श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 727, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७१० | आनन्दरामायणे | [ सर्ग १३ |
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देवेन्द्रप्रमुखं प्रशमयन्तं देदीप्यमानं रुचा ।
सुग्रीवादिममस्तवानरयुतं सुव्यक्ततत्त्वप्रियं
सक्ताहारणलोचनं पवनजं पीताम्बरालंकृतम् ॥ १ ॥
उद्यन्मार्तण्डकोटिकरुचियुतं चारुवीरासनस्थं
मौञ्जीयज्ञोपवीताभरणरुचिशिखं शोभितं कुण्डलांकम् ।
भक्तानामभीष्टदं तं प्रणतमुनिजनं वेदनादप्रमोदं
ध्यायेदेवंविधेयः प्लवगकुलपतिं गोष्पदीभूतवार्धिम् ॥ २ ॥
वज्रांगं पिंगकेशाख्यं स्वर्णकुण्डलमंडितम् । निगदमुपमगम्यं पारावारपराक्रमम् ॥ ३ ॥
स्फटिकामं स्वर्णकांतिं द्विभुजं च कृतांजलिम् । कुण्डलद्वयमंशोभि सुत्नांभोजं हरिं भजे ॥ ४ ॥
सव्यहस्ते गदायुक्तं वामहस्ते कमण्डलुम् । उद्यद्दक्षिणदोर्दण्डं हनुमंतं विचिंतयेत् ॥ ५ ॥
अथ मंत्रः
ॐ नमो हनुमते शोभिताननाय यशोऽलंकृताय अञ्जनीगर्भसम्भूताय रामलक्ष्मणानन्दाय कपिसैन्यप्रकाशनाय पर्वतोत्पाटनाय सुग्रीवसाहाय्यकारणायोच्चाटनाय कुमारब्रह्मचर्यगंभीरशब्दोदाय ह्रीं सर्वदुष्टग्रहनिवारणाय स्वाहा । ॐ नमो हनुमते एहि एहि एहि सर्वग्रहभूतानां शाकिनीडाकिनीनां विषमदुष्टानां सर्वेषामाकर्षयाकर्षय मर्दय मर्दय छेदय छेदय मन्मथान्मारय मारय शोषय शोषय प्रज्वल प्रज्वल भूतण्डलात्पिशाचमण्डलाद्विद्रावय भूतज्वरप्रेतज्वरचातुर्थिकज्वरब्रह्मराक्षसपिशाचछेदनक्रियाविष्णुज्वरमहेश्वरज्वरान् छिंधि छिंधि भिंधि भिंधि अक्षितले त्रिकोणयन्त्ररे क्षितितले गुल्मतले विद्रुतले नगरराक्षसकुलचवलनागदुलवेधनिंविषं झट ने प्रविशि ॐ ह्रीं फट् घे घे स्वाहा । ॐ नमो हनुमते पवनपुत्र वैश्वानरमुखवापहद्विहनुमते ॐ आम्राफुरे स्वाहा । स्वगृहे द्वारे पठूकं तिष्ठ तिष्ठति तत्र रोगभयं राजकुलभयं नास्ति तस्योच्चारणमात्रेण सर्वे ज्वरा नश्यन्ति । ॐ हां ह्रीं हूं फट् घे घे स्वाहा ।
कालके सूर्य सरीखा जिनका तेजस्वी स्वरूप है, जो राक्षसोंका अभिमान दूर करनेमें समर्थ हैं और जो देवताओंमें एक प्रमुख देवता माने उन हैं, जिनका प्रसन्न यश तीनों लोकमें फैला हुआ है । जो अपनी असाधारण शोभासे देदीप्यमान हो रहे हैं। सुग्रीव आदि बड़े बड़े वानर जिनके साथ हैं। जो सुव्यक्त तत्त्वके प्रेमी हैं। जिनकी आंख अतिशय लाल लाल है। पीले वस्त्रोंसे अलंकृत उस हनुमान्जीका मैं ध्यान करता हूँ ॥ १ ॥
उदय होते हुए करोड़ों सूर्यके समान जिनका प्रकाश है। जो सुन्दर वीरासनसे बैठे हुए हैं। जिनके शरीरमें मौञ्जी यज्ञोपवीत आदि पड़े हैं और उनकी किरणोंसे जो और भी शोभासम्पन्न दीख रहे हैं। जिनके कानोंमें पड़े हुए कुण्डल अपना मनोहर शोभा दिखा रहे हैं। भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाले, मुनिजनान वन्दित, वेदके मंत्रोंकी ऋचा सुनकर प्रसन्न होनेवाले, वानरकुलके अग्रणी और समुद्रको गौके खुर भर जलवाला बना देनेवाले हनुमान्जीका ध्यान करना चाहिए ॥ २ ॥
वज्रके समान कठोर जिनका शरीर है, मस्तकपर पीला केश सुशोभित हो रहा है और कानोंमें सुवर्णके कुण्डल पड़े हैं, ऐसे हनुमान्जीका मैं अतिशय आग्रहके साथ ध्यान करता हूँ। क्योंकि उनके पराक्रमरूपा समुद्रकी कोई थाह नहीं है ॥ ३ ॥
स्फटिकमणिके समान अथवा सुवर्ण सरीखी जिनकी कान्ति है, दो भुजायें हैं, जो हाथ जोड़े खड़े हैं, दोनों कानोंमें पड़े हुए सुवर्णके कुण्डल सुशोभित हो रहे हैं ऐसे कमलके समान सुन्दर मुखवाले हनुमान्जीका मैं ध्यान करता हूँ ॥ ४ ॥
जिनको दाहिनी भुजामें गदा है, बाय हाथमें कमण्डलु है और जिनकी दाहिनी भुजा कुछ ऊपर उठी हुई है, ऐसे हनुमान्जीका ध्यान करना चाहिये ॥ ५ ॥
अथ मन्त्रः—"ॐ नमो हनुमते" यहाँसे लेकर 'हा, हा, हू, फट् घे घे स्वाहा" यहाँ तक हनुमत्कवचमन्त्र कहा गया है।