श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 554, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५३८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १३ |
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त्रयोविंशः सर्गः
(आनन्दरामायणकी महिमा)
श्रीरामदास उवाच
अथ रामः स वैदेह्या पञ्चभिस्तनयादिभिः । चकार राज्यं धर्मेण लोकवन्द्यपदाम्बुजः । १ ।
एतस्मिन्नन्तरेऽयोध्यापुर्यां श्रीरघुनायकम् । नत्वैकदाऽब्रवीद्दूतो हे राम कञ्जलोचन ।। २ ।।
करोमि तव सेवां न तपश्चर्यां करोम्यहम् । ददस्वाज्ञां मम त्वं हि गच्छामि निजमन्दिरम् ।। ३ ।।
तथेति राघवेणोक्तः स ययौ निजमन्दिरम् । तत्र गत्वा शुचिर्मन्वाऽऽनन्दरामायणं शुभम् ।। ४ ।।
पठित्वा नवरात्रं तु ततस्तूर्णं बहिर्ययौ । एतस्मिन्नन्तरे एकदेशे पौरा मृतं नृपम् ।। ५ ।।
दृष्ट्वा तस्य सुतं बालं तान्वा कर्तुं हि मन्त्रिणम् । चक्रिरे निश्चयं तत्र केचिद्दुष्टगुणं शुभः ।। ६ ।।
केचिद्दुष्टगुणं नैष कार्यो मन्त्री खलस्त्वयम् । एवं विवदमानास्ते चक्रुर्वै निश्चयं तदा ।। ७ ।।
करिणी निजशुण्डाग्रमालया यं वरिष्यति । सोऽस्तु मन्त्री निश्चयेन ततस्तां करिणीं वरैः ।। ८ ।।
वस्त्रालङ्कारभूषाद्यैः शोभयामासुरादरात् । तत्तुण्डायां रत्नमालां दत्त्वा तां मुमुचुस्तदा ।। ९ ।।
ततस्ते नववाद्यानि वाद़यामासुरादरात् । तदा सा करिणा ग्रामाद्बहिस्तूर्णं ययौ शनैः ॥१०॥
अयोध्यायाः पश्चाद्योध्यां ययौ देशान् विलङ्घ्य सा । तन्पृष्ठे सकलाः पौरा नानाव्याहनमस्थिताः ॥११॥
ययुस्तूर्णं कौतुकेन कोटिशो मुदिताननाः । ततः सा कारिणी गत्वाऽयोध्यां दृष्ट्वा स्थितं तदा ।। १२ ।।
तं दूतं वरयामास येन पारायणं कृतम् । आनन्दरामचरितस्याहो तन्कौतुकं महत् ।। १३ ।।
बभूव सकलान् लोकान् ततस्तं माल्याङ्कितम् । करिण्या मन्त्रिणं चक्रुस्ते पौरा ये समागताः ।। १४ ।।
तं निन्युः करिणीमस्थं पत्नीपुत्रसमन्वितम् । स्वदेशे मन्त्रिणं चक्रुस्तदद्भूतमिवाभवत् । १५ ।।
श्रीरामदास कहने लगे—इसके अनन्तर सहाससे वन्दित राम जब सीता, पुत्रों और भ्राताओंके साथ धर्मपूर्वक राज्य कर रहे थे । १ ॥ उसी समय एक दूतने अयोध्यापुरीमें रामके पास आकर कहा कि हे कमललोचन राम ! अब आपकी सेवा न करके मैं तपस्या करना चाहता हूँ । मुझे आज्ञा दीजिए तो अपने घर जाऊँ ॥ २ ॥ ३ ॥ रामने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और वह अपने घर चला गया । वहाँ पवित्र मनसे उसने नौ रात्रि तक इस कल्याणदायक आनंदरामायणका पाठ किया और बादमें घरके बाहर निकला उसी समय एक देशका राजा मर गया था ॥ ४ ॥ ५ ॥ उसका पुत्र बालक था। सो उसके लिये किसीको मंत्री बनानेकी आवश्यकता पड़ी। अब पुरवासियोंमें मंत्रणा होने लगी कि किसको मंत्री बनाया जाय । कोई किसीको कहता कि अमुक मनुष्य अच्छा है, उसे मंत्री बना दिया जाय । किन्तु उसकी बात काटकर दूसरा कहता कि नहीं, वह बड़ा दुष्ट है । उसे मंत्री नहीं बनाया जा सकता । इस तरह परस्पर झगड़ा करते-करते यह निश्चय हुआ कि ॥ ६ ॥ ७ ॥ राजाकी हथनी अपनी सूँड़में माला लेकर जिसके गलेमें डाल दे वही व्यक्ति राजकुमारका मंत्री बनाया जाय । तदनुसार अच्छे-अच्छे वस्त्र-आभूषण आदि पहिनाकर हथितीको सुसज्जित किया गया और उसकी सूँड़में एक माला देकर उसे छोड़ दिया ॥ ८ ॥ ९ ॥ इसके बाद वे लोग हर्षसे बाजे बजाने लगे । वह हथिती धीरे-धीरे नगरसे बाहर निकली ॥ १० ॥ वहाँसे चलकर वह अयोध्या पहुंची । उसके पीछे अनेक प्रकारके वाहनोपर सवार होकर नागरिक लोग भी कौतुकवश बड़े वेगके साथ प्रसन्न मनसे अयोध्या तक चले आये । उस हथितीने बाजारमें खड़े उस मनुष्यके गलेमें माला डाल दी जिसने नौ रात तक आनंदरामायणका पाठ किया था । इन लोगोंके लिये यह एक असाधारण कौतुककी बात हुई ॥ ११-१३ ॥ तब माला पहिने हुए उस दूतको लोगोंने राजकुमारका मंत्री चुन लिया । उसी हथितीपर बिठाकर पत्नी-पुत्र समेत उसे अपने देश ले गये और राजकुमारके