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आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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दिन चलेगा?'' कल्याणी बोली-- ''ज्यादा दिन नही ! जितने दिन चले, जितने दिन मै चला पाती हूं, चला रही हूं । इसके बाद तुम लड़की को लेकर शहर चले जाना।'' महेंद्र- ''अगर शहर ही चलना है तो तुम्हें ही इतनी तकलीफ क्यो दी जाय? चलो न, अभी चले !'' इसके बाद दोनो अनेक तर्क-वितर्क हुए। कल्याणी- ''शहर मे जाने से क्या विशेष उपकार होगा?'' महेंद्र- ''वह स्थान भी शायद ऐसे ही जन शून्य, प्राणरक्षा के उपाय से रहित है'' कल्याणी-''मुर्शिदाबाद, कासिम बाजार या कलकत्ता जाने से प्राणरक्षा हो सकेगी। इस स्थान से तो त्याग देना हर तरह से उचित है?'' महेंद्र ने कहा-''यह घर बहुत दिनो से वंशानुक्रम से संचित धन से परिपूर्ण है, इन्हे तो चोर लूट ले जाएंगे।'' कल्याणी-''यदि वह लोग लूटने के लिए आएं तो क्या हम दो जन रक्षा कर सकते है? प्राण ही न रहा तो धन कौन भोगेगा? चलो, अभी से ही सब बंद-संद करके चल चले। अगर जिंदा रह गए तो फिर आकर भोग करेगे।'' महेंद्र ने पूछा-'' क्या तुम राह चल सकोगी? कहार सब मर ही गए हैं। बैल हैं तो गाड़ी नही है और गाड़ी है तो बैल नही है।'' कल्याणी -''तुम चिंता न करो, मैं पैदल चलूंगी।'' कल्याणी ने मन-ही-मन निश्चय किया- न होगा, राह मे मरकर गिर पडूंगी; यह दोनो जन तो बचे रहेगे। दूसरे दिन सबेरे, साथ मे कुछ धन लेकर घर-द्वार मे ताला बंद कर, गायो को मुक्तकर और कन्या को गोद मे लेकर दोनो जन राजधानी के लिए चल पड़े। यात्रा के समय महेंद्र ने कहा- ''राह बड़ी भयानक हैं। कदम- कदम पर डाकू और लुटेरे छिपे है; खाली हाथ जाना उचित नही है।'' यह कहकर महेंद्र ने फिर घर मे वापस जाकर बंदूक, गोली बारूद साथ मे ले ली। यह देखकर कल्याणी ने कहा-''अगर अस्त्र की बात याद की है तो जरा लड़की को गोद मे सम्हाल लो, मै भी हथियार ले लूं'' यह कहकर कल्याणी ने लड़की महेंद्र की गोद मे देकर घर के भीतर प्रवेश किया। महेंद्र ने पूछा-''तुम कौन-सा हथियार लोगी'' कल्याणी ने घर मे जाकर विष की एक डिबिया अपने कपड़ो के अंदर छिपा ली। जेठ का महीना है। भयानक गर्मी से पृथ्वी अग्निमय हो रही है; हवा मे आग की लपट दौड़ रही है, आकाश गरम तवे की तरह जल रहा है, राह की धूल आग की चिनगारी बन गई है। कल्याणी के शरीर से पसीने की धार बहने लगी; कभी पीपल के नीचे, कभी बड़ के नीचे, कभी खजूर के नीचे छाया देखकर तिलमिलाती हुई बैठ जाती है। सूखे हुए तालाबो का कीचड़ से सना मैला जल पीकर वे लोग राह चलने लगे। लड़की महेंद्र की गोद मे है- समय समय पर वे उसे पंखा हांक देते है। कभी घने हरे पत्तो से दाएं, सुगंधित फूलो वाले वृक्ष से लिपटी हुई लता की छाया मे दोनो जन बैठकर विराम करते है। महेंद्र ने कल्याणी को इतना सहनशील देखकर आश्चर्य किया। पास के ही एक जलाशय से वस्त्र को जल से तर कर महेंद्र ने उससे कन्या और पत्नी का जलता माथा और मुंह धोकर कुछ शांत किया। इससे कल्याणी कुछ आश्वस्त अवश्य हुई, लेकिन दोनो ही भूख से बड़े विह्वल हुए। वे लोग तो उसे भी सहने लगे, लेकिन बालिका की भूख-प्यास उनसे बर्दाश्त न हुई, अतः वहां अधिक देर न ठहरकर वे लोग फिर

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