श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 673, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ८ ] मनोहरकाण्डम् ६५७
भारतं वेदतुल्यं स्यादर्थादौऽधिकमुच्यते । तत्रापि भगवद्गीता विष्णोर्नामसहस्रकम् ॥५८॥ दशाधिकफलं प्रोक्तं भारतादपि नरैः । श्रोताऽर्द्धं फलंमाप्नोति भक्तितः शृणुयात्तु यः ॥५९॥ भारतं त्वितिहासञ्च रामायणसमुद्भवम् । यद्वेदात्पुण्यं तज्ज्ञेयं रामायणस्य च ॥६०॥ पाठात्तदर्द्धं श्रवणे व्याख्यानात्तु दशाधिकम् । वाल्मीकिना कृतं यच्च शतकोटिप्रविस्तरम् ॥६१॥ तत्सर्वेषामादिभूतं महामंगलकारकम् । रामायणादेव नाना सन्ति रामायणानि हि ॥६२॥ शेषभूतं चतुर्विंशत्सहस्रं प्रथमं स्मृतम् । तथा च योग वासिष्ठमध्यात्मञ्च तथामृतम् ॥६३॥ वायुपुत्रकृतं वापि नारदोक्तं तथा पुनः । लघुरामायणं चैव बृहद्रामायणं तथा ॥६४॥ अगस्त्योक्तं महाश्रेष्ठं साररामायणं तथा । देहरामायणं वापि वृत्तरामायणं पुनः ॥६५॥ मङ्गल रामायणं रम्यं भारद्वाजं तथैव च । शिवरामायणं कौञ्चं भारतस्य च जैमिनेः ॥६६॥ आत्मधर्मं श्वेतकेतुऋषेस्तथैव जटायुषः ॥६७॥ रवेः पुलस्तेर्देव्याश्च गुहस्य मङ्गलं तथा । गाधिनः सुतीक्ष्णस्य च सुग्रीव च विभीषणम् ॥६८॥ तथ ऽऽनन्दरामायणमेतन्मङ्गलदायकम् । एवं सहस्रशः सन्ति श्रीरामचरितानि हि ॥६९॥ कः समर्थोऽस्ति तेषां हि संख्यां वक्तुं सविस्तराम् वाल्मीकिनिर्मितेभ्यः विभक्तानि पृथक् पृथक् ॥७०॥ सर्वेष्वप्यानंदसंज्ञं वरिष्ठं प्रोच्यते त्विदम् अस्य पाठेन यत्पुण्यं तन्ते शिष्य वदाम्यहम् ॥७१॥ शतकोटिमितं श्रुत्वा यत्फलं लभ्यते नरैः । तस्यार्धं तद्वदं हि ज्ञेयं शिष्य शुभप्रदम् ॥७२॥ श्रवणाद्द्विगुणं पाठे व्याख्यानात्तु दशाधिकम् । तस्मादेतन्महाऽऽनंदमत श्रव्यं नरोत्तमैः ॥७३॥ नानेन सदृशं किञ्चित्पूतं नान्ये भविष्यति सर्वेष्वपि च शास्त्रेषु पाञ्चरात्रागमोऽधिकः ॥७४॥
विष्णुपुराणस्य से अष्टादश उपपुराण हुए ! इनका पाठ करनेस पुराणपाठका आधा फल मिलता है ॥ ५४ ॥ ॥ ५५ ॥ ५७ ॥ महाभारत तो साक्षात् वेदके समान है। उसमें कही हुई भगवद्गीता और विष्णुसहस्रनाम ये दोनों महाभारतसे भी दशगुना अधिक फलद हैं। जो श्रोता भक्तिपूर्वक उन्हें सुनता है, वह आधा फल पाता है। महाभारत रामायण ही निकला हुआ इतिहास है। वेदके पाठसे जो पुण्य होता है, वही फल रामायणके पाठसे है । ५८-६० । सुननेसे आधा फल और व्याख्या करनेसे दसगुना अधिक फल प्राप्त होता है। श्री करांग विनिर्मित शतकोटि प्रविस्तर जिस रामायणकी रचना की है, वह सब रामायणोंका मूल और महा मङ्गलदायक है। उसी रामायण से ही विविध प्रकारकी रामायणोंकी रचना हुई है ॥ ६१ ॥ उसीरा परिशिष्ट अङ्गरूप बना और शेषके समान रूप कहेतो हुई चौबीस हजार श्लोकोंवाली वाल्मीकिरामायण, योगवासिष्ठ, अध्यात्मरामायण, वायुपुत्र (हनुमान्जी) की रामायण, नारदरामायण, लघुरामायण, बृहद्रामायण, अगस्त्यजीका बनाये महाश्रेष्ठ साररामायण, देहरामायण, वृत्तरामायण, भारद्वाजरामायण, शिवरामायण, क्रौञ्चरामायण, भरतरामायण, जैमिनिरामायण आदि बहुतसी रामायणें हैं ॥ ६२-६६ ॥ इनके अतिरिक्त आत्मधर्मी, जटायुकी, श्वेतकेतु ऋषिकी, पुलस्त्यकी, देवीजीकी, विश्वामित्रकी, सुतीक्ष्णकी, सुग्रीवकी, विभीषणकी और यह मङ्गलमय आनन्दरामायण, इस तरह रामचरित्रका वर्णन करनेवाली हजारों रामायणें बनी हैं ॥ ६७-६९ ॥ उन सबकी सविस्तार संख्या बतलानेमें कोई भी समर्थ नहीं हो सकता । वाल्मीकिजीके सौ करोड़ श्लोकात्मक रामायणसे ही इन सबका निर्माण हुआ है ॥ ७० ॥ किन्तु ऊपर गिनाई हुई सब रामायणोंमें यह आनन्दरामायण ही श्रेष्ठ है। ऐसा लोगोंने कहा है। इसके पढ़नेसे क्या पुण्य होता है, सो हे शिष्य ! मैं तुमको इसका माहात्म्य बतला रहा हूँ ॥ ७१ ॥ पूर्वोक्त शतकोटिमहात्मक वाल्मीकिरामायणके सुननेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उसका आधा पुण्य इस आनन्दरामायणके पाठसे होता है। इसको सुननेसे दुगुना और व्याख्या करनेसे दसगुना पुण्य होता है। इस कारण लोगोंको चाहिए कि इस आनन्दरामायणका श्रवण करें ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ इसके सदृश पावन कोई अन्य न अबतक हुआ है और न