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आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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आनंदमठ संन्यासी आंदोलन और बंगाल अकाल की पृष्ठभूमि पर लिखी गई बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की कालजयी कृति ‘आनंदमठ' सन 1882 ई. मे छप कर आई। इस उपन्यास की क्रांतिकारी विचारधारा ने सामाजिक व राजनीतिक चेतना को जागृत करने का काम किया। इसी उपन्यास के एक गीत 'वंदेमातरम' को बाद मे राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त हुआ। 'आनंदमठ' मे जिस काल खंड का वर्णन किया गया है वह हन्टर की ऐतिहासिक कृति ‘एन्नल ऑफ रूरल बंगाल', ग्लेग की 'मेम्वाइर ऑफ द लाइफ ऑफ वारेन हेस्टिंग्स' और उस समय के ऐतिहासिक दस्तावेज मे शामिल तथ्यो मे काफी समानता है। बहुत विस्तृत जंगल है। इस जंगल मे अधिकांश वृक्ष शाल के हैं, इसके अतिरिक्त और भी अनेक प्रकार के है। फुनगी-फुनगी, पत्ती-पत्ती से मिले हुए वृक्षो की अनंत श्रेणी दूर तक चली गई है। घने झुरमुट के कारण आलोक प्रवेश का हरेक रास्ता बंद है। इस तरह पल्लवो का आनंद समुद्र कोस-दर-कोस--सैकड़ों-हजारो कोस मे फैला हुआ है, वायु की झकझोर झोके से बह रही है। नीचे घना अंधेरा, माध्याह्न के समय भी प्रकाश नही आता-- भयानक दृश्य ! उत्सव जंगल के भीतर मनुष्य प्रवेश तक नही कर सकते, केवल पत्ते की मर्मर ध्वनि और पशु-पक्षियो की आवाज के अतिरिक्त वहां और कुछ भी नही सुनाई पड़ता। एक तो यह अति विस्तृत, अगम्य, अंधकारमय जंगल, उस पर रात्रि का समय ! पतंग उस जंगल मे रहते है लेकिन कोई चूं तक नही बोलता है। शब्दमयी पृथ्वी की निस्तब्धता का अनुमान किया नही जा सकता है; लेकिन उस अनंत शून्य जंगल के सूची-भेद्य अंधकार का अनुभव किया जा सकता है। सहसा इस रात के समय की भयानक निस्तब्धता को भेदकर ध्वनि आई-- ‘‘मेरा मनोरथ क्या सिद्ध न होगा ।.........'’ इस तरह तीन बार वह निस्तब्ध-अंधकार अलोड़ित हुआ- 'तुम्हारा क्या प्रण है ?' उत्तर मिला- “मेरा प्रण ही जीवन-सर्वस्व है?" प्रति शब्द हुआ- “जीवन तो तुच्छ है, सब इसका त्याग कर सकते है !" “तब और क्या है....और क्या होना चाहिए?' उत्तर मिला- “भक्ति!" “बंगाब्द सन् 1176 के गरमी के महीने मे एक दिन, पदचिन्ह नामक एक गांव मे बड़ी भयानक गरमी थी। गांव घरो से भरा हुआ था, लेकिन मनुष्य दिखाई नही देते थे। बाजार मे कतार-पर-कतार दुकाने विस्तृत बाजार मे लंबी-चौड़ी सड़के, गलियो मे सैकड़ो मिट्टी के पवित्र गृह, बीच-बीच मे ऊंची-नीची अट्टालिकाएं थी। आज सब नीरव हैं; दुकानदार कहां भागे हुए है, कोई पता नही। बाजार का दिन है, लेकिन बाजार लगा नही है, शून्य है। भिक्षा का दिन है, लेकिन भिक्षुक बाहर दिखाई नही पड़ते। जुलाहे अपने करघे बंद कर घर मे पड़े रो रहे है। व्यवसायी अपना रोजगार भूलकर बच्चो को गोद मे लेकर विह्वल है। दाताओ ने दान बंद कर दिया है, अध्यापको ने पाठशाला बंद कर दी है, शायद बच्चे भी साहसपूर्वक रोते नही है। राजपथ पर भीड़ नही दिखाई