता है और लेखकको कोई दोष नहीं लगता। हे लव ! मैं तुमको यह सब सच्ची बातें बतला रहा हूँ ॥ २९ ॥ इस प्रकार समाधान सुनकर लवका सन्देह निवृत्त हो गया और वे चुपचाप बैठ गये ॥ ३० ॥ एक बार राम मंचपर बैठे थे । मुखमें ताम्बूल था । ताम्बूलका प्रथम रस दोषकारक होता है, इस ख्यालसे उन्होंने थूकना चाहा । किन्तु निष्ठीवनपात्र (पीकदान) नहीं दिखायी पड़ा । रामके पास ही खड़ी सुगुणा नामकी दासी रामकी इच्छा