श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 602, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५८४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ४ |
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मध्यलिङ्गोर्ध्वयोश्च सिते नेत्रे स्मृते शुभे। पीते लिङ्गस्कंधयोध शृंखले त्रित्रिपादजे ॥१६॥ अधोमुख हरौर्ध्वं च रक्तं भद्रं द्विपट्पदम्। तिर्यग्भद्रं तु हरिते स्मृतेऽष्टादशपादजे ॥१७॥ अतः पंक्तेरूर्ध्वभागे हरितः परिधिः स्मृतः। तत ऊर्ध्वं पीतवर्णः प्रोक्तश्च परिधिः शुभः । १८ । एव प्रोक्ता प्रथमेयं पंक्तिः सर्वत्र कारयेत्। द्वितीयाया विशेषं च वक्ष्यामि न पुरेतिवत् ॥१९॥ सप्त मुद्रा हश क्षांश परिधयश्चतुर्दश । भद्रं रक्तं षट्पदं च शेषं सर्वं तु पूर्ववत् ॥२०। तृतीयायांततः पंक्तौ मुद्राः पञ्च शिवा रसाः । परिधयो दश ज्ञेया भद्रं त्रिंशत्पदान्मकम् ॥२१,। अतः पंक्तौ चतुर्थ्यां तु त्रीशा मुद्रापतुष्टयम् । परिधयोऽष्ट विज्ञेया भद्रं च नव वेदजम् ॥२२। हरिपीतयोर्मध्ये हि लोहितः परिधिः स्मृतः । पञ्चमायां ततः पंक्तौ मुद्रैका शङ्करद्वयम् ।२३॥ परिधयश्च चत्वारि भद्रं नवतिपादजम् । हरिद्रारक्तपीतवर्णा परिधयश्च पूर्ववत् ॥२४॥ षष्ठयां च ततः पंक्तौ मुद्रैका परिधिद्वयम्। नव वेदमदं भद्रं लिङ्गः परिधयोऽपि च ।२५॥ मध्येऽपि सर्वतोभद्रं वेदनेत्राग्निपादजम् । शिवदत्तुः शृंखलाश्च कृष्णाः पञ्चपदा मताः । २६।। एकादशपदा वल्ली भद्रं नवपदान्मकम् । चतुर्विंशत्पदा वापी पीतश्च परिधिः स्मृतः ॥२७॥ पदेषु षोडशेष्वेव मध्ये पद्मं यथारुचि । कर्णिका पीतवर्णा च शेषं शुद्धया नियोजयेत् ॥२८॥ एतदष्टोत्तरशतं रामलिंगात्मकं स्मृतम् । तत्र मुद्रास्वरूपं च वेदवेदैर्दुभिः स्मृतम् । २९॥ राज्यकाण्डे उत्तरार्धस्य सर्गेऽष्टादशमे पुरा। उक्तं मुद्रास्वरूपं च तथाप्यत्र तु कथ्यते ॥३०॥ पंक्तयोऽर्केमितास्तत्र सर्वा द्वादशपादजाः । तासु पूर्वदिगारभ्य क्रमेणैव प्रपूरयेत् ॥३१॥ प्रथमा सप्तमी चोभे पंक्ती कृष्णे प्रपूरयेत् । ऊर्ध्वाधः पञ्च पञ्चैव पंक्तयस्तत्क्रमं ब्रुवे ॥३२॥ पंचपंक्तिषु चोध्वं हि प्रथमायाः प्रपूरयेत्। प्रथमं चेन्द्रदिग्भागं च कृष्णवर्णं न चापरम् ॥३३॥
विचित्र वर्णोंका बनाये ॥ १५ ॥ मध्यलिङ्गके दोनों कन्धोंपर सफेद रङ्गके दो नेत्र रहें। लिङ्गके स्कन्धमें पीले रङ्गकी तीन-तीन पादोंवाली दो शृङ्खलाएँ रहें ॥ १६ ॥ शिवके ऊपर अधोमुखके ऊपर आठ पाद (कोष्ठक) से लाल रङ्गका भाग रहेगा। अष्टादश पादका तिरछा भद्र हरे रङ्गसे बनेगा। १७॥ पंक्तिके ऊर्ध्वभागमें हरे रङ्गकी परिधि रहेगी। उसके ऊपर पीले वर्णकी परिधि रहेगी ॥ १८ । उक्त रीतिसे प्रथम पंक्ति बनायी जायगी। अब दूसरी पंक्तिकी विशेषताएँ बतलाता हूँ, जो पहले नहीं बतलायी थीं ॥ १९॥ दूसरी पंक्तिमें सात मुद्रा, आठ शिव एवं चौदह परिधियाँ रहेंगी। यह भद्र छः पदोंवाला एवं लाल रङ्गका रहेगा और तीस पादका भद्र बनेगा । २० ॥ २१॥ चौथी पंक्तिमें तीन शिव, चार मुद्रा, आठ परिधियाँ और चार पादका भद्र बनेगा ॥ २२ ॥ हरे-पीतके मध्यमें लाल रङ्गकी परिधि रहेगी। पाँचवीं पंक्तिमें एक मुद्रा रहेगी और दो शिव रहेंगे ॥ २३ ॥ चार परिधि रहेगी और नव्वे पादका भद्र बनेगा। बाकी हरे-लाल-पीले वर्णकी परिधियाँ पूर्ववत् रहेंगी ॥ २४ ॥ छठवीं पंक्तिमें एक मुद्रा, दो परिधि, चार पादकी नौ और सोलह परिधियाँ रहेंगी ॥ २५ ॥ मध्यमे तीन सौ चोत्रीस पादका सर्वतोभद्र रहेगा, तीन पादकी चन्द्राकार शृङ्खला रहेगी और पाँच पादकी कृष्ण बल्लियाँ रहेंगी ॥ २६ । इसमे एकादश पादकी वल्ली रहेगी और नौ पादका भद्र रहेगा। चौबीस पादकी बापी रहेगी और वह पीले रङ्गकी रहेगी ॥ २७॥ सोलह पादोंके बीचमें अपनी पसन्दके माफिक कमल रहेगा। उसकी कर्णिकाएं पीले रङ्गकी होंगी। बाकी सब अवयव अपनी रुचिके अनुसार होंगे । २८॥ यह सैन अष्टोत्तरशत रामलिंगात्मक बतलाया है इसमें मुद्राका स्वरूप १४४ रहेगा ॥ २९ । यद्यपि राज्यकाण्डके उत्तरार्द्ध भागके अट्ठारहवें सर्गमें कह आये हैं फिर भी मुद्राका स्वरूप यहाँ बतला रहे हैं ॥ ३०॥ इसमे कुल बारह पंक्तियाँ होती हैं और हर पंक्तियोंमें बारह पाद (कोठे) होते हैं। पूर्व दिशासे आरम्भ करके उन्हें पूर्ण करना चाहिए ॥ ३१। पहली और सातवीं पंक्ति काले रङ्गसे रंगी रहनी चाहिए। ऊपर-नीचे पाँच-पाँच पंक्तियाँ रहेंगी। उनका क्रम बतलाते हैं ॥ ३२ ॥ ऊपरकी पाँच