श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 564, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें५४६ आनन्दरामायणे [ सर्ग २४
चातुर्मास्यव्रतादीनि कर्त्तव्यानि व्रतानि हि । प्रत्यंगणेषु तुलसी पूजनीया हि सर्वदा ॥९२॥ न निराकरणीयोऽत्र स्वातिथिश्च कदाचन । न विप्रयाच्ञा कर्तव्या मृषा क्वापि कदाचन ॥९३॥ यदीच्छेन्स ततो देयं सर्वस्वं ब्राह्मणाय वै । ग्रामे गृहे क्वचिच्चैव कलहं तु समाचरेत् ॥९४॥ सदा गुरुर्वन्दनीयः कर्णपर्व श्रवं सदा । प्रातःस्नानं सदा कार्यं होतव्या विहिताग्नयः ॥९५ । कार्यो जपः शंकरस्य ध्येयो नित्यं महेश्वरः । एकांते हि तपः कार्यं द्वाभ्यामध्ययनं तदा । ९६॥ त्रिभिर्गीतानि कार्याणि चतुर्भिर्विचरेत्पथि । परदाररतिस्त्याज्या नावलोक्याऽन्यकामिनी । ९७ । परलक्ष्म्याः स्पृहा कार्या न नरैश्च कदाचन । तीर्थं विना पुण्यकाले न स्नातन्ये गृहेष्वपि ॥९८॥ न द्वेष्या गणका वैद्यास्ते पोष्याश्च पुरे पुरे । न वेश्यागमनं कार्यं न दासीं स्वहषेद्बुदि ॥९९॥ नित्यकर्म यथाकाले कर्तव्यं भवदा नरैः । नावमान्या हि गुरवः परनिंदा न कारयेत् ।१००॥ जलाशया वने कार्या रोपणीया गणाः पथि । धर्मशालाः पृथक्कार्या न नग्नां वीक्ष्यद्वधूम् ॥१०१॥ अन्नसत्राणि कार्याणि पुरे ग्रामे वने तथा । प्रकुर्वन्तु वने रक्षां मार्गस्थानां वनेचराः ॥१०२॥ भयं साऽस्तु वने क्वापि निशायां मार्गगामिनाम् वैश्येभ्यस्तु करो ग्राह्यो नेतरेषां कदाचन ॥१०३। पादद्योः पादुके धुन्वा तीर्थे देवं गुरुं प्रति । मातु वृन्दावने होमशालां गच्छेन्न सर्वदा ॥१०४॥ पारायणानि ग्रंथानां वेदानां च सदा नरैः । कर्तव्यानि तु निष्कामं ग्रामकार्याणि कारयेत् ॥१०५॥
होत धर्मकर्म करते रह। द्वारकापुरीमे जाकर लोग वैशाखस्नान कर ॥ ६० ॥ कार्तिक मासमे काशीका पञ्चगङ्गामे और प्रतिवर्ष माघमासम प्रयाग जाकर स्नान करं ॥ ९१ ॥ चातुर्मास आदिका व्रत करते रहे। हर एक घरके आँगनमे तुलसीकी पूजा होती रहनी चाहिए ॥ ९२ ॥ भर राज्यम कभी कोई आये हुए अतिथि-का अनादर न करे । कभी कोई किसी ब्राह्मणकी मति व्यर्थ न कर ॥ ९३ ॥ यदि वह चाहता हो तो ब्राह्मणके लिये अपना सर्वस्व दे डाले । किसी घर या गाँवमें कोई लड़ाई झगड़ा न करे ॥ ९४ ॥ सदा गुरुकी वन्दना करे, उनसे सर्वदा धर्मग्रंथ सुनता रह, नित्य प्रातःस्नान कर और विधिवक अग्निहोत्र करता रहे ॥ ९५ ॥ नित्य शिवजीका ध्यान और जप करता हुआ एकान्तम तपस्या करे । दो व्यक्ति साथ बैठकर अध्ययन करें, तीन मनुष्य साथ बैठकर गायें-बजायें और चार मनुष्य साथ होकर टहलने निकले । दूसरोकी स्त्रीसे प्रेम न करे, दूसरी स्त्रीको देखे भी नहीं ॥ ९६ ॥ ९७ ॥ दूसरोंकी लक्ष्मीका पानेकी इच्छा न करे, किसी पर्वकालके समय घरमें स्नान न करे, बल्कि किमा तीर्थस्थानपर चला जाय ॥ ९८॥ ज्योतिषी तथा वैद्यके साथ कोई विगाड़ न करे । यदि किसी दूसरे गाँवम भा रहते हों तो उनका पालन करे । न कोई वेश्यागमन करे और न दासीस प्रेम कर ॥ ९९ ॥ ठीक समयपर लोग अपने नित्यकर्म करते रहें । गुरुजनोका अपमान कभी न करे और न दूसरोकी निन्दा ही कर । वनमें जलाशय बनवाये । अलग-अलग धर्मशालायें बनवाये । कभी नङ्गी स्त्रीको न देखे ॥ १०० ॥ १०१ ॥ पुर, ग्राम और वनोंमें जहाँ-तहाँ अन्नक्षेत्र खोले । बनचर मनुष्य वनमें पहुँच हुए पथिकोकी रक्षा करें ॥ १०२ ॥ रात्रिके समय भी चलनेवालोको वनमे किसो प्रकारका भय न रहे, केवल वैश्योंसे कर लिया जाय और लोगोंसे नहीं ॥ १०३ ॥ पाँवमे जूता पहिनकर किसी तीर्थस्थान देवता तथा गुरुके पास न जाय । गोशाला तथा तुलसीकी बगीचीमें भी जूता पहिनकर न जाय ॥ १०४ ॥ धर्मग्रंथों और वेदोका पारायण सर्वदा सब लोग निष्कामभावसे करते रहें ॥ १०५ ॥