भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 625

सर्ग: ५] मनोहरकाण्डम् १०९


कृष्णवर्णभुजानान्तु पश्चाद्भागं विभीषणम् । कर्केषु च जांबवन्तं मैन्दं दण्डेऽङ्गु स्मरेत् ॥७८॥
द्विविधं परिधिष्वेव मुद्रायां राघवं श्रिया । मुद्रायाः पश्चिमे वाथ दक्षिणे ह्युत्तरे पुरः ॥७९॥
लक्ष्मणं भरतं वापि शत्रुघ्नं वायुनन्दनम् । पूज्यपूजकरूपोमध्ये श्रेष्ठा पूर्वदिगेव हि ॥८०॥
सितायोरिधिवस्त्रेव सुषेणं परिचिन्तयेत् । सर्वत्र पदभावेषु चिन्तयेत्सर्ववानरान् ॥८१॥
बहिस्त्रिपरिधित्वेव त्रिवेणीं परिचिन्तयेत् । चतुर्दिक्पङ्किताभिमुखा दृग् रुद्राश्च वापिकाः ॥८२॥
कटेन्यो बालकाभिमुखाः कार्या वा पद्ममुखाः। चतुर्दिक्पङ्किताभिमुखा एवं मन्त्रेषु येऽरुचि ॥८३॥
पक्षत्रये परिक्लान्ता वदंतीत्थं मुनीश्वराः । पूर्वोक्तमंत्रे देवाद् रि संपूज्यादौ ततः परम् ॥८४॥
समारभेत्तुराघवस्य श्रेष्ठां पूजां सविस्तराम् । पद्मस्य कर्णिकायां च ससीतं राघवं न्यसेत् ॥८५॥
अष्टपत्रदलेष्वेव तस्यावरणदेवतः । पूजयेदिति सर्वत्र बुधैस्तु परिकल्पते ॥८६॥
पद्मे सङ्कोचमानस्य प्रकारान्तरमुच्यते । सर्वतोभद्रकमले चाम्ररत्नो घटं न्यसेत् ॥८७॥
जलपूर्णं च तस्यास्ये केतकीपत्रपूरिते । ताम्रपात्रं विस्तृतं च न्यस्य तत्तन्पूरितम् ॥८८॥
यत्र राम सावरणं रामचन्द्रं प्रपूजयेत् । शैली दारुमयो लौही लेप्या लेख्या चर्मकमयी ॥८९॥
मनोमयी मणिमयी प्रतिमाऽष्टविधा स्मृता । सर्वेषु रामयन्त्रेषु मुद्रारूपो नृपोत्तमः ॥९०॥
शङ्करस्य प्रियो ज्ञेयो भक्ताद्या रामपार्षदाः । श्रीरामलिङ्गोद्भवमन एवोच्यते बुधै ॥९१॥
एवं नानाविधा भेदा बहवः संति मा द्विज । श्रीरामदासगेन्द्राणां तेषां संख्या न विद्यते ॥९२॥
अथा भेदाः कियंतोऽत्र तथाऽग्रे विनिवेदिताः । नरैर्बुद्ध्या प्रकर्त्तव्याः पूजार्थं रमापतेः ॥९३॥
हेमजंतूमयं यंत्रं कार्यमासनमुत्तमम् । राजतार्थं महन्श्रेष्ठं रौप्यतन्तुमयं तु वा ॥९४॥


देवताओका आवाहन करें । इसके बाद बाहरके लिलाप पदका, वारियोंमें नलका, घटोंमें सुषावका, तीसरे घटोंमें मैका ॥ ७५ ॥ ७६ ॥ और पीले रङ्गकी भुजाओंमें अङ्गदका आवाहन करें । यदि अष्टदल पीठ शङ्खलाका विधान हो तो तीसरे घटमें अङ्गदका आवाहन करे ॥ ७७ ॥ कृष्णवर्णकी भुजाओंमें विभीषणका, हल्दियोंमें जाम्बवान्‌का और दण्डेऽङ्गुमें मैन्दका आवाहन करे ॥ ७८ ॥ परिधिके भीतरवाली मुद्रामें सीताके साथ-साथ रामका आवाहन करे । मुद्रामें पश्चिम, दक्षिण, उत्तर तथा पूर्वकी ओर क्रमशः लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और हनुमान्‌जीका आवाहन करे । यहाँ पूज्य-पूजक होनेके लिए पूर्वदिशा उत्तम मानी गयी है ॥ ७९ ॥ ८० ॥ सफेद रङ्गकी परिधिमेंपर सुषेणका तथा बाकी सब स्थानोंमें सारे वानरोंका आवाहन करना चाहिए । बाहरकी तीन परिधियोंमें त्रिवेणीका आवाहन करे । दृग्, रुद्र और वापिकाओंको चारों दिक्पालोंके अभिमुख कर दे ॥ ८१ । ८२ ॥ यह विष्टा बतलानेवाले आचार्यने मुझे बतलाया है कि दृग्रूप गदर्भ हर, रुद्र तथा वापिकाओंको रहने मन्मुख करें या पद्मके आकारका बना दे अथवा दिक्पालोंके अभिमुख कर देना चाहिए ॥ ८३ ॥ मुनिगण ऐसा कहते हैं कि इन तीनों पक्षोंमें सर्वश्रेष्ठ पक्ष यह है कि पूर्वोक्त भद्रमें देवना आदिकोंकी पूजा करके रामचन्द्रजीका विस्तृत पूजन प्रारम्भ करे। पद्मकी कर्णिकामें सीताके सहित रामचन्द्रजीका ध्यान करे । आठ दलवाले कमलोंमें उनके आवरण-देवताओंका पूजन करना चाहिए। पण्डितोंका कथन है कि यह नियम सर्वत्रके लिए है ॥ ८४-८६ ॥ यदि कमलमें कोई सङ्कोच दोष हो उसके लिए प्रकारान्तर बतलाते हैं सर्वतोभद्रके कमलमें आम्रकी शाखायुक्त घट स्थापन करे ॥ ८७ ॥ केतकीके पत्रसे भरे हुए कलशके मुंहपर शाखालोंसे भरा एक बड़ा सा ताम्वेका बर्तन रक्खे । जिसके सङ्कोच आवरणदेवताके साथ श्रीरामचन्द्रजीकी पूजा करे। हर एक भद्रमें पत्थरकी, लकड़ी, लोहेकी, चूने ईंटकी, बालूकी, रङ्गसे रेखापर बनायी हुई, मनसे कल्पित अथवा मणिमयी इन आठ प्रकारोंमें जो बचे, उसकी प्रतिमा कराकर श्रीरामका पूजन करना चाहिए ॥ ८८ ॥ ८९ ॥ ९० ॥ शिवजी पूजक हैं और अङ्गदादि रामजीके पार्षद हैं। इसलिये विद्वान् लोग इसे श्रीरामलिङ्गोद्भव कहते हैं ॥ ९१॥ हे द्विज ! इस तरह श्रीरामचन्द्रके बहुतसे भेद हैं। जिसकी कोई संख्या ही नहीं है ॥ ९२॥ यह मैंने उनमेंसे कुछ अंश बतलाये हैं। लोगोंको उचित है कि रामकी पूजाके लिए बुद्धि