भारतकोश
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आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

दोनो विमल ज्योस्तना मे पुष्करिणी-तट पर बैठे रहे। जीवानंद का शरीर अद्भुत औषध बल से जल्द ही ठीक हो गया। जीवानंद ने कहा-“शांति! चिकित्सक की दवा मे गुण है। अब मेरे शरीर मे जरा भी ग्लानि या कष्ट नही है। बोलो, अब कहां चले संतान सेना का जयोल्लास सुनाई पड़ रहा है!‘’ शांति बोली-“अब वहां नही। माता का कार्योद्धार हो गया है। अब यह देश संतानो का है। अब वहां क्या करने चले?‘’ जीवानंद-“जो राज्य छीना है उसकी बाहुबल से रक्षा तो करनी होगी।‘’ शांति-‘’रक्षा के लिए महेंद्र है। तुमने प्रायश्चित कर संतान-धर्म के लिए प्राण-त्याग दिया था। अब पुनः प्राप्त इस जीवन पर संतानो का अधिकार नही है। हमलोग संतानों के लिए मर चुके है। अब हमे देखकर संतान लोग कह सकते है कि प्रायश्चित के भय से ये लोग छिप गए थे, अब विजय होने पर प्रकट हो गए है- राज्य-भाग लेने आए है।‘’ जीवानंद-“यह क्या शांति? लोगो के अपवाद-भय से अपना कर्त्तव्य छोड़ दे। मेरा कार्य मातृसेवा है। दूसरा चाहे जो कहे, मै मातृ-सेवा करूंगा।‘’ शांति-“अब तुम्हे इसका अधिकार नही है, क्यो कि तुमने मातृ-सेवा के लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया। अब-यदि सेवा करोगे, तो तुमने उत्सर्ग क्या किया? मातृ-सेवा से वंचित होना ही प्रधान प्रायश्चित है। अन्यथा जीवन त्याग देना क्या कोई बड़ा काम है?‘’ जीवानंद-“शांति! तुमने ठीक समझा। लेकिन मै अपने प्रायश्चित को अधूरा न रखूंगा। मेरा सुख संतान-धर्म मे है, लेकिन कहां जाऊंगा? मातृ-सेवा त्यागकर घर जाने में क्या सुख मिलेगा?‘’ शांति-“यह तो मै कहती नही हूं। हम लोग अब गृहस्थ नही है, हम दोनो ही संन्यासी रहेगे- फिर ब्रह्मचर्य का पालन करेगे। चलो हम लोग देश-पर्यटन कर देव-दर्शन करे।‘’ जीवानंद-“इसके बाद?‘’ शांति-“इसके बाद हिमालय पर कुटी का निर्माण कर हम दोनो ही देवाराधना करेगे- जिससे माता का मंगल हो, यही वर मांगेगे।‘’ इसके बाद दोनों ही उठकर हाथ मे हाथ दे, ज्योत्स्नामयी रात्रि मे अन्तर्हित हो गए। हाय मां ! क्या फिर जीवानंद सदृश पुत्र और शांति जैसी कन्या तुम्हारे गर्भ मे आएंगे? स्वामी सत्यानंद रणक्षेत्र मे किसी से कुछ न कहकर आनंदमठ मे लौट आए। वहां वे गंभीर रात्रि मे विष्णु-मंडप मे बैठकर ध्यानमग्न हुए। इसी समय उन चिकित्सक ने वहां आकर दर्शन दिया। देखकर सत्यानंद ने उठकर प्रणाम किया। चिकित्सक बोले-“सत्यानंद! आज माघी पूर्णिमा है।‘’ सत्यादंन-“चलिए मै तैयार हूं। किंतु महात्मन् ! मेरे एक संदेह को दूर कीजिए। मैने क्या इसीलिए युद्ध- जय कर संतान-धर्म की पताका फहरायी थी?‘’ जो आए थे, उन्होने कहा-“तुम्हारा कार्य सिद्ध हो गया, मुस्लिम राज्य ध्वंस हो चुका। अब तुम्हारी यहां कोई जरूरत नही, अनर्थक प्राणहत्या की आवश्यकता नही!‘’ सत्यानंद-“मुस्लिम राज्य ध्वंस अवश्य हुआ है, किंतु अभी हिंदु राज्य स्थापित हुआ नही है। अभी भी कलकत्ते मे अंग्रेज प्रबल है।‘’ वे बोले-“अभी हिंदु-राज्य स्थापित न होगा। तुम्हारे रहने से अनर्थक प्राणी-हत्या होगी, अतएव चलो !‘’ यह सुनकर सत्यानंद तीव्र मर्म-पीड़ा से कातर हुए, बोले-“प्रभो ! यदि हिंदू-राज्य स्थापित न होगा, तो कौन

