भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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लगे। जीवानंद और भवानंद के पदपद्मो मे प्रणाम कर संतानो की संख्या अनंत होने लगी। जहां वे लोग राजपुरुषो को पाते थे, अच्छी तरह मरम्मत करते थे, मुसलमानो के गांव भस्म कर राख बनाए जाने लगे। स्थानीय मुसलमान नवाब यह सुनकर दल-के-दल सैनिको को इनके दमन के लिए भेजते थे; लेकिन उस समय तक संतान गण दलबद्ध, शस्त्रयुक्त और महादंभशाली हो गए थे। उनके तेज के आगे मुस्लिम फौज अग्रसर हो न पाती थी; यदि आगे बढ़ती थी तो अमित संख्या मे संतान-सैन्य उस पर आक्रमण कर उनको धुनकी हुई रुई की तरह उड़ा देती थी। कभी कोई दल यदि परास्त होता या, तो तुरंत दूसरा बड़ा दल आकर उस मुस्लिम फौज का सर उड़ा देता था और मत होकर हरिनाम का जयघोष करता, नाचता गायब हो जाता था। उस समय लब्धप्रतिष्ठ अंग्रेज कुल के प्रातः सूर्य वारेन हेस्टिंग्स भारतवर्ष के गवर्नर-जनरल थे। कलकत्ते मे बैठे हुए वे राजनीतिक श्रृंखला की कड़ियां गिन रहे थे कि इसी से वे समूचे भारत को बांध लेगे। एक दिन भगवान ने भी सिंहासन पर बैठकर निःसंदेह कहा था- तथास्तु ! लेकिन वह दिन अभी दूर था। आजकल तो संतानो की दिगंत-व्यापिनी हरिध्वनि से वारेन हेस्टिंग्स भी कांप उठे थे। हेस्टिंग्स साहब ने पहले तो देशी फौज से विद्रोह दबाने की चेष्टा की थी। लेकिन उन देशी सिपाहियो की यह दशा हुई कि वे लोग एक बुड्ढी औरत के मुंह से भी यदि हरिनाम सुन पाते थे, तो भागते थे, अंत मे निरूपाया होकर वारेन हेस्टिंग्स ने कप्तान टॉमस नामक एक सुदक्ष सेनापति के अधिनायकत्व मे थोड़ी गोरी फौज भेजकर विद्रोह-दमन का यत्न किया। कप्तान टॉमस विद्रोह- निवारण के लिए बहुत ही उत्तम उपाय करने लगे। उन्होने अपनी गोरी पल्टन के साथ नवाब की सेना और जमीदारो के आदमी मिलाकर एक अत्यंत बलिष्ठ सेना तैयार कर ली। इसके बाद उस सम्मिलित सैन्य के टुकड़े-टुकड़े कर उपयुक्त नायको के हाथ मे उन्होने सौंप दिया। साथ ही उन लोगो को छोटे-छोटे निश्चित अंचलों मे विभक्त कर दिया; कह दिया कि जहां संतानो को पाओ, पशु की तरह मारो और हंकाओ। गोरी सैन्य दम्भ की बोतल छान संगीन चढ़ाकर हुई। लेकिन टॉमस की सेना, जैसे खेती काटी जाती है, वैसे ही काटी जाने लगी। हरिध्वनि से टॉमस के कान बहरे हो गए; क्योकि उस समय संतान असंख्य थे और प्रदेश भर मे फैले हुए थे। कम्पनी की उस समय अनेक कोठियां थी। ऐसी ही एक कोठी शिवग्राम मे थी। डॉनीवर्थ साहब इस कोठी के अध्यक्ष थे। उस समय रेशम-कोठी की रक्षा का बहुत ही अच्छा प्रबन्ध हुआ करता था। डॉनीवर्थ ने इसी वजह से किसी तरह अपनी प्राणरक्षा की। लेकिन अपनी स्त्री-कन्या को कलकत्ता भेज देने के लिए उन्हे बाध्य होना पड़ा था; कारण-डॉनीवर्थ सन्तानो द्वारा बहुत ही पीड़ित हुए थे। उसी समय टॉमस साहब थोड़ी फौज लेकर उस अंचल मे पहुंच गये। उस समय कितने ही डोम,चमार,लंगड़े-लूले भी पराया धन लूटने के लिए उत्साहित हो गये थे। उन सबो ने जाकर कप्तान टॉमस की रसद पर आक्रमण किया। कप्तान साहब बहुत अधिक मात्रा मे खाद्य-सामग्री- घी, मैदा, सूजी, चावल गाड़ियो पर लदवाकर ले आ रहे थे। इसे देखकर डोम-चमारो का दल अपना लोभ संवरण कर न सका- उन सबने जाकर गाड़ी पर आक्रमण किया; लेकिन सिपाहियो की दो-चार संगीने खाकर सब भागे। कप्तान टॉमस ने उसी समय कलकत्ते रिपोर्ट भेजी कि आज कुल 157 (एक सौ संतावन )सिपाहियो को लेकर मैंने 14730 विद्रोहियो को परास्त किया है। विद्रोहियों के 2153 (इक्कीस सौ तिरेपन) व्यक्ति मरे, 1223 घायल हुए और 7 व्यक्ति बन्दी हुए। केवल अन्तिम संख्या सत्य थी। कप्तान टॉमस ने द्वितीय ब्लेनहम या रसवाक का युद्ध जीता- यह सोचते हुए वे अपनी मूछो पर ताव देते हुए इधर-उधर ठाट से घूमने लगे। उन्होने डॉनीवर्थ से कहा- “अब क्या डरते हो? बस, विद्रोहियो का दमन हो गया! अब अपनी स्त्री-कन्या का कलकत्ते से बुला