भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 627

सर्गः ५ ] मनोहरकाण्डम् ५११


प्रत्यहं लक्षलिङ्गानि कृत्वा पत्न्या युतोऽर्चयेत् । अहोत्तरसहस्रैश्च लिङ्गैर्यन्त्रद्वयङ्गतम् ॥११२॥
तच्छत्रोत्तररासनं ज्ञेयं महाप्रीतिविवर्द्धनम् । तन्मध्यगतकमले चैकं लिङ्गं निवेश्य च ॥११३॥
षोडशैरुपचारैस्तत्पूजय च रघूत्तमः । हेममुद्रां दक्षिणार्थं दत्त्वा सम्पूज्य भूसुरम् ॥११४॥
तस्मै लिङ्ग मासनं चददौ प्रत्येकमादरात् । एवं स कोटिलिङ्गानि त्रयस्त्रिंशद्दिनेददौ ॥११५॥
एवं व्रतं श्रावणे हि प्रतिवर्षेऽकरोद्विभुः । दिव्यैराभरणैर्वस्त्रैर्द्विजा रामादृतैंर्ययुः ॥११६॥
हेमतन्तुसमुद्भूतान्यकरोदामनानि सः । उद्यापनं च हवनं चकार रघुनंदनः ॥११७॥

विष्णुदास उवाच
महोत्तरसहस्त्रेणल्लिङ्गतोमदमीरितम् । कथं कार्यं वस्व मेश निस्तराद्वक्तुमर्हसि ॥११८॥
हेमतन्तुसमुद्भूतमकरोदामनं विभुः । स ईमान्यपि लिंगानि चाकरोच वराणि हि ॥११९॥
दिव्यैराभरणैर्वस्त्रैःकोटिश द्विजर्चनम् अशक्तौ तद्व्रतं सिद्धयेत्कथं तद्वक्तुमर्हसि ॥१२०॥

श्रीरामदास उवाच
शक्तौ च पट्टकूलस्य कम्बलस्याथवा नरैः । कार्यं तदथवा वस्त्रं नतुभिश्र प्रकारयेत् ॥१२१॥
लेख्यं वस्त्रेऽथवा श्लक्ष्णेषु पत्रादिष्वस्थले अशक्तौ रजतान्येव लिंगानि ताम्रजानि च ॥१२२॥
द्विधा पारदभूतानि स्फाटिकान्योपलानि वा । दारुजानि चन्दनैर्वा गोमयेन मृदाऽपि वा ॥१२३॥
कृत्वा लिंगानि पूज्यानि स्वशक्त्या पूजयेद्विजान् । इदानीं लिंगतोमद्राचनां ते वदाम्यहम् ॥१२४॥
तिर्यगूर्ध्वं रकारेखा ज्ञे शनेष्टद्दत्त स्मृताः तासां पदानामेकेन पूर्णमण्डल्य भवेदह ॥१२५॥
पीताः परिधयः कार्या षट्पदान्तेऽत्र सर्वतः । युगेदुमग्निमानेषु लिङ्गानि रचयेद्धिया ॥१२६॥
चतुष्कोणेषु शशिनस्त्रिपटैः परिकल्पयेत् । तदग्र शृङ्खला पञ्चपादैः कार्या च सर्वतः ॥१२७॥


तुम्हारे आगे कह रहा हूँ, सुनो ॥१०८।१०९।११०॥ गुरु वसिष्ठके आज्ञानुसार रामचन्द्रजी प्रत्येक श्रावणमास-में चौवालिस टक सुवर्णके प्रतिदिन एक-एक लाख शिवलिंग बनाकर अपनी स्त्रीके साथ उनका पूजन करते थे। अहोत्तरसहस्रालङ्गारमक जो मन्त्र है वह उत्तम माना जाता है। वही श्रीशिवजीका प्रीतिवर्द्धक मन्त्र है। उसके मध्य विद्यमान कमलमें एक लिग रखकर वे उसका षोडशोपचारसे पूजन करते और दक्षिणाके निमित्त ब्राह्मणोंको सुवर्णमयी मुद्राका दान दिया करते थे। वह लिंग तथा आसन भी उन्ही ब्राह्मणोंको मिला करता था। इस तरह श्रीरामचन्द्रजी तैंतीस दिनोंमें एक करोड़ शिवलिंग बनवाकर दान दिया करते थे ॥१११-११५॥ वे सर्वव्यापक भगवान् प्रतिवर्ष श्रावणमासमें इस व्रतका पालन करते थे। उसी समय त्रिविध प्रकारके दिव्य आभरण पावाकर रामराज्यके ब्राह्मण मुदाश्रित होते थे ॥११६॥ उस समय रामचन्द्रजीने सुवर्ण-तन्तुका ही आसन बनवाया और उद्यापन तथा हवन कराया ॥११७॥ विष्णुदासने कहा—अभी आपने जो दो महोत्तरसहस्र लिंगतोभद्र बतलाया है, उसके क्षेत्र किस प्रकार करने चाहिए सो विस्तारपूर्वक आप हमें बतलाइये । ११८॥ मैने माना कि रामचन्द्रजी सुवर्णतन्तुका आसन और सुवर्णके लिंग बनवाते थे। दिव्य वस्त्रा और आभूषणोसे ब्राह्मणोंकी पूजा करते थे। लेकिन जिसमें उतनी सामर्थ्य नहीं है, उसका व्रत किस प्रकार सिद्ध हो, यह भी हमे बतलाइये ॥११९ । १२० । श्रीरामदासने कहा कि यदि न सामर्थ्य हो तो रेशमके या कम्बलके भूतसे अथवा साधारण कपड़ेपर आसनकी धुलाई करा न ॥१२१ । अथवा पत्र आदिपर रङ्गसे लिखवा ल। यदि सुवर्णमय लिंग बनवानेकी शक्ति न हो तो चांदी, तांबा, पारा स्फटिकपांग, लकड़ी, चन्दन, गोबर अथवा मिट्टोका लिंग बनाकर पूजन करे। जितनी अपनी सामर्थ्य हो, उतने ही ब्राह्मणोका पूजन करे। अब मै तुम्हे लिंगतोभद्रकी रचनाका प्रकार बतला रहा हूँ ॥ १२२-१२४॥ ईश और सह्ला २१८ रेखाएँ लाल रङ्गसे खींचे इस प्रकार रेखा खींचनेसे पूर्णांक २१८ कोष्ठक बन जायेंगे ॥१२५॥ इस मण्डल में छह पाद-वाली पीले रङ्गको परिधियॉ बनेगी। उसमे अपनी बुद्धिमे चौदह लिंग आदि बनावे ॥१२६॥ उसके चारों कोणोंमें तीन-तीन करके चन्द्रमा बनावे। उसके आगे चारों तरफ पाँच पादकी शृङ्खलायें बनायी जावेंगी