भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ४ ] सारकाण्डम् १९


भूभारहरणार्थाय तत्रापि वरदानतः । अवतीर्णोऽस्ति न्यक्को हि तव पुण्यमहोदयात् ॥७४॥
अधर्मस्य विनाशं च वृद्धिं धर्मस्य सादरम् । निर्दलनं हि दुष्टानां सज्जनानां च पालनम् ॥७५॥
करिष्यति महानेष तव पुत्रो रघूत्तमः । दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । ७६
करिष्यति महद्राज्यं गते त्वयि दिवं नृप । सप्तद्वीपपतिर्भार्ये भविष्यति नृपो महान् ॥७७॥
द्वौ तौ भविष्यतः पुत्रौ चतस्रश्च स्नुषास्तथा । चतुर्विंशतिपौत्राश्च पौत्र्यस्तु द्वादशैव हि । ७८।
असंख्याताः प्रपौत्राद्या भविष्यान्त सूनस्य ते । कियदिनेय्यं दंडार्ण भोक्तुं हि दंडके ॥७९॥
गमिष्यति ततः पश्चान्महद्राज्यं करिष्यति । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा नृपः प्राह मुनिं पुनः ॥८०॥

दशरथ उवाच
का वृंदा कस्य भार्या सा कथं शप्तो हरिस्तया । तन्यत्रं विस्तरेणैव कथयस्व मुनीश्वर ॥८१॥

मुद्गल उवाच
पुरा जलंधरेणामीद्युद्धं श्रीशंकरस्य च । ईशापातिव्रतबलाद्रक्षितं विष्णुना तदा ॥८२॥
ज्ञात्वा तद्दक्षितपथा पार्वत्या घर्षणादिना । जालंधरपुरं गत्वा तद्द्न्यपुटभेदनम् । ८३.
पातिव्रत्यस्य भंगाय वृंदायाश्चाकरोन्मतिम् अथ वृंदारका देवी स्वप्नमध्ये ददर्श ह ॥८४.
भर्तारं महिषारूढं तैलाभ्यक्तं दिगंबरम् । दक्षिणाशागतं मुण्ड तमसाऽप्यावृतं तदा ॥८५।
ततः प्रबुद्धासा बाला सं स्वप्नं स्वं विचिन्तती । कुत्रापि नालभच्छर्म गोपुराट्टालभूमिषु । ८६।
वनः सखीद्वययुता नगरेयानमागता । वनाद्वनान्तरं याता ददर्शातीव भीषणौ ॥८७॥
राक्षसौ सिंहवन्नादौ दंष्ट्रानयनभीषणौ । तौ दृष्ट्वा विह्वलाऽतीव पलायनपरा तदा ॥८८।
ददर्श तापसं शांतं मशिष्यं मौनमास्थितम् ततस्तत्कण्ठम सज्य निउबाहुलती मयात् ॥८९।
मुने मां रक्ष शरणभागतामित्यभाषत । तत्तस्या वचनं श्रुत्वा ध्यान मुक्त्वास वै मुनिः ॥९०।


हित-अहित जानना चाहता हूँ ॥ ७२ ॥ राजाकी बात सुनकर मुनि मुद्गल कहने लगे—साक्षात् नारायण तथा शय्याश्रो जनार्दन विष्णुभगवान् पृथ्वीका भार उतारने तथा पूर्वजन्ममें आपको वरदान देनेके कारण आपके पुण्य-प्रतापसे स्वयं अवतरे हैं। ये अधर्मका नाश करके धर्मकी वृद्धि करेंगे। रामचन्द्रजी दुष्टोंका दलन करके सज्जनोंका पालन करेंगे हे नृप ! आपके देवलोक चले जानेपर ये दस हजार दस सौ वर्ष तक राज्य करेंगे। ये सप्तद्वीपके अधिपति और महान् राजा होंगे ॥ ७३-७७ ॥ इनके दो पुत्र और चार पुत्रवधुएं होंगी। चौबीस पौत्र और बारह पौत्रिए होंगी। आपके पुत्र रामके पश्चात् असंख्य होंगें । कुछ दिनोंके लिए ये दण्डकारण्यमें दंड प्राप्त शास्ता पुडात जायंग उसके बाद विशाल राज्य करेंगे । यह सुनकर राजाने फिर मुनिसे कहा ॥ ७८-८० ॥ राजा दशरथ बोले- वृन्दा कौन थी तथा किसकी स्त्री थी ? उसने भगवान्‌को क्या शाप दिया ? हे मुनीश्वर ! यह सब विस्तारपूर्वक कहें ॥ ८१ । मुद्गल बोले- पूर्वकालमें जलन्धर नामका एक दैत्य था। तृष्णा उसका बड़ी पतिव्रता स्त्री थी। उसके पातिव्रतके बलसे वह शिवजीके साथ युद्ध करके भी नहीं हारा। तब भगवान् विष्णु पार्वतीसे उसका कारण जानकर उनके कथनानुसार जालन्धरपुर गये। वहां धर्मध्वजका भरण करके वृन्दाका पातिव्रत भङ्ग करनेके लिए उन्होंने उसके साथ भोग करनेका विचार किया, तभी वृन्दारवीने स्वप्नमें अपने पति को तेलसे नहाये, नंगे शरीर, भैंसेपर चढ़कर दक्षिण दिशाको जाते, सिर मुड़ाये तथा तमेंसे आच्छादित देखा। जब वह बाला जागी तो स्वप्नपर विचार करने लगी। गोपुर छत तथा अटारी आदिवर उसे कहीं चैन नहीं मिला ॥ ८२-८६ ॥ तब वह अपनी दो सखियोंको साथ लेकर नगरके बाहर बागमें मन बहलाने लगी । वहाँ एकसे दूसरे और दूसरेसे तीसरे वनमें वह जब फिरने लगी, तब उसको भयानक सिंहके समान गर्जन करनेवाले और भयंकर दांत तथा नेत्रवाले दो राक्षस दिखाई दिये । उनका देख तथा विह्वल होकर वह इधर-उधर भागने लगी। उसे वहाँ सहसा शिष्योंसे युक्त एक मौनव्रतधारी शांत तपस्वी दिखायी दिये। तब वह अपनी दोनों भुजारूपिणी