श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 87, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ८ ] सारकाण्डम् ७१
तिष्ठन्त्यग्रे मतंगादिमुनीनां परिचारिकाः । शबरीदर्शनार्थं त्वं तत्र याहि रघूत्तम ॥ १६०॥
कथयिष्यति सा सीताशुद्धिं ते रघुनंदन । इत्युक्त्वा राघवं नत्वा स्तुत्वा स्वर्गं ययौ मुदा ॥ १६१॥
ततो रामो लक्ष्मणेन शबरीसंनिधिं ययौ । साऽपि संपूज्य श्रीरामं विकैशैर्वनसंभवैः ॥१६२।
चितामारोढुमुद्युक्ता राघवं प्राह हर्षिता । ऋष्यमूकगिरावग्रे सुग्रीवो मंत्रिभिः सह ॥१६३।
वर्तते तस्य सख्येन सीताशुद्धिं लभिष्यसि । गच्छ राम इतस्त्वमद्य पंपानाम सरोवरम् ॥१६४।
तत्तटाके तु वृक्षाणां फलानि विविधानि च । भक्षस्व त्वं जलं पीत्वा याहि सुग्रीवसंनिधिम् ॥१६५॥
इत्युक्त्वा शबरी रामं नत्वा वह्निं विवेश सा । रामसंदर्शनान्मुक्तिं प्राप्ता वैकुण्ठमाययौ ॥ १६६।
ततो रामः शनैर्भ्रात्रा ययौ पंपासरोवरम् । फलानि भक्षयामास पीत्वा तज्जलमुत्तमम् ॥ १६७॥
ततः शनैर्ययौ मार्गे ऋष्यमूकाचलं प्रति । पश्यन्वनानि सर्वत्र चिंतयामास जानकीम् ॥१६८।
एवं गिरिंद्रजे प्रोक्तमारण्यं चरितं मया । श्रीरामस्य ससीतस्य लक्ष्मणेन युतस्य च ॥१६९॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे कबन्धवधो नाम सप्तमः सर्ग ॥ ७ ॥
अष्टमः सर्गः
( राम-सुग्रीवमैत्री और बालिवध )
श्रीशिव उवाच
अथ रामो लक्ष्मणेन ऋष्यमूकाचलं प्रति । ययौ धृतधनुर्बाणो नेत्रे सर्वत्र चालयन् ॥ १ ॥
ऋष्यमूकगिरेः पार्श्वं गच्छन्तौ रामलक्ष्मणौ । सुग्रीवेणाथ तौ दृष्टौ ऋष्यमूकस्थितेन हि ॥ २ ॥
सुग्रीवस्तो तदा दृष्ट्वा चतुर्भिर्मंत्रिभिर्वृतः । संमंत्र्य मारुतिं प्राह वालिना प्रेषितावुभौ ॥ ३ ।
शीघ्र ही तेरे हाथ भी गाजन-रोशन भर लम्बे हो जायेंगे । तबसे मैं जो कुछ इन हाथोके बीच आ जाता है, खा लेता हूँ ॥ १५९ । यहाँसे आगे मतङ्ग आदि मुनियोंकी परिचारिकायें रहती हैं । हे रघूत्तम ! आप वहाँ जाकर शबरीसे मिलें । १६० । हे रघुनन्दन ! वह आपको सीताका पता बतायेगी । इतना कहकर उसने रामकी स्तुति की और नमस्कार करके वह सानन्द स्वर्गको चला गया ॥ १६१ ॥ तदनन्तर राम लक्ष्मणको लेकर शबरीके पास गये । शबरीने वनके अच्छे-अच्छे पुष्पों तथा फलोंसे उनका पूजन-सत्कार किया ॥१६२॥ बादमें चितारोहण करते समय हर्षपूर्वक वह रामसे बोली कि आगे ऋष्यमूक पर्वतके शिखरपर मन्त्रियोंके साथ सुग्रीव रहता है । १६३ ॥ उसकी मित्रता प्राप्त करनेसे आपको सीताका पता मिल जायगा । हे राम ! आप यहाँसे चलकर पंपासरोवर जायें ॥ १६४ । उसके किनारेपर लगे हुए वृक्षोंके विविध फल खा तथा जलपान करके आप सुग्रीवके पास जाइएगा ॥ १६५ ॥ इतना कहकर शबरीने रामको प्रणाम किया और अग्निमें प्रवेश कर गयी । इस प्रकार रामके दर्शनमात्रसे मुक्त होकर वह वैकुण्ठधाम सिधारी । १६६॥ तदनन्तर राम भाई लक्ष्मणके साथ पंपासरोवर गये । वहाँके सुन्दर फल खाकर सरोवरका निर्मल जल पिया ॥ १६७ ॥ पश्चात् धीरे-धीरे ऋष्यमूक पर्वतकी ओर चले । रास्तेमें चारों ओर हरे-भरे वनोंकी शोभा देखकर राम बारम्बार जानकीका स्मरण करने लगे, १६८। हे गिरीन्द्रजे ! यह मैने तुमको सीता लक्ष्मण तथा श्रीरामका किया हुआ चरित्र कह सुनाया । १६९ ॥ इति शतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥
श्रीशिवजी बोले—हे प्रिये ! इस तरह राम हाथमें धनुष बाण लिये और नेत्रोंसे चारों ओर देखते हुए लक्ष्मणके साथ ऋष्यमूक पर्वतके पास पहुँचे । १ ॥ वहाँ शिखरपर बैठे सुग्रीवने पर्वतके पास आते हुए राम-लक्ष्मणको देख लिया । २ ॥ उन्हें देखकर सुग्रीवने अपने चारों मन्त्रियोंको बुलवाया और उनसे मन्त्रणा