श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १ |
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गच्छामि रावणादीनां वधार्थं लक्ष्मणेन च । अयोध्यायां वसञ् त्वं कौसल्यां पार्थिवं भज ॥५५॥ तद्भार्यावचनं श्रुत्वा प्रणिपत्य रघूत्तमम् । उवाच मधुरं वाक्यं वनं मां त्वं नय प्रभो ॥५६॥ कारणान्यत्र त्रीणि मन्ति तानि वदाम्यहम् । मन्वन्वय प्रयाणं मे दण्डके हि त्वया सह ॥५७॥ वनप्रवासे मामाह भर्त्रा च मन्वयाद्विजः । बान्धवे कन्यका मे दृष्टा कश्चिद्द्विजप्रणीः ॥५८॥ अन्यन्मन्वन्तरं पूर्वं सुरेन्द्रापि मयाऽदितम् । यदा चार्त्तारिकं प्राप्तः यज्जितुं त्वं समागतः ॥५९॥ चतुर्दश वत्सरानि मुनिवृत्त्यनुवर्तिनी । त्रिषष्टिव्याख्यावहेह धनुः सज्जं करोम्यहम् ॥६०॥ मन्यन्य कुरु मद्वाक्यं प्रयणाद्दण्डक मया । अन्यच्छ्रुत मया पूर्वं रामायणमनुत्तमम् ॥६१॥ तत्र मीतां विना रामो न गतोऽस्ति हि दण्डकम् तस्मात्त्वं मां गृहीत्वा दण्डकं नेतुमर्हसि ॥६२॥ तन्सीतावचनं श्रुत्वा दर्शयित्वापि रघूद्वहान् । विहस्य राघवः अत्मान् समालिंग्य विदेहजाम् ॥६३॥ अथ राजा दशरथः श्रीरामस्याभिषेचनम् यौवराज्यपदे कत्तुमुद्युक्तः प्राह वै गुरुम् ॥६४॥ यौवराज्यपदे राममभिषेकं त्वमाहर । तद्वाजवचनं श्रुत्वा गुरुर्दशरथ नृपम् ॥६५॥ कौसल्यागृहमापीय बोधयामास वै रहः । राजन शृणु त्वं कौसल्यासुमित्रं शृणुतं त्रियमे ॥६६॥ रावणस्य वधार्थं हि रामः श्री दारक वनम् । गमिष्यति लक्ष्मणेन सीतया कैकयीवशात् ॥६७॥ तस्मात्प्रमत्रमवनूपौ सभागनाभिषेकितुम् । कारयस्व सुमन्त्रेण समाहूय नृपादिकात् ॥६८॥ श्रीरामविरहाद्द्वाजन् ब्राह्मणस्यापि शापतः । अचिरादेव स्वर्लोकं त्वं यास्यसि पार्थिव ॥६९॥ कौसल्येथ रामराज्योत्सवं पश्यतु वै पुनः । स्वर्गस्थाद्विमानस्थस्त्वं पश्यसि महोत्शवम् ॥२०॥ दुर्लंघ्या भाविनी रेखा ब्रह्मादीना सुरोत्तम । इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं तेन राजा सभां ययौ ॥२१॥ रामराज्याभिषेकाय समारब्धंकरेन्मुदा । दूतात्कारयामास नृपान् दशरथस्तदा ॥२२॥
पिताजी मेरा राज्याभिषेक करना चाहते हैं, परन्तु मैं उनम विघ्न खड़ा करके रावण आदिका नाशके लिए लक्ष्मणके साथ दण्डकारण्य जानेको तैयार हूँ। तुम यहाँ रहकर माता कौशल्याका और महाराजकी सेवा करना ॥ ५५ ॥ रामका यह वचन सुनकर सीताजीने उनके चरण पर गिर पडी और वह मधुर वचन बोली—हे प्रभो ! मुझे भा अपने साथ वनको ले चलिए । ५६ ॥ इसमें तीन कारण हैं। उन्हें मैं बताती हूँ। एक तो यह कि बाल्यकालमें मेरे हाथको देखकर एक ब्राह्मणने कहा था कि तुम अपने पतिके साथ वनवास करोगी। सो आपका साथ वनमें जानेसे उस ब्राह्मणका व्रीत सत्य हो जायगा ॥ ५७-५८॥ दूसरा कारण यह है कि जब आप सभाके बीच स्वयंवरके समय धनुष चढाने चले थे, तब मैंने देवताओंसे प्रार्थना की थी—हे देवताओं ! यदि राम धनुष चढा लें तो चौदह वर्ष तक मुनिवृत्ति धारण करके वनमें विचरण करूँगी ॥ ६० ? ६० ॥ अतएव आप मुझे वनमें ले जाकर मेरी प्रार्थनाको भी सच्चा बनाएँ । तीसरा कारण यह है कि मैंने सर्वोत्तम रामायण महाकाव्य में सुना है कि सीताके बिना राम अबतक कभी वनमें नहीं गये । सो आपको मुझे दण्डकारण्यम साथ ले चलना चाहिये ॥ ६१ । ६२ ॥ सीताके वचन सुनकर रामने उनको आलिङ्गन करके "तथास्तु" कहा ॥ ६३ । इधर राजा दशरथने रामका युवराजपदपर अभिषेक करनेका निश्चय करके गुरु वशिष्ठसे कहा कि आप श्रीरामका युव राजपदपर अभिषेक करें। इस बातको सुनकर वे राज दशरथको कौशल्याके भवनमें ले आये और एकान्तमें कहने लगे— । ६४-६६ ॥ हे राजन् ! आप तथा यह कौशल्या और सुमित्रा मेरे कथनको सुनें। राम कैकेयीके वशस सीता तथा लक्ष्मणके साथ लेकर रावणको मारनेके लिए कल ही दण्डकवन चले जायँगे ॥६७॥ इसलिए प्रजाजनकी तरह आप चुपचाप रामका अभिषेक करनेके लिए सुमन्त्रको कहकर सब सामग्री मंगवाइए और समस्त राजाओंको निमन्त्रित कीजिए ॥ ६८ ॥ हे पार्थिव ! श्रीरामके विरह तथा ब्राह्मणके शापसे आप शीघ्र स्वर्ग सिधारेंगे । ६९ ॥ बादमें कौशल्या रामके राज्यात्सवको देखेंगी और स्वर्गीय विमानमें बैठकर आप अन्तरिक्षसे वह उत्सव देखेंगे ॥ २० ॥ हे नरोत्तम ! भविष्यकी रेखा ब्रह्मादिकोंके लिए भी दुल्लङ्घीय होती है। गुरु वशिष्ठका यह वचन