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आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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पृष्ठ 8

वह ऋषितुल्य महात्मा यह कहकर बाहर जा रहे थे; इसी समय कल्याणी फिर प्रणाम कर हाथ जोड़ खड़ी हो गई। महात्मा ने पूछा-‘‘क्या कहना चाहती हो?‘‘ कल्याणी ने हाथ जोड़े हुए कहा- ‘‘मुझे दूध पीने की आज्ञा न दै। उसमे एक बाधा है, मैं पी न सकूंगी।.............‘‘ इस पर महात्मा ने दुःखी हृदय से कहा- ‘‘क्या बाधा है? मैं ब्रह्मचारी हूं, तुम मेरी कन्या के समान हो; ऐसी कौन बात हो सकती है जो मुझसे कह न सको? मैं जब तुम्हे वन से उठाकर यहां ले आया, तो तुम अत्यंत भूख प्यास से अवसन्न थी, तुम यदि दूध न पियोगी तो कैसे बचोगी?‘‘ इस पर कल्याणी ने भरी आंखे और भरे गले से कहा- ‘‘आप देवता है, आपसे अवश्य निवेदन करूंगी - अभी तक मेरे स्वामी ने कुछ नही खाया है, उनसे मुलाकात हुए बिना या संवाद मिले बिना मैं भोजन न कर सकूंगी। मैं कैसे खाऊंगी....‘‘ ब्रह्मचारी ने पूछा- ‘‘तुम्हारे पतिदेव कहां है?‘‘ कल्याणी बोली- ‘‘यह मुझे मालूम नही- दूध की खोज मे उनके बाहर निकलने पर ही डाकू मुझे उठा ले गए‘‘ इस पर ब्रह्मचारी ने एक-एक बात पूछकर कल्याणी से उसके पति का सारा हाल मालूम कर लिया। कल्याणी ने पति का नाम नही बताया, बता भी नही सकती थी, किंतु अन्याय परिचयो से ब्रह्मचारी समझ गए। उन्होने पूछा- ‘‘तुम्ही महेंद्र की पी हो?‘‘ इसका कोई उत्तर न देकर कल्याणी सिर झुका कर, जलती हुई आग मे लकड़ी लगाने लगी। ब्रह्मचारी ने समझकर कहा- ‘‘तुम मेरी बात मानो, मैं तुम्हारे पति की खोज करता हूं। लेकिन जब तक दूध न पिओगी, मैं न जाऊंगा?‘‘ कल्याणी पूछा- ‘‘यहां थोड़ा जल मिलेगा?‘‘ ब्रह्मचारी ने जल का कलश दिखा दिया। कल्याणी ने अंजलि रोपी, ब्रह्मचारी ने जल डाल दिया। कल्याणी ने उस जल की अंजलि को महात्मा के चरणो के पास ले जाकर कहा- ‘‘इसमे कृपा कर पदरेणु दे दे !‘‘ महात्मा के अंगूठे द्वारा छू देने पर कल्याणी ने उसे पीकर कहा- ‘‘मैंने अमृतपान कर लिया है। अब और कुछ खाने- पीने को न कहिए। जब तक पतिदेव का पता न लगेगा मैं कुछ न खाऊंगी।‘‘ इस पर ब्रह्मचारी ने संतुष्ट होकर कहा- ‘‘तुम इसी देवस्थान मे रहो। मैं तुम्हारे पति की खोज मे जाता हूं !‘‘ रात काफी बीत चुकी है। चंद्रमा माथे के ऊपर है। पूर्ण चंद्र नही है, इसलिए चांदनी भी चटकीली नही- फीकी है। जंगल के बहुत बड़े हिस्से पर अंधकार मे धुंधली रोशनी पड़ रही है। इस प्रकाश मे मठ के इस पार से दूसरा किनारा दिखाई नही पड़ता। मठ मानो एकदम जनशून्य है- देखने से यही मालूम होता है। इस मठ के समीप से मुर्शिदाबाद और कलकत्ते को राह जाती है। राह के किनारे ही एक छोटी पहाड़ी है, जिस पर आम के अनेक पेड़ है। वृक्षो की चोटी चांदनी से चमकती हुई कांप रही है, वृक्षो के नीचे पत्थर पर पड़नेवाली छाया भी कांप रही है। ब्रह्मचारी उसी पहाड़ी के शिखर पर चढ़कर न जाने क्या सुनने लगे। नही कहा जा सकता कि वे क्या सुन रहे थे। इस अनंत जंगल मे पूर्ण शांति थी- कही ऐसे ही पत्तो की मर्मर-ध्वनि सुनाई पड़ जाती थी। पहाड़ की तराई मे एक जगह भयानक जंगल है। ऊपर पहाड़ नीचे जंगल बीच मे वह राह है। नही कह सकते कि उधर कैसी आवाज हुई जिसे सुनकर ब्रह्मचारी उसी ओर चल पड़े। उन्होने भयानक जंगल मे प्रवेश कर देखा कि वहां एक घने स्थान में वृक्षो की छाया मे बहुतेरे आदमी बैठे है। वे सब मनुष्य लंबे, काले, और सशस्त्र थे पेड़ो की छाया को भेदकर आनेवाली चांदनी उनके शस्त्रो को चमका रही थी। ऐसे ही दो सौ आदमी बैठे है और सब शांत, चुप है। ब्रह्मचारी उनके बीच मे जाकर खड़े हो गए और उन्होने कुछ इशारा कर दिया,

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