राज्य होगा? क्या फिर मुस्लिम-राज्य होगा?‘‘ उन्होने कहा-‘‘नही, अब अंगरेज-राज्य होगा‘‘ सत्यानंद की दोनो आंखो से जलधारा बहने लगी। उन्होने सामने जननी-जन्मभूमि की प्रतिमा की तरफ देख हाथ जोड़कर कहा-‘‘हाय माता! तुम्हारा उद्धार न कर सका। तू फिर म्लेच्छो के हाथ मे पड़ेगी। संतानो के अपराध को क्षमा कर दो मां! रणक्षेत्र मे मेरी मृत्यु क्यो न हो गई?‘‘ महात्मा ने कहा-‘‘सत्यानंद कातर न हो। तुमने बुद्धि विभ्रम से दस्युवृत्ति द्वारा धन संचय कर रण मे विजय ली है। पाप का कभी पवित्र फल नही होता। अतएव तुम लोग देश-उद्धार नही कर सकोगे। और अब जो कुछ होगा, अच्छा होगा। अंगरेजो के बिना राजा हुए सनातन धर्म का उद्धार नही हो सकेगा। महापुरुषो ने जिस प्रकार समझाया है, मैं उसी प्रकार समझाता हूं- ध्यान देकर सुनो! तैंतिस कोटि देवताओ का पूजन सनातन-धर्म नही है। वह एक तरह का लौकिक निकृष्ट-धर्म, म्लेच्छ जिसे हिंदू-धर्म कहते है- लुस हो गया। प्रकृति हिंदू-धर्म ज्ञानात्मक- कार्यात्मक नही। जो अन्तर्विषयक ज्ञान है- वही सनातन-धर्म का प्रधान अंग है। लेकिन बिना पहले बहिर्विषयक ज्ञान हुए, अन्तर्विषयक ज्ञान असंभव है। स्थूल देखे बिना सूक्ष्म की पहचान ही नही हो सकती। बहुत दिनो से इस देश मे बहिर्विषयक ज्ञान लुस हो चुका है- इसीलिए वास्तविक सनातन-धर्म का भी लोप हो गया है। सनातन-धर्म के उद्धार के लिए पहले बहिर्विषयक ज्ञान-प्रचार की आवश्यकता है। इस देश मे इस समय वह बहिर्विषयक ज्ञान नही है- सिखानेवाला भी कोई नही, अतएव बाहरी देशो से बहिर्विषयक ज्ञान भारत मे फिर लाना पड़ेगा। अंगरेज उस ज्ञान के प्रकाण्ड पंडित है- लोक-शिक्षा मे बड़े पटु है। अतः अंगरेजो के ही राजा होने से, अंगरेजी की शिक्षा से स्वतः वह ज्ञान उत्पन्न होगा! जब तक उस ज्ञान से हिंदु ज्ञानवान, गुणवान और बलवान न होगे, अंगरेज राज्य रहेगा। उस राज्य मे प्रजा सुखी होगी, निष्कंटक धर्माचरण होगे। अंगरेजो से बिना युद्ध किए ही, निरस्त्र होकर मेरे साथ चलो!‘‘ सत्यानंद ने कहा-‘‘महात्मन्! यदि ऐसा ही था- अंगरेजो को ही राजा बनाना था, तो हम लोगो को इस कार्य मे प्रवृत्त करने की क्या आवश्यकता थी?‘‘ महापुरुष ने कहा-‘‘अंगरेज उस समय बनिया थे- अर्थ संग्रह मे ही उनका ध्यान था। अब संतानो के कारण ही वे राज्य-शासन हाथ मे लेगे, क्योकि बिना राजत्व किए अर्थ-संग्रह नही हो सकता। अंगरेज राजदण्ड ले, इसलिए संतानो का विद्रोह हुआ है। अब आओ, स्वयं ज्ञानलाभ कर दिव्य चक्षुओ से सब देखो, समझो!‘‘ सत्यानंद-‘‘हे महात्मा! मैं ज्ञान लाभ की आकांक्षा नही रखता-ज्ञान की मुझे आवश्यकता नही। मैने जो व्रत लिया है, उसी का पालन करूंगा। आशीर्वाद कीजिए कि मेरी मातृभक्ति अचल हो!‘‘ महापुरुष-‘‘व्रत सफल हो गया- तुमने माता का मंगल-साधन किया- अंगरेज राज्य तुम्ही लोगो द्वारा स्थापित समझो! युद्ध-विग्रह का त्याग करो- कृषि में नियुक्त हो, जिससे पृथ्वी श्स्यशालिनी हो, लोगो की श्रीवृद्धि हो!‘‘ सत्यानंद की आंखो से आंसू निकलने लगे, बोले-‘‘माता को शत्रु-रक्त से शस्यशालिनी करूं?‘‘ महापुरुष-‘‘शत्रु कौन है? शत्रु अब कोई नही। अंगरेज हमारे मित्र है। फिर अंगरेजो से युद्ध कर अंत मे विजयी हो- ऐसी अभी किसी की शक्ति नही?‘‘ सत्यानंद-‘‘न रहे, यही माता के सामने मैं अपना बलिदान चढ़ा दूंगा!‘‘ महापुरुष -‘‘अज्ञानवश! चलो, पहले ज्ञान-लाभ करो। हिमालय-शिखर पर मातृ-मंदिर है, वही तुम्हे माता की मूर्ति प्रत्यक्ष होगी!‘‘ यह कहकर महापुरुष ने सत्यानंद का हाथ पकड़ लिया। कैसी अपूर्व शोभा थी! उस गंभीर निस्तब्ध रात्रि मे

विराट चतुर्भुज विष्णु-प्रतिमा के सामने दोनो महापुरुष हाथ पकड़े खड़े थे। किसको किसने पकड़ा है? ज्ञान ने भक्ति का हाथ पकड़ा है, धर्म के हाथ मे कर्म का हाथ है, विसर्जन ने प्रतिष्ठा का हाथ पकड़ा है। सत्यानंद ही शांति है- महापुरुष ही कल्याण है- सत्यानंद प्रतिष्ठा है- महापुरुष विसर्जन है। विसर्जन ने आकर प्रतिष्ठा को साथ ले लिया। ॥ इति ॥