श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 89, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ८] सारकाण्डम् ७३
निश्चितं मनसा वाली दुर्मदेन हतस्त्विति । एतस्मिन्नन्तरे श्रुत्वा किष्किन्धां विपुवेदिताम् ॥१६॥ गुहाद्वारे शिलामेकां निधाय दुर्मदस्य च । यन्मतो मार्गरोधार्थं किष्किन्धामगमं स्वयम् ॥१७॥ मां दृष्ट्वा रिपवः सर्वे वेगाच्चक्रुः पलायनम् । अनिच्छतं मन्त्रिणो मां तद्राज्ये समवेशयन् ॥२०॥ ततो दृष्ट्वा रिपुं वाली दृष्ट्वा मां स्वपदस्थितम् । संताड्य नगरान्मां स बहिर्न्यष्कासयत्तदा ॥२३॥ ततः स सर्वदेशेषु वादयामास दुन्दुभिम् । भूपां सुग्रीवपाता यः स वध्यो भवेदिति ॥२४॥ ततो लोकान्वरित्यज्य ऋष्यमूकं मयाऽऽश्रितः । एकदा दुन्दुभिर्नाम दैत्यो महिषरूपधृक ॥२५॥ युद्धाय वालिनं रात्रौ समाह्वयत वीर्यवान् । ततो वाली समागम्य धृत्वा शृंग करेण तु ॥२६॥ हस्ताभ्यां सन्विभञ्जिच्छित्वात्रोत्थिप्याऽक्षिपद्द्रुति। पतितं तच्छिरो रात्रौ मतङ्गाश्रममात्रतः ॥२७॥ रक्तवृष्टिः पपातोर्व्यामन्तःकोधादथर्षन्दधा। यद्यागतोऽसि मे वालिन् गिरिं शीघ्रं ममापये ॥२८॥ एवं शप्तस्तदारभ्य ऋष्यमूकं न यात्यसौ । प्रतिज्ञां ते करोम्यद्य सीतां चात्र समानये ॥२९॥ यदा नीता रावणेन तदा दृष्टा मयाऽत्र खे । बद्ध्वोत्तरीये क्षिप्तानि पश्य त्वं भूषणानि हि ॥३०॥ इत्युक्त्वा दर्शयामास सुग्रीवो भूषणानि हि । तानि दृष्ट्वाऽब्रवीद्वन्धुं रामस्येव निश्चय वद ॥३१॥ न्याराण्यानि सीतायास्तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणोऽब्रवीत् । न वेद्म्यहं ममस्थानं वेधयन्नुलितानि हि ॥३२॥ वदने यानि दृष्टानि मया नित्यं स्पृदह । ततो रामोऽतिमन्तुष्टो लज्जां सीतायमन्वयत् ॥३३॥ सुग्रीववचनाद्रामः प्रत्ययार्थं तदा क्षणात् । पादांगुष्ठेनाक्षिपत्तद्दुन्दुभेः शिर उत्तमम् ॥३४॥
किन्तु वह बाहर नहीं आया । मैंने जब गुहामें निकलता हुआ रुधिर देखा तब मनमें विचार कर कि दुर्मद दानवने वालीको मार डाला । उसी समय यह सुनकर कि शत्रुने किष्किन्धाको घेर लिया है मैंने गुहाके द्वारपर एक बड़ा भारी शिलाखण्ड रख दिया और निश्चय कर लिया कि अब दुर्मदका मार्ग रुक गया है । वह यत्न करके भी बाहर नहीं निकल सकेगा । तब मैं अपनी किष्किन्धा नगरीमें चला आया ॥१६-२१॥ मुझे देखनेके साथ ही सब शत्रु भाग गये और मेरी इच्छा न रहनेपर भी मन्त्रियोंने मुझे गद्दीपर बैठा दिया ॥२२॥ पश्चात् वाली भी शत्रुको मारकर घर आया और मुझ अपने पदपर बैठा देखा ता मुझको पीटकर उसी समय नगरसे बाहर निकाल दिया । २३॥ साथ ही सब देशोंमें उसने डिण्डोरा पिटवाकर कहला दिया कि जो कोई सुग्रीवको शरण देकर क्षमा करेगा, वह मेरा अपराधी होगा और मार डाला जायगा ॥ २४ ॥ तदनन्तर सब देशोंमें घूमकर मैंने इस ऋष्यमूक गिरिका आश्रय लिया यहाँकी कथा यह है कि एक दिन दुन्दुभि नामक दैत्य भैंसका रूप धरकर रात्रिके समय बालके यहाँ गया और उसको युद्धके लिये ललकारा । तब वह आकर अपने हाथसे उसकी सींग पकड़ लिया और खींचकर उसका शिर धडसे उखाड़लिया पुनरपि दूर फेंक दिया जिससे उसका वह शिर मतङ्ग ऋषिके आश्रममें जा गिरा ॥ २५-२७ ॥ इससे मतङ्गऋषिके ऊपर भी रुधिर गिरा । तब उन्होंने कुपित होकर इस बातपर शाप दिया कि 'अरे वालिन् यदि मेरे पर्वत तथा आश्रमके पास तू आवेगा तो तुरन्त मर जायगा' ॥ २८ ॥ इस शापसे डरकर वाली यहाँ कभी नहीं आता। हे राम ! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि आपकी भार्या हो ले आऊँगा ॥ २९ ॥ जब रावण उनको ले जा रहा था, तब यहीं बैठे हुए मैंने आकाशमें देखा था। उस समय सन्तान अपनी साड़ीमें बाँधकर कुछ आभूषण नीचे फेंक थे। वे यहाँ हैं, आप उसे देखें ॥ ३० ॥ इतना कहकर सुग्रीवने वे आभूषण दिखलाये । उन्हें देखकर रामने लक्ष्मणसे कहा- हे भाई ! तुम इन्हें देखकर ठीक ठीक बतलाओ कि ये जानकी के हैं या नहीं। बड़े कृतज्ञतासे जानकीके आभूषण देख ही रहा है। यह सुनकर लक्ष्मणने कहा कि मैं सबको तो नहीं पहचानता, परन्तु पाडकी अँगुलीके नूपुरके वाक्य अवश्य कह सकता हूँ कि ये सीते के ही हैं। कारण कि मैन प्रणाम करते समय केवल उनके पाँव देखे हैं-अन्य अङ्ग नहीं देखा। यह सुनकर राम प्रसन्न हुए और 'अब सीता मिल गयी' ऐसा समझा ॥ ३१-३३ । तदनन्तर सुग्रीवका विश्वास दिलानेके लिए उसी समय रामने अपने पाँवके अँगूठेसे मारकर दुन्दुभीके बड़े विशाल सिरको