श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 549, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः २१] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) २५३
कीर्तयामास स मुनिर्वारं वारं मुदान्वितः । कलकण्ठस्वरेणैव महापातकनाशनम् ॥ २९॥
॥ पालय मां दीनं राघव पालय मां दीनम् ॥ इति मन्त्रः
तं मुनिं राघवो दृष्ट्वा प्रत्युद्गम्याथ भक्तितः । नत्वाऽऽसने मणिनये वासयामास सादरम् ॥३०॥
ततः प्रक्षाल्य दम्पती सीतया रघुनन्दनः । धेनुं निवेद्य गायेन्द्रीं पूजयामास तं मुनिपुङ्गवम् ॥३१॥
हेमपात्रं भोजनार्थं मुनेरग्रे निवेश्य च । परिवेशणार्थं श्रीरामः प्राह सीतां जानकीम् ॥३२॥
सीताऽपि कामधेनूत्थपरमान्नानि विगृह्य सा । हेमपात्रे नरोत्कृष्टानानेतुं परिवेशकम् ॥३३॥
कर्तुं कङ्कणमञ्जीरकिङ्किणीनूपुरस्वना । सा ययौ नारदः प्राह श्रीरामवं तदा ॥३४॥
राम राजीवपत्राक्ष नाहं सीतासमर्पितम् । दिव्यमन्नमहं चाद्य करिष्यामि नृपोत्तम ॥३५॥
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा सीताऽऽसीच्चकिता तदा । प्रहृतं च समादाय भ्रमेण मुन तदा ॥३६॥
पप्रच्छ कारणं व्यग्रः सर्वकर्ता स्वयं प्रभुः । किं कारणं वद मुने किमर्थमनयाऽर्पितैः ॥३७॥
अभुङ्क्त्वं भोजनं नाद्य करोषि मुनिपुङ्गव । इति रामवचः श्रुत्वा नारदो वाक्यमब्रवीत् ॥३८॥
नारद उवाच
सीतयाऽद्य कृतं पापं किन्न वेत्सि नृपै प्रभो । यदि त्वं नैव जानासि तर्हि शृणु वदामि त ॥३९॥
द्वादश्यां तुलसीपत्रमनयाऽद्य निकृन्तितम् । यद्यसत्यं तर्हि पश्य गत्वा वृन्दावने प्रभो ॥४०॥
संक्रमेषु चतुर्दश्योर्द्वादश्योः पानपर्वसु । तुलसीं न हरेन्मर्त्योभृग्वङ्गारकवासरे ॥४१॥
नष्टे सूर्येन्दुग्रहणे प्रसूतावशचे तथा । तुलसीं ये निकृन्वन्ति च्छिन्दन्ति हरेः शिरः ॥४२॥
द्वादश्यां तुलसीपत्रं धात्रीपत्रं तु कार्तिके । लुनाति यो नरो गच्छेन्नारकानतिगर्हितान् ॥४३॥
अकाले तुलसीपत्रं छेदयेत्तपः श्रियः पुमान् । पत्रमेकं ब्रह्महत्यासममाहुर्मनीषिणः ॥४४॥
एवं तु वचनं सर्वमुनिभिर्हि प्रकीर्तितं । पुरुषाणामयं दोषस्तत्र स्त्रीणां कथाऽत्र का ॥४५॥
की रक्षा करो, हे राघव ! मेरा पालन करो" इस महापातक नाशक पञ्चदशाक्षर मन्त्रका सहर्ष उच्चारण करने लगे ॥ २८ ॥ २९ ॥ 'पालय मां दीनम्, राघव पालय मां दीनम्' यह पञ्चदशाक्षर मन्त्रका स्वरूप है । राम नारदको देखते ही उठ खड़े हुए । उन्होंने आगे बढ़कर प्रणाम किया और आसनपर बिठाला । तब सादर पूजन किया ॥ ३० ॥ सीताके साथ रामने मुनिवर पैर धोय और गोदान दिया इसके पश्चात् उनके सामने सुवर्णका पात्र रक्खा और सीतासे परोसनेके लिये साम्प्रत कहा ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ सीता भा कामधेनुसे उत्पन्न अच्छे अच्छे मिष्टान्न परोसनेके लिये कङ्कण मञ्जीर तथा नूपुरका ध्वनि करती हुई चलीं। सीताको चलती देखकर नारदने रामसे कहा हे राम ! हे राजन्पद्माक्ष !! मैं आज सीताके हाथसे परोसे हुए दिव्यान नहीं खाऊंगा ॥ ३३-३५ ॥ मुनिकी बात सुनकर सीता घबरा गयी और सब कुछ करनेवाले स्वयं प्रभु राम-ने भी अनजान बनकर विस्मित हो व्यग्रभावसे पूछा-कहो मुनिराज ! आज आप सीताके हाथका अन्न क्यों नहीं ग्रहण करते ? इस प्रकार रामकी बात सुनकर नारदने कहा-॥ ३६-३८ ॥ आज इन्होंने एक बड़ा पाप किया है। सो क्या आपको नहीं मालूम है ? अच्छा मैं ही सुनाता हूं ॥ ३९ ॥ आज द्वादशीको इन्होंने तुलसी-पत्र तोड़ डाला है। यदि आप मेरी बात सच न मानते हों तो स्वयं चलकर देख लीजिये ॥ ४० ॥ संक्रान्ति, चतुर्दशी, द्वादशी, प्रतिदिन सबेरे-सांझके समय, भृगु और मङ्गलके दिन तथा दोपहरके बाद, सूर्य-चन्द्रग्रहणके समय, घरमें सन्तति होनेपर या किसीका देहान्त होनेपर जो लोग तुलसीका पत्र तोड़ते हैं, वे मानो तुलसीका पत्र न तोड़कर भगवान्का सिर काटते हैं ॥ ४१ । ४२ । जो द्वादशीको तुलसीपत्र तोड़ता है या कात्तिकमासमें आंवलेकी पत्तियां तोड़ता है, वह अतिशय निन्दित नरकमें जाता है ॥ ४३ ॥ जो लोग असमयमें तुलसीका एक भी पत्र तोड़ते हैं। विद्वान् लोग ऐसोंको ब्रह्महत्यारा कहते हैं ॥ ४४ ॥ इस प्रकारका वचन समस्त मुनियोंने कहा है। फिर जब पुरुषोंके लिये ऐसा नियम बना हुआ है तो स्त्रियोंके लिये क्या