श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 658, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें६७२ आनन्दरामायणे [सर्गः ६
मारुतेः शब्दसंस्पर्शश्रवणात् व्यंघ्रिणा नराः । षण्ढका एव जायन्ते न तेभ्योऽन्यत्सुपौरुषम् ॥२०७॥ अतस्तेषामशक्तानां वीर्यं हीणंतदा द्विज । भवन्ति दुहितर एवं कश्चित्पुत्रः प्रजायते ॥२०८॥ आधिक्ये रजसः कन्या शुक्राधिक्ये सुतो भवेत् । नपुंसकः समत्वेन यथेच्छा वाऽथेश्वरेशे ॥२०९॥ अन्यत्ते कारणं वच्मि न भवन्ति सुता यतः । कारणं शृणु तस्येदं विष्णुदास द्विजोत्तम ॥२१०॥ तेषु देशेषु नार्यश्च निजराज्यमदेन हि । रतिकालोऽधः पुरुषं कृत्वा क्रीडां भजन्ति ताः ॥२११॥ न स्त्रीणां रतिकाल ताः पृष्ठं भूमिसपृशन्ति हि अतएव रतिकाल शुक्रं तु स्रवते वहिः ॥२१२॥ सूक्ष्मच्छिद्रं तथा गर्भस्थाने तन्नैव गच्छति । नासानायनकर्णानां द्वे द्वे रन्ध्रे प्रकीर्त्तिते ॥२१३॥ मेहनपादचवक्त्राणामेकैकं रन्ध्रमुच्यते । दशमं मस्तक प्रोक्तं रंध्राणीति नृणां विदुः ॥२१४॥ स्त्रीणां त्रीण्यधिकानि स्युः स्तनयोर्गर्भवर्त्मनः । मुचिक अग्रमान्येव तानि छिद्राणि सन्ति हि ॥२१५॥ गर्भच्छिद्रं रतिकाल किंचिद्विकसितं द्विज । भुन्त्रा मार्ग तु वीर्यस्य ददाति पुरुषस्य च ॥२१६॥ तन्मार्गेण गतं वीर्यं चेत् सम्यक् पुरुषस्य च । गर्भस्थाने तदा पुत्रो जायते नात्र संशयः ॥२१७। स्तन्यं प्रविष्टं वीर्यं च तदा कन्या प्रजायते । रजमधिक्येन जानीह्येवं विनिश्चयम् ॥२१८। तस्माद्यदाऽधः शेते वै तद्देशेषु नरोत्तमः । रतिकाल तस्य वीर्यमूर्ध्वं गच्छति नैव तत् ॥२१९॥ यदि दैववशात्किंचिद्रनं सोर्ध्वमार्गगः । तदा दैववशात्पुत्रो जायते सोऽपि पङ्गवत् ॥२२०॥ अतएव हि तद्देशे बहूकन्या भवन्ति हि । एवं ते कारणं प्रोक्तं कन्योत्पत्तेर्द्विजोत्तम ॥२२१॥ एवं सर्वेषु देशेषु चेन्नार्या अधिकं बलम् । अस्ति तर्हि भवेत्कन्या पुत्रः पुरुषसारतः ॥२२२।
॥ २०३-२०५॥ वहाँपर विशेष करके अपाहिजोकी ही उत्पत्ति होती है, पुरुष तो बहुत ही कम होते हैं। हनुमान्जीकी गर्जनासे मिली वायुके संस्पर्शसे उस गन्धर्व आश्रमवाले राज्यके लोग भी प्रायः षंढक (नपुंसक होते हैं। इसलिए वहाँके पुरुषांका वार्य कमज़ोर होता है और अधिकांश कन्याय ही उत्पन्न होती हैं, पुत्र तो शायद ही कभी कहीं हो जाता हो ॥ २०६॥ ०॥ २०७ ॥ जब कि स्त्रीके रजकी अधिकता होती है तो कन्या और पुरुषके वीर्यकी अधिकता होती है, तब पुत्र होता है। यदि पुरुषका वीर्य और स्त्रीका रज ये दोनों बराबर हो जाते हैं, तब नपुंसक उत्पन्न होता है । रज वार्याके सिवाय सबसे मुख्य बात तो यह है कि परमेश्वरकी जैसी इच्छा होती है, वही होता है ॥ २०६॥ हे द्विजोत्तम विष्णदास ! यहाँ विशेष करके कन्याओकि उत्पन्न होनेका एक कारण और भी है उसे सुनो ॥ २१० ॥ उस देशकी स्त्रियाँ अपने राज्यमदसे मत्तवाली हो पुरुषको नीचे सुला तथा स्वयं ऊपर लटकर रति करती हैं रतिकालके समय वे अपनी पीठको जमीनमें नहीं लगाने देतीं। इसीलिए पुरुषका वीर्य बाहर ही रह जाता है। गर्भाके सूक्ष्म छिद्रतक वह नहीं पहुंच पाता। पुरुषके नाक, नेत्र और कान इनमें दो-दो छिद्र रहते हैं ॥ २११-२१३ । लिंग, गुदा तथा मुखम एक-एक छिद्र रहता है ये सब मिलाकर नौ हुए और दसवाँ छिद्र ब्रह्मारन्ध्र होता है। ऐसा लोगोंने बतलाया है ॥ २१४। किन्तु स्त्रियोंके तीन छिद्र अधिक होते हैं। दो छिद्र दोनों स्तनोंमें और एक गर्भके रास्तेमें। गर्भके मार्गवाला छिद्र सूईकी नोकके समान बारीक होता है ॥ २१५ ॥ किन्तु रतिकालमे गर्भवाला छिद्र कुछ चौड़ा होकर पुरुषके वीर्यको भीतर जानेके लिये रास्ता दे देता है ॥ २१६ ॥ उस मार्गसे गया हुआ वीर्य यदि अच्छी तरह अपने स्थान तक पहुंच जाता है, तब पुत्रकी उत्पत्ति होती है। इसमें कोई संशय नहीं है। यदि उस समय गर्भाशयमे कम वीर्य जाता है तो कन्याकी उत्पत्ति हुआ करती है। क्योंकि ऐसी दशामे स्त्रीका रज अधिक और पुरुषका वार्य कम पड़ जाता है ॥ २१७ ॥ २१८ ॥ इसास जब वहावाले पुरुष नीचे लेटते हैं, तब उनका वीर्य गर्भाशयके छिद्र तक नहीं पहुंच पाता। यदि दैववश कभी थोड़ा-सा वीर्य उछलकर ऊपर स्त्रीके गर्भाशय तक पहुंच भी जाता है तब नपुंसक उत्पन्न होता है । २१९। २२०॥ इसी कारण उस देशमे अधिकांश कन्याय ही होती हैं। हे द्विजोत्तम ! मैंने इस प्रकार तुम्हें वहाँ विशेष कन्याओके उत्पन्न होनेका कारण बतलाया ॥ २२१ ॥ यह प्राय सब देशोमे देखा जाता है कि जिस जगह स्त्री बलवती होती है तो कन्या