अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रद्धालक्षणमित्येवं धर्मं धीराः प्रचक्षते । इत्येवं देवयाना वः पन्थानः परिकीर्तिताः । सद्भिरध्यासिता धीरैः कर्मभिर्धर्मसेतवः ॥ ४४ ॥ विद्वानोंने श्रद्धाको ही धर्मका मुख्य लक्षण बतलाया है। इस प्रकार आपलोगोंके प्रति देवयान मार्गोंका वर्णन किया गया है। धैर्यवान् संत-महात्मा अपने कर्मोंसे धर्म-मर्यादाका पालन करते हैं ॥ ४४ ॥ एतेषां पृथगध्यास्ते यो धर्मं संशितव्रतः । कालात् पश्यति भूतानां सदैव प्रभवाप्ययौ ॥ ४५ ॥ जो मनुष्य उत्तम व्रतका आश्रय लेकर उपर्युक्त धर्मोंमेंसे किसीका भी दृढ़तापूर्वक पालन करते हैं, वे कालक्रमसे सम्पूर्ण प्राणियोंके जन्म और मरणको सदा ही प्रत्यक्ष देखते हैं ॥ ४५ ॥ अतस्तत्त्वानि वक्ष्यामि याथातथ्येन हेतुना । विषयस्थानि सर्वाणि वर्तमानानि भागशः ॥ ४६ ॥ अब मैं यथार्थ युक्तिके द्वारा पदार्थोंमें विभागपूर्वक रहनेवाले सम्पूर्ण तत्त्वोंका वर्णन करता हूँ ॥ ४६ ॥ महानात्मा तथाव्यक्तमहंकारस्तथैव च । इन्द्रियाणि दशैकं च महाभूतानि पञ्च च ॥ ४७ ॥ विशेषाः पञ्चभूतानामिति सर्गः सनातनः । चतुर्विंशतिरेका च तत्त्वसंख्या प्रकीर्तिता ॥ ४८ ॥ अव्यक्त प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, दस इन्द्रियाँ, एक मन, पञ्च महाभूत और उनके शब्द आदि विशेष गुण—यह चौबीस तत्त्वोंका सनातन सर्ग है। तथा एक जीवात्मा-इस प्रकार तत्त्वोंकी संख्या पचीस बतलायी गयी है ॥ ४७-४८ ॥ तत्त्वानामिथ यो वेद सर्वेषां प्रभवाप्ययौ । स धीरः सर्वभूतेषु न मोहमधिगच्छति ॥ ४९ ॥ जो इन सब तत्त्वोंकी उत्पत्ति और लयको ठीक-ठीक जानता है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें धीर है और वह कभी मोहमें नहीं पड़ता ॥ ४९ ॥ तत्त्वानि यो वेदयते यथातथं गुणांश्च सर्वानखिलांश्च देवताः । विधूतपाप्मा प्रविमुच्य बन्धनं स सर्वलोकानमलान् समश्नुते ॥ ५० ॥ जो सम्पूर्ण तत्त्वों, गुणों तथा समस्त देवताओंको यथार्थरूपसे जानता है, उसके पाप धुल जाते हैं और वह बन्धनसे मुक्त होकर सम्पूर्ण दिव्यलोकोंके सुखका अनुभव करता है ॥ ५० ॥