अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 106, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंनियम्यते तमो यत्र रजस्तत्र प्रवर्तते । नियम्यते रजो यत्र सत्त्वं तत्र प्रवर्तते ॥ ७ ॥ जहाँ तमोगुणको रोका जाता है, वहाँ रजोगुण बढ़ता है और जहाँ रजोगुणको दबाया जाता है, वहाँ सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है ॥ ७ ॥ नैशात्मकं तमो विद्यात् त्रिगुणं मोहसंज्ञितम् । अधर्मलक्षणं चैव नियतं पापकर्मसु । तामसं रूपमेतत् तु दृश्यते चापि सङ्गतम् ॥ ८ ॥ तमको अन्धकाररूप और त्रिगुणमय समझना चाहिये। उसका दूसरा नाम मोह है। वह अधर्मको लक्षित करानेवाला और पाप करनेवाले लोगोंमें निश्चित रूपसे विद्यमान रहनेवाला है। तमोगुणका यह स्वरूप दूसरे गुणोंसे मिश्रित भी दिखायी देता है ॥ ८ ॥ प्रकृत्यात्मकमेवाहू रजः पर्यायकारकम् । प्रवृत्तं सर्वभूतेषु दृश्यमुत्पत्तिलक्षणम् ॥ ९ ॥ रजोगुणको प्रकृतिरूप बतलाया गया है, यह सृष्टिकी उत्पत्तिका कारण है। सम्पूर्ण भूतोंमें इसकी प्रवृत्ति देखी जाती है। यह दृश्य जगत् उसीका स्वरूप है, उत्पत्ति या प्रवृत्ति ही उसका लक्षण है ॥ ९ ॥ प्रकाशं सर्वभूतेषु लाघवं श्रद्दधानता । सात्त्विकं रूपमेवं तु लाघवं साधुसम्मितम् ॥ १० ॥ सब भूतोंमें प्रकाश, लघुता (गर्वहीनता) और श्रद्धा—यह सत्त्वगुणका रूप है। गर्वहीनताकी श्रेष्ठ पुरुषोंने प्रशंसा की है ॥ १० ॥ एतेषां गुणतत्त्वानि वक्ष्यन्ते तत्त्वहेतुभिः । समासव्यासयुक्तानि तत्त्वतस्तानि बोधत ॥ ११ ॥ अब मैं तात्त्विक युक्तियोंद्वारा संक्षेप और विस्तारके साथ इन तीनों गुणोंके कार्योंका यथार्थ वर्णन करता हूँ, इन्हें ध्यान देकर सुनो ॥ ११ ॥ सम्मोहोऽज्ञानमत्यागः कर्मणामविनिर्णयः । स्वप्नः स्तम्भो भयं लोभः स्वतः सुकृतदूषणम् ॥ १२ ॥ अस्मृतिश्चाविपाकश्च नास्तिक्यं भिन्नवृत्तिता । निर्विशेषत्वमन्धत्वं जघन्यगुणवृत्तिता ॥ १३ ॥ अकृते कृतमानित्वमज्ञाने ज्ञानमानिता । अमैत्री विकृताभावो ह्यश्रद्धा मूढभावना ॥ १४ ॥ अनार्जवमसंज्ञत्वं कर्म पापमचेतना । गुरुत्वं सन्नभावत्वमवशित्वमवाग्गतिः ॥ १५ ॥ सर्व एते गुणा वृत्तास्तामसाः सम्प्रकीर्तिताः । ये चान्ये विहिता भावा लोकेऽस्मिन् भावसंज्ञिताः ॥ १६ ॥