भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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सिपाही फिर निश्चिंत हो कोलाहल मचाते हुए आगे बढ़े। गाड़ी का पहिया ‘घड़-घड़’ शब्द करता हुआ घूमने लगा। भवानंद ने अतीव धीमे स्वर मे, ताकि महेंद्र ही सुन सके, कहा-‘‘महेंद्रसिंह! मैं तुम्हे पहचानता हूं। तुम्हारी सहायता करने के लिए ही यहां आया हूं। मैं कौन हूं यह भी तुम्हे सुनने की जरूरत नही। मै जो कहता हूं, सावधान होकर वही करो! तुम अपने हाथ के बंधन गाड़ी के पहिये के ऊपर रखो।’’ महेंद्र विस्मित हुए, फिर भी उन्होंने बिना कहे-सुने भवानंद के मतानुसार कार्य किया- अंधकार मे गाड़ी के चक्के की तरफ जरा खिसककर उन्होने अपने हाथ के बंधनो को पहिये के ऊपर लगाया। थोड़ी ही देर मे उनके हाथ के बंधन कटकर खुल गए। इस तरह बंधन से मुक्त होकर वे चुपचाप गाड़ी पर लेट रहे। भवानंद ने भी उसी तरह अपने को बंधनो से मुक्त किया। दोनों ही चुपचाप लेटे रहे।

जिस जगह जंगल के समीप राज-पथ पर खड़े होकर ब्रह्मचारी ने चारो ओर देखा था उसी राह से इन लोगो को गुजरना था। उस पहाड़ी के निकट पहुंचने पर सिपाहियो ने देखा कि एक शिलाखंड पर जंगल के किनारे एक पुरुष खड़ा है। हलकी चांदनी मे उस पुरुष का काला शरीर चमकता हुआ देखकर सिपाही बोला--‘‘देखो एक साला और यहां खड़ा है।’’ इस पर उसे पकड़ने के लिए एक आदमी दौड़ा, लेकिन वह आदमी वही खड़ा रहा, भागा नही- पकड़कर हवलदार के पास ले आने पर भी वह व्यक्ति कुछ न बोला। हवलदार ने कहा-‘‘इस साले के सिर पर गठरी लादो!’’ सिपाहियो के एक भारी गठरी देने पर उसने भी सिर पर ले ली। तब हवलदार पीछे पलटकर गाड़ी के साथ चला। इसी समय एकाएक पिस्तौल चलने की आवाज हुई- हवलदार माथे मे गोली खाकर गिर पड़ा।

‘‘इसी साले ने हवलदार को मारा है!’’ कहकर एक सिपाही ने उस मोटिया का हाथ पकड़ लिया। मोटिये के हाथ मे तब तक पिस्तौल थी। मोटिये ने अपने सिर का बोझ फेककर और तुरंत पलटकर उस सिपाही के माथे पर आघात किया, सिपाही का माथा फट गया और जमीन पर गिर पड़ा। इसी समय ‘‘हरि! हरि! हरि!’’ पुकारता दो सौ व्यक्तियो ने आकर सिपाहियो को घेर लिया। सिपाही गोरे साहब के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। साहब भी डाका पड़ा है- विचार कर तुरंत गाड़ी के पास पहुंचा और सिपाहियो को चौकोर खड़े होने की आज्ञा दी। अंग्रेजों का नशा विपद् के समय नही रहता। सिपाहियो के उस तरह खड़े होते ही दूसरी आज्ञा से उन्होने अपनी-अपनी बंदूके संभाली। इसी समय एकाएक साहब की कमर की तलवार किसी ने छीन ली और फौरन उसने एक बार मे साहब का सिर भुट्टे की तरह उड़ा दिया- साहब का धड़ घोड़े से गिरा। फायर करने का हुक्म वह दे न सका। तब लोगो ने देखा कि एक व्यक्ति गाड़ी पर हाथ मे नंगी तलवार लिए हुए ललकार रहा है- ‘‘मारो, सिपाहियो को मारो.........मारो! साथ ही हरि हरि!’’ का जय नाद भी करता जाता है। वह व्यक्ति और कोई नही भवानंद था।

एकाएक अपने साहब को मरा हुआ देख और अपनी रक्षा के लिए किसी को आज्ञा देते न देखकर सरकारी सिपाही डटकर भी निश्चेष्ट हो गए। इस अवसर पर तेजस्वी डाकुओ ने अपने सिपाहियो को हताहत कर आगे बढ़, गाड़ी पर रखे हुए खजाने पर अधिकार जमा लिया। सरकारी फौजी टुकड़ी भयभीत होकर भागी।

अंत मे वह व्यक्ति सामने आया जो दल का नेतृत्व करता था और पहाड़ी पर खड़ा था। उसने आकर भवानंद को गले लगा लिया। भवानंद ने कहा-‘‘भाई जीवानंद! तुम्हारा नाम सार्थक हो?’’

इसके बाद अपहृत धन को यथास्थान भेजने का भार जीवानंद पर रहा। वह अपने अनुचरो के साथ खजाना लेकर शीघ्र ही किसी अन्य स्थान मे चले गए। भवानंद अकेले खड़े रह गए।