भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 551

सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५३५


शृण्वत्र कारणं सीते सर्वं त्वां मददावहम् । पतिव्रताभिनिर्णीतिर्विना स्वपतिना मुदा ॥ ६५ ॥
पुष्पादीनां सुगन्धोऽपि नान्यग्राह्यः कदाचन । सोऽद्यैकादिनः पूर्वं मुदा नाघ्रातमस्य च ॥ ६६ ॥
तद्वृत्तं बुद्ध्य्वा रामचन्द्रो मयैषा रचिताऽद्य हि । उद्दिश्यैतां तुलस्याश्च तन्पत्रं पतितं भुवि ॥ ६७ ॥
स्वद्भक्त्यैवापराधेन शिक्षां कर्तुं दयालु हि । रामस्यांतर्गतं ज्ञात्वा दोषारोपः कृतस्त्वयि ॥ ६८ ॥
मया सीते क्षमस्वाद्य मा क्रोधं भज मां प्रति । नारीणामुपकारार्थं तेन त्वमद्य शिक्षितम् ॥ ६९ ॥
नोचेद्वदहितं पथा स्त्रियः सर्वाः पतिं विना । लभेयुश्चान्नपुष्पादि नानाभोगांस्तदान्विताः ॥ ७० ॥
इदानीं शृणु मद्वाक्यं येन श्रीराघवप्रभोः । पत्रस्य च तुलस्याश्च दृढो मन्धर्भविष्यति ॥ ७१ ॥
वृन्दावने पुनर्गत्वा त्वं ब्रूहि कमलेक्षणे । विना पद्मसुगन्धस्याद्यपत्राद्यदे गभितम् ॥ ७२ ॥
पातिव्रत्यं मयाऽम्यत्र तद्यनूत्कुरमादलम् । तुलस्यां माऽम्रानातु नायकाप्नोतुवै विषयम् ॥ ७३ ॥
अनेन वचनेनाथ तत्पत्रं सन्धिनिपुणम् तुलस्याः क्षमभावण पूर्ववच्च भविष्यति ॥ ७४ ॥
अतस्त्वं याहि तुलसीं विषादं भज मा रमे । इत्युक्त्वा सीतया शीघ्रं तुलसी नाब्दो ययौ । ७५ ॥
सीताऽपि तुलसीं नत्वा शृण्वत्सु सकलेष्वपि । समक्षेषु सुराणां च देवादीनां वचोऽब्रवीत् ॥ ७६ ॥
विना पद्मसुगन्धस्याऽघ्राणाद्यदि रक्षितम् पातिव्रत्यं मयाऽप्यत्र तर्ह्येतत्तुलसीदलम् ॥ ७७ ॥
तुलस्याः सन्धिमाप्नोतु नोचेन्नाप्नोतु वै विदः । एवं वदति जानक्यां तत्त्वमेव समेन तत् ॥ ७८ ॥
प्राप्तं सन्धिं पूर्ववच्च पश्यत्सु सकलेष्वपि । तदा निनेदुर्वादित्राणि देवानामश्चतस्त्य च ॥ ७९ ॥
देवनार्यो विमानस्थे संस्थिताः पुष्पवृष्टिभिः । वर्णयामासुरूवी शमं विशा उच्चैर्जयस्वनान् ॥ ८० ॥
तदा सीतां समालिङ्ग्य राघवो मुदिताननान् । आह तुष्टमनः श्रीमान् प्रमनाह्यभूपिता ॥ ८१ ॥
हे सीते कञ्जनयने मुनीनामपि मोहिनि । नेदं मया शिक्षितं ते सर्वस्त्रीणां सुशिक्षितम् ॥ ८२ ॥
धर्मसस्थापनार्थाय साधूनां पालनाय च । दुष्टानां च विनाशाय मयेदं रूपमाश्रितम् ॥ ८३ ॥


कहा-हे सीते ! इस पत्रक न जुड़नेका जो कारण है वह मैं बतलाता हूँ। पतिव्रता स्त्रियोंको चतुर कि यिः उनके पतिने सौंप के सुगन्धन दिया हो तो स्वंय भी पुष्पादिकका सगन्ध न लें। आपने इस रोज़ रातके सूघे बिना ही कमलका फूल सूंघ लिया था ॥ ६४-६६ ॥ रामका यह बात मालूम हो गयी थी। इसीसे उन्होंने यह मया रची है तुलसीका पत्र भी उन्हींकी इच्छासे गिर गया था ॥ ६७ ॥ आपको शिक्षा देने ही के लिए उन्होंने ऐसा किया है। रामकी इच्छा देखकर ही मैंने आपपर दोषारोप किया है। सां क्षमा करो। मेरे ऊपर कुपित न हो नारीजातिको शिक्षा दनक लिए ही उन्होंने यह कौतुक रचकर आपको उपदेश दिया है ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ व यदि ऐसा न करेंगे तो आपके बनाये मार्गके अनुसार संसारकी समस्त स्त्रियां अपने-अपने पतिको अल्य करके स्वयं विविध प्रकारके भोगोंका उपभोग करने लगेंगी ॥ ७० ॥ सुनिए, अब मैं बतलाता हूँ कि किस तरह यह पत्र वृक्षमें जुड़ेगा ॥ ७१ ॥ आप फिर वृन्दावनेमें जाकर कह कि उस कमलका फूल सूंघनेके सिवाय यदि मेरा पतिव्रत धर्म सुरक्षित हो तो यह पत्र जुड़ जाय और यदि मैं अपने धर्मको सुरक्षित न रख सकी होऊँ तान जुड़े ॥ ७२ । ७३ । आपके इस बचनसे तत्काल वह जुड़कर पहिलेकी तरह हरा-भरा हो जायगा ॥ ७४ । हे लक्ष्मीस्वरुपिणी सीते अब चलें किसी प्रकारका विषाद न करें। ऐसा कहकर नारदजी सीताके साथ-साथ उस कुञ्जमें वाग गये ॥ ७५ ॥ सीता जी जर समस्त परिवारके सभी लोग तथा सारे देवता एकत्र होकर सुन रहे थे, तब उन्होंने कहा--॥ ७६ ॥ यदि उस कमलका सुगन्ध लेनेके अतिरिक्त मेरा पातिव्रत धर्म सुरक्षित हो तो यह तुलसीदल अपने स्थानपर जुड़ जाय, अन्यथा नहीं जुड़े । सीत।के ऐसा कहते ही क्षणामात्रमें वह पत्र वैसे ही तरह पूर्ववत् जुड़ गया। सब लोग खड़े यह कौतुक देख रहे थे। पत्रके जुड़ते ही देवताओंने बाजे बजाये और देवांगनाओंने पुष्पवृष्टि की एवं ब्राह्मणोंने एक स्वरसे जयजयकार किया। ७७-८० । इसके बाद रामने सताको हृदयसे लगा लिया और प्रसन्न मनसे कहा कि हे मुनियोंके भी मनको मोहनेवाली सीते ! यह मैने तुम्हींको नहीं समस्त नारीजातिको शिक्षा दी है। धर्मकी