अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 140, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः सब पदार्थोंके आदि-अन्तका और ज्ञानकी नित्यताका वर्णन ब्रह्मोवाच यदादिमध्यपर्यन्तं ग्रहणोपायमेव च । नामलक्षणसंयुक्तं सर्वं वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥ १ ॥ ब्रह्माजीने कहा—महर्षिगण! अब मैं सम्पूर्ण पदार्थोंके नाम-लक्षणोंसहित आदि, मध्य और अन्तका तथा उनके ग्रहणके उपायका यथार्थ वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥ अहः पूर्वं ततो रात्रिर्मासाः शुक्लादयः स्मृताः । श्रवणादीनि ऋक्षाणि ऋतवः शिशिरादयः ॥ २ ॥ पहले दिन है फिर रात्रि; (अतः दिन रात्रिका आदि है। इसी प्रकार) शुक्लपक्ष महीनेका, श्रवण नक्षत्रोंका और शिशिर ऋतुओंका आदि है ॥ २ ॥ भूमिरादिस्तु गन्धानां रसानामाप एव च । रूपाणां ज्योतिरादित्यः स्पर्शानां वायुरुच्यते ॥ ३ ॥ शब्दस्यादिस्तथाऽऽकाशमेष भूतकृतो गुणः । गन्धोंका आदि कारण भूमि है। रसोंका जल, रूपोंका ज्योतिर्मय आदित्य, स्पर्शोंका वायु और शब्दका आदिकारण आकाश है। ये गन्ध आदि पञ्चभूतोंसे उत्पन्न गुण हैं ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि भूतानामादिमुत्तमम् ॥ ४ ॥ आदित्यो ज्योतिषामादिरग्निर्भूतादिरुच्यते । सावित्री सर्वविद्यानां देवतानां प्रजापतिः ॥ ५ ॥ अब मैं भूतोंके उत्तम आदिका वर्णन करता हूँ। सूर्य समस्त ग्रहोंका और जठरानल सम्पूर्ण प्राणियोंका आदि बतलाया जाता है। सावित्री सब विद्याओंकी और प्रजापति देवताओंके आदि हैं ॥ ४-५ ॥ ओङ्कारः सर्ववेदानां वचसां प्राण एव च । यदस्मिन् नियतं लोके सर्वं सावित्रिरुच्यते ॥ ६ ॥ ॐकार सम्पूर्ण वेदोंका और प्राण वाणीका आदि है। इस संसारमें जो नियत उच्चारण है, वह सब गायत्री कहलाता है ॥ ६ ॥ गायत्री छन्दसामादिः प्रजानां सर्ग उच्यते । गावश्चतुष्पदामार्दिर्मनुष्याणां द्विजातयः ॥ ७ ॥