भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

सर्ग ९] सारकाण्डम् [८१


ददर्श लङ्कां तां रम्यां गोपुराट्टालमण्डिताम् । दृढवीथीचतुष्काढ्यां त्रिकूटशिखरस्थिताम् ॥२२॥
पश्यन्ममन्ततः सीतां प्रतिगेहं स मारुतिः । गुहायां निद्रितं कुम्भकर्णं दृष्ट्वा भयानकम् ॥२३॥
दृष्ट्वा विभीषणं रामकीर्तने हृष्टमानसम् । दृष्ट्वा सुलोचनायुक्तं निद्रितं मेघनिःस्वनम् ॥२४॥
ययौ राजगृहं रात्री रावणं मदमि स्थितम् । दृष्ट्वा स्वयं वायुपुत्रो दीपराजीव्र्यलोकयत् । २५॥
अकरोद्वख्रहीनांस्तान् रावणादीन्त्स मारुतिः । उल्मुकेनाकरोद्दग्धं कूर्चं च रावणस्य च । २६ ।
राक्षसीः कोटिशो नग्नाः कृत्वा तोयघटान्कपिः भभंज लीलया तूष्णीं दृप्तान्पुच्छेन तर्जयन् ॥२७॥
महाऽनिविह्वलाः सर्वे प्रोचुस्तेऽथ परस्परम् । क्रुद्धाऽद्य जानकी सत्यं नः प्राणान्तमुपागतम् ॥२८॥
तच्छ्रुत्वा तुष्टचित्तः स ययौ रावणमन्दिरम् । अदृष्ट्वा जानकीं तत्र ययौ पुष्पकमुत्तमम् । २९।
रावणं निद्रितं दृष्ट्वा वेष्टितं स्त्रीकदम्बकैः । दृष्ट्वा मन्दोदरीं तत्र सीतेयमिति शंकितः ।' ३०।।
लक्ष्मणोक्तानि चिह्नानि पर्यस्तस्यां ददर्श न, तथापि सीतासदृशीं दृष्ट्वा व्यग्रमनास्त्वभूत् ॥३१॥

पार्वत्युवाच
कथं मन्दोदरी सीतामदृशी राक्षसीपिता । मानांशांशांशजाः सर्वाः स्त्रियश्चेति श्रुतं मया ॥३२॥

श्रीशिव उवाच
शृणुष्व कारणं देवि सीतेयं विष्णुना चिता । तेनैव विष्णुना पूर्वमियं मन्दोदरी चिता ॥३३॥
एकदा कैकसी माता रावणं प्राह दुःखिता । क्षेपोच्छुन्मोन तल्लिङ्गं गत चाद्य रसातलम् । ३४॥
शिवाराधाय मां देहि आत्मलिंगमनुत्तमम् । तन्मातृवचनं श्रुत्वा गाण्णादरदोन्मुखम् । ३५॥
मामाह रावणो वाक्यं द्वौ वरौ देहि मां प्रभो । आत्मलिंगं च मन्मात्रे पन्त्यर्थं पार्वतीं मम ॥३६ ।


आया । सो अब मैंने जान लिया कि राम रावणका नारंग ।. २० ।। तुमने लङ्काको जीत लिया। जाओ, लङ्कामे घुसकर अशोकवाटिका में जानकीको देखो। तब हनुमान् सीताको खोजते हुए लङ्कामे घुसे ।। २१ ।।
उन्होंने पुरद्वार तथा अटारियोंसे मण्डित रम्य लङ्कानगरीको देखा। वह त्रिकूट पर्वतके शिखरपर स्थित बाजारों, सड़कों तथा चौराहोंसे रमणीक लग रही थी ।। २२ ।। हनुमान् सब ओर प्रत्येक घरमें सीताको ढूँढकर गुफामें सोता हुए कुम्भकर्णको देखा ॥ २३ ॥ उन्होंने रामनामक कीर्तनसे प्रसन्नमना विभीषणको और सुलोचनाके साथ सोए हुए मेघनादको देखा ॥ २४ ॥ तदनन्तर राजभवनमें जाकर रात्रिके समय सभामें स्थित रावणको देखा; यह देखकर वायुपुत्र हनुमान्ने दीपकोंको बुझा दिया ।। २५ ।। हनुमान्जीने उन रावणादिको नग्न करके रावणकी दाढ़ी-मूंछ आदिको लुआठोंसे जलाकर भस्म कर दिया ।। २६ ।। करोड़ों राक्षसियोंको नग्न कर दिया; सिकवेलमे रक्खे घड़ोंको फोड़ डाला और सुपीसे उद्धतर सिपाहियोंको पूंछसे खूब पीटा ।। २७ ।।
अतिशय विह्वल होकर वे सब परस्पर कहने लगे कि सचमुच सीताजी हम लोगोंपर रुष्ट हुई है। अब हम लोगोंका प्राणान्तकाल निकट आ गया है ॥ २८ । यह सुना तो संतुष्टचित्त होकर हनुमान् रावणके महलमें गये । वहाँ भी जानकीको न देखकर पुष्पकविमानपर गये ।। २९ । वहाँ रावणको स्त्रियोंके समूहसे वेष्टित होकर सोता हुआ देखा । साथ ही मन्दोदरीको देखकर 'यही सीता है क्या ?' ऐसी शङ्का करने लगे । ३० ।। परन्तु जब लक्ष्मणके कथनानुसार सीताका मुखाकृति मिलाने लगे तो नहीं मिली । फिर भी उसको सीताके समान देखकर आश्चर्यचकित हुए । ३१ । पार्वतीजीने पूछा - हे सदाशिव ! राक्षसी मन्दोदरी सीताके सदृश कैसे थी ? मैंने तो सुना है कि संसारकी सब स्त्रिये सीताके अंशांशसे उत्पन्न हुई हैं ।। ३२ ।। श्रीशिवजी कहने लगे - एक बार रावणकी माता केकसीने दुःखित होकर रावणसे कहा कि शोपनामके उच्छ्वाससे मेरा नित्य पूजा करनेका शिवलिंग पातालमें चला गया है ।। ३३ ।। ३४ ।। सो तुम एक उत्तम शिवलिंग लाकर मुझे ला दो । माताके बचनको सुना न अपने गाननसे वरदान देनेके लिए राजी करके मुझसे रावणने कहा - हे प्रभो ! मुझको दो वर दीजिए । एकतो मेरी माताके लिए आत्मलिंग और दूसरेसे