भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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चरखा कात रही थी। निमाई ने जाकर कहा-"भाभी! जल्दी करो!" भाभी ने कहा-"जल्दी क्या?" नन्दोई ने तुझे मारा है, तो उनके सर में तेल मलना है क्या?' निमी-"बात ठीक है। घर मे तेल है?' उस युवती ने तेल की शीशी सामने खिसका दी। निमाई ने झट अंजली मे ऊंड़ेलकर उस युवती के रूखे बालो मे लग दिया। इसके बाद झट जूड़ा बांध दिया। फिर चपत जमाकर बोली-"तेरी ढाके-वाली साड़ी कहां रखी है, बोल?' उस स्त्री ने कुछ आश्चर्य से कहा-"क्यो जी! कुछ पागल हो गई हो क्या?' निमाई ने एक मीठा घूंसा जमाकर कहा-"निकाल साड़ी जल्दी!" तमाशा देखने के लिए युवती ने भी साड़ी बाहर निकाल दी। तमाशा देखने के लिए क्योकि इतनी तकलीफ पड़ने के बाद भी उसका सदा प्रफुल्ल रहनेवाला हृदय अभी भी वैसा ही था। नवयोवन-फूले कमल-जैसा उसकी नई उम्र का यौवन-तेल नही, सजावट नही, आहार नही, फिर भी उसी मैली पैबन्दवाली धोती के अंदर से भी वह प्रदीप्त, अनुपमेय सौन्दर्य फूट पड़ता था। वर्ण मे छायालोक की चंचलता, नयनो मे कटाक्ष, अधरो पर हंसी, हृदय मे धैर्य- मेघ मे जैसे बिजली, जैसे हृदय मे प्रतिमा, जैसे जगत के शब्दो मे संगीत और भक्त के मन मे आनंद होता है, वैसे ही उस रूप मे भी कुछ अनिर्वचनीय गौरव भाग, अनिर्वचनीय प्रेम, अनिर्वचनीय भक्ति। उसने हंसते-हंसते (लेकिन उस हंसी को किसी ने देखा नही) साड़ी निकाल दी। बोली-"निमी! भला बात तो, क्या होगी!" निमी बोली-"दादा आये है। तुझे बुलाया है।" उसने कहा-"अगर मुझे बुलाया है तो साड़ी क्या होगी? चल इसी तरह चलूंगी।" युवती कहती जाती थी- "कभी कपड़े न बदलूंगी।" चल, इसी तरह मिलना होगा। आखिर किसी तरह भी उसने कपड़े बदले नही। अंत मे दोनों कुटी के बाहर आई। निमाई को भी राजी होना पड़ा। निमाई भाभी को लेकर अपने घर के दरवाजे तक आ गई। इसके बाद भाभी को अंदर का उसने दरवाजा बंद कर लिया और स्वयं बाहर खड़ी रही। उस स्त्री की उम्र यही कोई पच्चीस वर्ष के लगभग है, लेकिन देखने मे निमाई से अधिक उम्र की नही जान पड़ती। मैले पैबंद की धोती पहनकर भी, जब वह घर में घुसी तो जान पड़ा कि जैसे घर मे उजाला हो गया। जान पड़ा, जैसे बहुतेरी कलियों का गुच्छा पत्तो से ढंका रहने पर भी, पत्ते हटते ही खिल उठा हो मानो गुलाब- जल की शीशी एकाएक मुंह खुल जाने से महक गयी हो-सुलगती हुई आग मे जैसे किसी ने धूप-धूना छोड़ दिया हो और कमरे का वातावरण ही बदल जाए। पहले तो घर मे घुसकर स्त्री ने पति को देखा नही, फिर एकाएक निगाह पड़ी कि आंगन मे लगे छोटे आम के नीचे खड़े होकर जीवानंद रो रहे है। सुंदरी ने धीर-धीरे उनके पास पहुंचकर उनका हाथ पकड़ लिया। यह कहना भूल गया कि उनकी आंखो मे जल नही आया। भगवान ही जानते है कि उसकी आंखो से आंसू की वह धारा निकलती कि शायद जीवानंद उसमे डूब जाते। लेकिन युवती ने अपनी आंखों मे आंसू नही आने दिए। जीवानंद का हाथ पकड़कर उसने कहा-"छिः! छिः! रोते क्यो हो? मै समझी कि तुम मेरे लिए रोते हो। मेरे लिए न रोना! तुमने मुझे जिस तरह रखा है, मैं उसी में सुखी हूं।" जीवानंद ने माथ उठाकर आंसू पोछते हुए स्त्री से पूछा-"शांति! तुम्हारे शरीर पर यह सैकड़ो पैबन्द की धोती क्यो है? तुम्हे तो खाने-पहनने की कोई तकलीफ नही है!" शांति ने कहा-"तुम्हारा धन तुम्हारे ही लिए है? रूपये लेकर क्या करना चाहिए, मैं नही जानती। जब तुम आओगे- जब तुम मुझे ग्रहण करोगे....."